सोशल मीडिया पर सरकारी बैंकों के बड़े पैमाने पर एकीकरण को लेकर फैलाई जा रही अफवाहों पर आधिकारिक तौर पर पूर्णविराम लग गया है। वित्त मंत्रालय के नाम से प्रसारित एक जाली राजपत्र अधिसूचना में यह दावा किया गया था कि देश के प्रमुख ऋणदाता बैंक कई छोटे सरकारी बैंकों का अधिग्रहण करने जा रहे हैं। सरकारी सूचना एजेंसी पीआईबी की तथ्य जांच इकाई ने इस पूरे मामले की पड़ताल करते हुए स्पष्ट किया है कि सरकार ने ऐसी कोई योजना अधिसूचित नहीं की है और प्रसारित किया जा रहा परिपत्र पूरी तरह मनगढ़ंत है। इस भ्रामक प्रचार के बावजूद 18 सितंबर को घरेलू शेयर बाजार में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के शेयरों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा और संबंधित सूचकांक हरे निशान पर बंद हुआ।
जाली राजपत्र में किए गए थे मनगढ़ंत दावे
सोशल मीडिया मंचों पर प्रसारित किए जा रहे जाली दस्तावेज को भारत के राजपत्र के प्रारूप में तैयार किया गया था, ताकि आम जनता और बैंक ग्राहक इसे वास्तविक सरकारी आदेश समझ बैठें। इस दस्तावेज में यह मनगढ़ंत दावा किया गया था कि केंद्र सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के एकीकरण की एक नई व्यापक योजना और संरचना तैयार कर ली है। इसमें कहा गया था कि नौ छोटे और मझोले सरकारी बैंकों का देश के तीन बड़े बैंकों में विलय कर दिया जाएगा। इस जाली मसौदे में अधिग्रहण करने वाले बैंकों और विलय होने वाले बैंकों की एक विस्तृत सूची भी पेश की गई थी।
इस फर्जी परिपत्र के अनुसार, इंडियन बैंक, बैंक ऑफ महाराष्ट्र और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया को भारतीय स्टेट बैंक में समाहित किए जाने का उल्लेख था, जिसके तहत ये तीनों बैंक एसबीआई समूह का हिस्सा बनने वाले थे। इसी तरह पंजाब नेशनल बैंक द्वारा यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ इंडिया और पंजाब एंड सिंध बैंक का अधिग्रहण करने की बात कही गई थी। तीसरे हिस्से में बैंक ऑफ बड़ौदा को केनरा बैंक, इंडियन ओवरसीज बैंक और यूको बैंक का अधिग्रहणकर्ता बताया गया था। इसमें यह भी दावा जोड़ा गया था कि विलय होने वाली संस्थाओं के तमाम अधिकार, शक्तियां, दावे, विशेषाधिकार, कर्मचारी, ग्राहक खाते, अनुबंध, बॉन्ड और बैंकिंग समझौते सीधे अधिग्रहण करने वाले बड़े बैंकों के पास चले जाएंगे।
पीआईबी तथ्य जांच ने दी सतर्क रहने की सलाह
इस फर्जीवाड़े की गंभीरता को देखते हुए पीआईबी ने त्वरित रूप से इसका खंडन जारी किया। सूचना एजेंसी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के समामेलन को लेकर प्रसारित किया जा रहा दस्तावेज पूरी तरह फर्जी है। वित्त मंत्रालय द्वारा ऐसा कोई आदेश अथवा राजपत्र प्रकाशित नहीं किया गया है। एजेंसी ने नागरिकों और बैंक उपभोक्ताओं को आगाह करते हुए कहा कि वे इस तरह की असत्यापित जानकारियों और दस्तावेजों पर विश्वास करने अथवा उन्हें आगे साझा करने से पहले हमेशा आधिकारिक और विश्वसनीय स्रोतों से उनकी सत्यता की पुष्टि अवश्य करें।
अफवाहों के बीच भी पीएसयू बैंक शेयरों में तेजी का रुख
इस तरह के व्यापक दावों के बावजूद शेयर बाजार में निवेशकों का भरोसा नहीं डिगा और 18 सितंबर के कारोबारी सत्र में बैंकिंग शेयरों पर कोई घबराहट नहीं देखी गई। निफ्टी पीएसयू इंडेक्स 0.34 प्रतिशत यानी 28.75 अंकों की बढ़त दर्ज करते हुए 8,291.55 के स्तर पर कारोबार कर रहा था। अधिकांश सरकारी बैंकों के शेयरों में खरीदारी का रुझान देखने को मिला।
बाजार में बढ़त दर्ज करने वाले शेयरों में बैंक ऑफ महाराष्ट्र सबसे आगे रहा, जिसके शेयर लगभग 3 प्रतिशत चढ़कर 82.87 रुपये पर पहुंच गए। सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के शेयर में 2.2 प्रतिशत का उछाल आया और यह 31.08 रुपये प्रति शेयर पर कारोबार करता दिखा। देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक एसबीआई के शेयरों में भी मामूली बढ़त देखी गई और यह 991.90 रुपये के आसपास कारोबार कर रहा था। इसके अलावा पीएनबी, बैंक ऑफ बड़ौदा, यूको बैंक, इंडियन बैंक, इंडियन ओवरसीज बैंक और पंजाब एंड सिंध बैंक के शेयरों में 0.51 प्रतिशत तक की हल्की बढ़त दर्ज की गई। इसके विपरीत, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया और केनरा बैंक के शेयरों में मामूली गिरावट देखी गई।
बैंक विलय का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और आगे की रूपरेखा
भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का एकीकरण और समामेलन पिछले एक दशक से भी अधिक समय से केंद्र सरकार के आर्थिक एजेंडे का एक अहम हिस्सा रहा है। इसका प्राथमिक उद्देश्य वैश्विक वित्तीय बाजार में प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम बड़े और वित्तीय रूप से सुदृढ़ बैंकों की स्थापना करना है। पिछले तीन दशकों से अधिक समय में भारतीय वित्तीय प्रणाली में बुनियादी और संरचनात्मक परिवर्तन हुए हैं, और कई बैंकों को मिलाकर एक मजबूत इकाई बनाना इसी व्यापक बदलाव की कड़ी रहा है।
रिकॉर्ड के अनुसार, अप्रैल 2020 के बाद से देश में किसी नए सरकारी बैंक का विलय नहीं हुआ है। अगले दौर के संभावित एकीकरण में उन बैंकों के भविष्य पर विचार होना बाकी है जिनका पिछले दौर में विलय नहीं हुआ था, हालांकि यह अगला बड़ा कदम कब उठाया जाएगा, इसकी कोई निश्चित समयसीमा अभी तय नहीं है। जून में यह संकेत मिले थे कि सरकार वित्त वर्ष 2026-27 तक सरकारी बैंकों की कुल संख्या घटाकर 4 करने के उद्देश्य से एक बड़ी विलय योजना का मसौदा तैयार कर सकती है। इसलिए बैंकिंग क्षेत्र में वास्तविक और आधिकारिक घटनाक्रमों पर बाजार तथा विश्लेषकों की पैनी नजर बनी हुई है।



















