अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में शुक्रवार के कारोबारी सत्र के दौरान कनाडाई डॉलर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारी दबाव में दिखाई दिया और यह 1.40 के अहम मनोवैज्ञानिक स्तर के बेहद करीब कारोबार करता नजर आया। मुद्रा विश्लेषकों शॉन ओसबोर्न और एरिक थियोरेट के अनुसार, अमेरिकी डॉलर का व्यापक रुख काफी मजबूत बना हुआ है, जिसका सीधा असर कनाडाई मुद्रा पर पड़ रहा है। इसके साथ ही अमेरिका और कनाडा के बीच फ्रंट-एंड बॉन्ड यील्ड स्प्रेड का लगातार चौड़ा होना भी कनाडाई डॉलर के लिए सबसे बड़ी अड़चन साबित हो रहा है। चालू स्पॉट स्तरों को उचित मूल्य के मुकाबले कुछ हद तक ओवरवैल्यूड माना जा रहा है, जबकि आने वाले दिनों में केंद्रीय बैंक के संकेतों से मध्यम अवधि में कुछ सहारा मिलने की उम्मीद की जा रही है।
कनाडाई डॉलर की कमजोरी के मुख्य कारक और तकनीकी स्तर
शुक्रवार को शुरुआती कारोबार में कनाडाई डॉलर 1.40 के स्तर के आसपास झूलता नजर आया और दिन के दौरान इसमें हल्की कमजोरी दर्ज की गई। मुद्रा विश्लेषकों का कहना है कि यह मामूली गिरावट कनाडाई अर्थव्यवस्था से जुड़ी किसी आंतरिक खामी की वजह से नहीं है, बल्कि वैश्विक स्तर पर अमेरिकी डॉलर के मजबूत रुख का परिणाम है। व्यापक वित्तीय बाजारों में जोखिम लेने की भूख भी कुछ सुस्त नजर आई। यूरोपीय शेयर बाजारों में गिरावट का माहौल देखा गया, जबकि अमेरिकी इक्विटी वायदा कारोबार में बेहद सीमित बढ़त देखने को मिली। कच्चे तेल की कीमतों में दर्ज की गई गिरावट ने भी कनाडाई डॉलर पर नकारात्मक दबाव डाला है।
विश्लेषकों का मानना है कि कच्चे तेल में नरमी के बावजूद अमेरिकी और कनाडाई फ्रंट-एंड यील्ड के बीच बढ़ता अंतर मुद्रा पर सबसे भारी पड़ रहा है। उनका अनुमान है कि वर्तमान स्पॉट स्तर 1.3910 के उचित मूल्य अनुमान की तुलना में थोड़ा महंगा या ओवरवैल्यूड है। सीमांत स्तर पर देखा जाए तो कमजोर होता कनाडाई डॉलर बैंक ऑफ कनाडा के लिए भी चिंता का सबब है, क्योंकि इससे देश में आयातित महंगाई का खतरा बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में केंद्रीय बैंक को बढ़ती महंगाई के जोखिमों से निपटने के लिए सतर्क रुख अपनाना पड़ सकता है।
बैंक ऑफ कनाडा के गवर्नर के भाषण पर टिकी निगाहें
आगामी सप्ताह में बैंक ऑफ कनाडा के गवर्नर टिफ मैकलम हैलिफ़ैक्स में सोमवार को एक संबोधन देने वाले हैं। बाजार प्रतिभागियों को उम्मीद है कि मैकलम अपने इस भाषण में महंगाई के बढ़ते जोखिमों को लेकर अपनी चिंताएं दोहरा सकते हैं। यदि उनके इस बयान से वर्ष के अंत से पहले बैंक ऑफ कनाडा द्वारा मौद्रिक नीति को और अधिक सख्त करने की संभावनाओं को बल मिलता है, तो कनाडाई डॉलर को कुछ मध्यम अवधि का सहारा मिल सकता है। कड़े नीतिगत कदमों की उम्मीदें मुद्रा को स्थिरता प्रदान कर सकती हैं और आगे की तेज गिरावट को रोक सकती हैं।
एशियाई और यूरोपीय सत्र में अन्य प्रमुख मुद्राओं की चाल
वैश्विक मुद्रा बाजार के अन्य हिस्सों पर नजर डालें तो ऑस्ट्रेलियाई डॉलर ने अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगातार दूसरे कारोबारी दिन सकारात्मक रुख बनाए रखा। शुक्रवार को एशियाई सत्र के दौरान यह 0.7100 के स्तर से ऊपर टिका रहा। अमेरिकी बॉन्ड प्रतिफल में आई नरमी ने अमेरिकी डॉलर के खरीदारों को बैकफुट पर रखा। इसके अलावा, रिज़र्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया की गवर्नर मिशेल बुलॉक की सख्त नीतिगत टिप्पणियों ने ब्याज दरों में बढ़ोतरी की उम्मीदों को बढ़ाया, जिससे ऑस्ट्रेलियाई डॉलर को अच्छा समर्थन मिला। हालांकि, फेडरल रिज़र्व के सख्त दृष्टिकोण और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं ने अमेरिकी डॉलर की गिरावट को सीमित रखा और इस मुद्रा जोड़ी की बढ़त पर लगाम लगाई।
दूसरी ओर, जापानी येन में भारी गिरावट का सिलसिला जारी रहा। यूरोपीय कारोबारी सत्र में डॉलर-येन जोड़ी ने दो सप्ताह के नए उच्चतम स्तर को छुआ और यह 158.00 के करीब पहुंच गई। बैंक ऑफ जापान द्वारा अपनी अल्पकालिक ब्याज दर को 1.00 प्रतिशत से बढ़ाकर 1.25 प्रतिशत करने के बावजूद येन में कमजोरी देखी गई। यह निर्णय सात के मुकाबले दो मतों से लिया गया, जो मौद्रिक नीति के सामान्यीकरण की दिशा में एक और बड़ा कदम था। हालांकि गवर्नर काज़ुओ उएदा ने कहा कि नीतिगत चरण बदल चुका है, लेकिन फैसले में दो आश्चर्यजनक असहमति वाले वोटों ने बाजार में अनिश्चितता पैदा कर दी और येन पर भारी दबाव बना दिया।
सोने की कीमतों में सुधार और कच्चे तेल का प्रभाव
सप्ताह के उत्तरार्ध में सर्राफा बाजार में भी रौनक देखने को मिली। शुक्रवार को सोने की कीमतों में अच्छी तेजी आई और यह लगभग 4,370 डॉलर प्रति ट्रॉय औंस के दायरे में कारोबार करती नजर आई। पीली धातु की इस बढ़त को कच्चे तेल की गिरती कीमतों से सहारा मिला। इस मजबूती के दम पर सोने ने अमेरिकी डॉलर की मजबूती और पूरी यील्ड कर्व पर अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में हो रही बढ़ोतरी के नकारात्मक प्रभाव को भी बेअसर कर दिया। कुल मिलाकर विदेशी मुद्रा और कमोडिटी बाजारों में इस समय केंद्रीय बैंकों के नीतिगत रुख और बॉन्ड प्रतिफल के उतार-चढ़ाव का सीधा असर देखने को मिल रहा है।

















