अमेरिकी फेडरल रिजर्व के नीति निर्माता बार्किन ने बाल्टीमोर के एक कार्यक्रम में संबोधन के दौरान केंद्रीय बैंक की हालिया मौद्रिक सख्ती का पुरजोर बचाव किया। उनके अनुसार, मूल्य स्थिरता वापस लाने के लिए नीतिगत ब्याज दरों में हाल ही में की गई बढ़ोतरी बेहद अहम कदम था। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि भविष्य में दरों में और इजाफा किया जाएगा या नहीं, यह आगे के आर्थिक रुझानों पर निर्भर करेगा। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति के खतरे रोजगार सुरक्षा की तुलना में अधिक गंभीर बने हुए हैं, जिसके चलते मौद्रिक सख्ती को प्राथमिकता दी गई। इस घटनाक्रम के साथ ही अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में अमेरिकी मुद्रा अन्य प्रमुख प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले मजबूत नजर आई।
महंगाई का बढ़ता दायरा और आर्थिक मजबूती
बार्किन ने आर्थिक आंकड़ों की समीक्षा करते हुए रेखांकित किया कि मूल्य वृद्धि की समस्या अब केवल कुछ चुनिंदा क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। सामान्य तौर पर ईंधन लागत अथवा आयात शुल्कों को उच्च मुद्रास्फीति के लिए जिम्मेदार ठहराना आसान होता है, लेकिन व्यक्तिगत उपभोग व्यय सूचकांक के अधिकांश घटक 3% से अधिक की दर से बढ़ रहे हैं। ऊर्जा और व्यापार शुल्कों से जुड़े शुरुआती झटके आसानी से समाप्त नहीं हो रहे हैं, जिससे मौजूदा महंगाई का भविष्य की मूल्य वृद्धि पर प्रतिकूल असर पड़ने का जोखिम लगातार बना हुआ है।
इसके विपरीत, व्यापक अर्थव्यवस्था में मजबूती के स्पष्ट संकेत दिखाई दे रहे हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा केंद्रों के तकनीकी दायरे से परे भी आर्थिक गतिविधियों में सकारात्मक गति बनी हुई है। विनिर्माण इकाइयों और रक्षा क्षेत्र में निरंतर उत्पादन दर्ज किया जा रहा है, जबकि आम उपभोक्ताओं का खर्च भी मजबूती से टिका हुआ है। बार्किन का मानना है कि जब तक रोजगार बाजार स्वस्थ रहेगा, तब तक आम लोग खरीदारी जारी रखेंगे। फिलहाल उपभोक्ता बैलेंस शीट पर किसी बड़े वित्तीय तनाव के प्रमाण नहीं दिखे हैं, और श्रम बाजार भी बहुत ज्यादा तंग या अत्यधिक गर्म स्थिति में नहीं पहुंचा है।
विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की बढ़त
फेडरल रिजर्व के सख्त रुख और पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों के बीच विदेशी मुद्रा बाजार में अमेरिकी डॉलर ने अपने पैर मजबूत कर लिए हैं। कारोबारी सत्र के दौरान अमेरिकी डॉलर ने कैनेडियन डॉलर के मुकाबले सबसे जोरदार प्रदर्शन दर्ज किया। प्रमुख मुद्राओं की चाल दर्शाने वाले मुद्रा मानचित्र में डॉलर की खरीदारी का दबाव स्पष्ट दिखाई दिया, जिससे अन्य देशों की केंद्रीय नीतियों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।
एशियाई कारोबारी सत्र में ऑस्ट्रेलियाई डॉलर प्रति अमेरिकी डॉलर 0.7100 के स्तर से ऊपर खरीदारी आकर्षित करने में कामयाब रहा। ऑस्ट्रेलियाई केंद्रीय बैंक की गवर्नर मिशेल बुलॉक और सहायक गवर्नर सारा हंटर की आक्रामक टिप्पणियों ने घरेलू मुद्रा को कुछ सहारा दिया। इसके बावजूद, अमेरिकी डॉलर की निरंतर मजबूती ऑस्ट्रेलियाई डॉलर की बढ़त को सीमित करने का काम कर रही है। बाजार सहभागियों की नजरें इस सप्ताह वाशिंगटन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच होने वाले महत्वपूर्ण शिखर सम्मेलन पर भी टिकी हैं।
जापानी येन और बैंक ऑफ जापान का नीतिगत फैसला
जापान के मुद्रा बाजार में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले येन 157.50 के आसपास कारोबार करता नजर आया। सरकारी हस्तक्षेप की आशंकाओं ने येन में संभावित बड़ी गिरावट को थामने का प्रयास किया, किंतु बैंक ऑफ जापान के रुख ने इसे सीमित कर दिया। जापानी केंद्रीय बैंक ने 7-2 के बहुमत से अपनी अल्पकालिक ब्याज दर के लक्ष्य को 1.00% से बढ़ाकर 1.25% कर दिया है।
नीतिगत सामान्यीकरण की दिशा में उठाया गया यह कदम तीन दशकों से अधिक समय, यानी 31 वर्षों के उच्चतम स्तर पर ब्याज दरों को ले गया है। दरों में यह बढ़ोतरी बाजार की पूर्व अपेक्षाओं के बिल्कुल अनुरूप रही, लेकिन केंद्रीय बैंक का समग्र रुख नरम माना गया। दूसरी ओर, फेडरल रिजर्व की मौद्रिक सख्ती और मध्य पूर्व के तनाव ने डॉलर-येन जोड़ी को निरंतर ऊपरी स्तरों पर बनाए रखा है।
कीमती धातुओं में सुस्ती और वैश्विक कूटनीति
अमेरिकी मुद्रा में नए सिरे से लौटी खरीदारी और अमेरिकी ट्रेजरी प्रतिफल में उतार-चढ़ाव के कारण कीमती धातुओं में मुनाफावसूली का दौर देखा गया। बुलियन बाजार में सोने की कीमतों में लगातार दूसरे कारोबारी सत्र में गिरावट दर्ज की गई, जिसके परिणामस्वरूप पीली धातु प्रति ट्रॉय औंस 4,300 डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर की तरफ खिसक गई। भू-राजनीतिक अनिश्चितता के बावजूद डॉलर इंडेक्स में उछाल ने गैर-ब्याज वाली संपत्तियों पर दबाव बना दिया है।
भू-राजनीतिक मोर्चे पर, वैश्विक अर्थव्यवस्था के दो सबसे बड़े देश अमेरिका और चीन बृहस्पतिवार को वाशिंगटन में आमने-सामने होंगे। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की यह उच्चस्तरीय बैठक तय करेगी कि दोनों व्यापारिक महाशक्तियों के बीच मौजूदा संघर्ष विराम आगे बढ़ेगा अथवा वैश्विक व्यापार अनिश्चितता के एक नए दौर में प्रवेश करेगा। इस वार्ता के परिणाम सीधे तौर पर अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखलाओं, मुद्रा विनिमय दरों और वस्तु बाजारों की दिशा निर्धारित करेंगे।

















