अमेरिकी केंद्रीय बैंक के नीति निर्माता काशकारी के हालिया बयानों ने वैश्विक वित्तीय जगत में ब्याज दरों के भविष्य को लेकर बहस छेड़ दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि नीतिगत फैसलों को लेकर किसी पहले से तय ढर्रे पर चलने के बजाय वे आने वाले आर्थिक आंकड़ों के आधार पर रुख तय करेंगे। उनके सितंबर के अनुमानों के मुताबिक चालू वर्ष में एक अतिरिक्त दर वृद्धि और 2027 में एक अन्य बढ़ोतरी की संभावना बनी हुई है, जिससे नीतिगत दर 4.25% से 4.50% के दायरे में पहुंच सकती है। इस दृष्टिकोण ने संकेत दिया है कि मौद्रिक सख्ती का दौर अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
अक्टूबर की नीतिगत बैठक को लेकर किसी पूर्व निर्धारित राय से इनकार करते हुए काशकारी ने कहा कि केंद्रीय बैंक कितनी रफ्तार से कदम उठाए, इस बारे में वे व्यावहारिक रुख बनाए हुए हैं। वर्तमान में वित्तीय आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए उनका मानना है कि नीतिगत दरें बाजार पर वैसा कड़ा दबाव नहीं बना पा रही हैं जैसा अनुमान था। इसका सीधा मतलब यह है कि वित्तीय परिस्थितियों में अभी वह अपेक्षित कसावट नहीं दिखी है जो मांग को तुरंत ठंडा कर दे। सितंबर की नीतिगत बैठक के बाद से अमेरिकी अर्थव्यवस्था ने अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन दर्ज किया है, जिससे नीति निर्माताओं के सामने चुनौतियां और बढ़ गई हैं।
मुद्रास्फीति का दबाव और केंद्रीय बैंक की रणनीति
महंगाई के मोर्चे पर बोलते हुए काशकारी ने रेखांकित किया कि हालांकि मूल्य वृद्धि के धीरे-धीरे कम होने का भरोसा बना हुआ है, मगर अनपेक्षित झटके लगातार सामने आ रहे हैं। उनके अनुसार सितंबर में की गई दर वृद्धि से यह साफ जाहिर हुआ था कि केंद्रीय बैंक कीमतों पर लगाम लगाने के लिए सक्रिय कदम उठाएगा। बाजार अब यह भांप रहे हैं कि फेड चेयरमैन वॉर्श मुद्रास्फीति की तपिश को नियंत्रित करने के लिए हर जरूरी उपाय अपनाएंगे। यदि अर्थव्यवस्था लगातार इसी तरह उम्मीदों से बेहतर प्रदर्शन करती रही, तो फेड को दरों में पहले के आकलनों से कहीं अधिक इजाफा करना पड़ सकता है।
सप्लाई पक्ष से आने वाले अवरोध समय के साथ सामान्य होने की उम्मीद है, लेकिन लगातार की जा रही दर बढ़ोतरी का मुख्य उद्देश्य भविष्य में कीमतों को लेकर बनने वाली उम्मीदों पर नियंत्रण पाना है। वर्तमान में बाजार की लंबी अवधि की मुद्रास्फीति से जुड़ी अपेक्षाएं 2% के आसपास केंद्रित बनी हुई हैं। वित्तीय प्रणाली की मजबूती पर बात करते हुए उन्होंने साफ किया कि उन्हें बैंकिंग या वित्तीय तंत्र में किसी भी तरह के व्यवस्थागत जोखिम के लक्षण नजर नहीं आ रहे हैं। बॉन्ड यील्ड में आई तेजी के बावजूद अमेरिकी ट्रेजरी बाजार पूरी तरह सुचारू रूप से काम कर रहा है।
अमेरिकी डॉलर की मजबूती और फॉरेक्स बाजार का रुख
वैश्विक विदेशी मुद्रा बाजार में अमेरिकी डॉलर अपनी बढ़त बनाए हुए है, जहां प्रमुख मुद्राओं की तुलना में यूरो के मुकाबले ग्रीनबैक सबसे अधिक मजबूत दर्ज किया गया। मुद्राओं के आपसी तुलनात्मक प्रदर्शन को दर्शाने वाले हीट मैप से स्पष्ट होता है कि निवेशक अमेरिकी डॉलर को आधार बनाकर सुरक्षित परिसंपत्तियों की ओर रुख कर रहे हैं। जब बाएं कॉलम से डॉलर को आधार मुद्रा के रूप में चुनकर जापानी येन जैसी कोट मुद्रा से तुलना की जाती है, तो डॉलर की स्पष्ट मजबूती रेखांकित होती है।
ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और अमेरिकी डॉलर (AUD/USD) की जोड़ी एशियाई कारोबारी सत्र में मध्य-0.6900 के आसपास दो महीने के निचले स्तर पर टिकी रही। अमेरिकी पीसीई आंकड़ों ने अक्टूबर में आक्रामक दर वृद्धि के दांव को भले ही कुछ हल्का किया हो, लेकिन कच्चे तेल से पैदा हुए महंगाई के जोखिम ने बॉन्ड यील्ड को ऊपर बनाए रखा है। इसी बीच अगस्त में ऑस्ट्रेलिया का व्यापार अधिशेष तेजी से घटकर 495 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर रह गया, जिससे ऑस्ट्रेलियाई मुद्रा पर सीमित असर देखने को मिला।
जापानी येन और सुरक्षित परिसंपत्तियों का हाल
डॉलर के मुकाबले जापानी येन (USD/JPY) एशियाई सत्र के दौरान 158.00 से ऊपर अपने साप्ताहिक दायरे के शीर्ष पर बना रहा। पीसीई आंकड़ों के नरम रुख के बावजूद कच्चे तेल की वजह से मंडराते महंगाई के खतरे ने अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड को कई वर्षों के उच्च स्तर के करीब बनाए रखा है। इसके अतिरिक्त अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनातनी ने अमेरिकी डॉलर को सुरक्षित ठिकाने के तौर पर और मजबूत किया है। डॉलर की यह व्यापक तेजी बैंक ऑफ जापान की संभावित सख्ती और जापानी अधिकारियों द्वारा बाजार में संभावित हस्तक्षेप की आशंकाओं पर भारी पड़ रही है।
अनिश्चितता के इस दौर में पीली धातु सोने की कीमतों में कोई एक दिशा देखने को नहीं मिली और इसका कारोबार प्रति ट्रॉय औंस $4,200 के महत्वपूर्ण स्तर के नीचे सीमित रहा। डॉलर में आई हालिया मजबूती और मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच सोने के भाव में झिझक भरा रुख बना हुआ है, जहां निवेशक स्पष्ट संकेतों का इंतजार कर रहे हैं।
क्रिप्टोकरेंसी बाजार पर बना दबाव
डिजिटल परिसंपत्तियों के बाजार में भी मौद्रिक सख्ती और डॉलर की मजबूती का सीधा असर देखा गया। बिटकॉइन का कारोबार मोटे तौर पर $82,500 के सपोर्ट और $85,000 के रेजिस्टेंस के बीच फंसा रहा। इसी तरह इथेरियम भी दबाव का सामना करता दिखा, जहां यह $2,700 से नीचे कारोबार कर रहा था जबकि $2,600 के स्तर ने इसे तात्कालिक सहारा प्रदान किया। इस बीच रिपल लुढ़ककर $1.50 के अहम स्तर से नीचे आ गया।
फेडरल रिजर्व की आगामी नीतियों को लेकर बाजार की राय तेजी से बदल रही है। महज एक सप्ताह पहले निवेशक अक्टूबर में दर वृद्धि को सबसे संभावित नतीजा मान रहे थे। हालांकि मुद्रास्फीति के नरम आंकड़ों और नीति निर्माताओं के सतर्क बयानों ने अब बाजार के अनुमानों को ठहराव की दिशा में मोड़ दिया है। इस अनिश्चितता ने कमोडिटी और क्रिप्टो दोनों क्षेत्रों में सट्टेबाजी को सीमित कर दिया है।
फेडरल रिजर्व की कार्यप्रणाली और नीतियां
संयुक्त राज्य अमेरिका में मौद्रिक नीति को दिशा देने की पूरी जिम्मेदारी फेडरल रिजर्व की है। अमेरिकी केंद्रीय बैंक को दो प्रमुख जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं, जिनमें कीमतों में स्थिरता बनाए रखना और अधिकतम रोजगार को बढ़ावा देना शामिल है। इन दोनों लक्ष्यों को साधने के लिए फेड प्राथमिक हथियार के रूप में ब्याज दरों में फेरबदल का सहारा लेता है। जब मूल्य वृद्धि की रफ्तार तेज हो जाती है और मुद्रास्फीति 2% के लक्ष्य से ऊपर निकल जाती है, तो केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर देता है, जिससे पूरी अर्थव्यवस्था में उधारी की लागत बढ़ जाती है। इसका नतीजा यह होता है कि अमेरिकी डॉलर मजबूत होता है क्योंकि वैश्विक निवेशक अपनी पूंजी लगाने के लिए अमेरिका की ओर आकर्षित होते हैं। इसके विपरीत जब मुद्रास्फीति 2% से नीचे गिर जाती है या बेरोजगारी दर बहुत बढ़ जाती है, तो फेड उधारी को बढ़ावा देने के लिए ब्याज दरों में कटौती कर सकता है, जिससे डॉलर पर दबाव बनता है।
फेडरल रिजर्व साल में आठ बार नियमित नीतिगत बैठकें आयोजित करता है, जहां फेडरल ओपन मार्केट कमेटी (एफओएमसी) समग्र आर्थिक स्थितियों का मूल्यांकन कर मौद्रिक फैसले लेती है। इस समिति में कुल बारह अधिकारी शामिल होते हैं, जिनमें बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के सात सदस्य, न्यूयॉर्क के फेडरल रिजर्व बैंक के अध्यक्ष, और बाकी ग्यारह क्षेत्रीय बैंकों में से बारी-बारी से एक साल के लिए चुने जाने वाले चार अध्यक्ष बैठते हैं।
क्वांटिटेटिव ईजिंग और टाइटनिंग की भूमिका
अत्यधिक गंभीर परिस्थितियों में अमेरिकी केंद्रीय बैंक क्वांटिटेटिव ईजिंग (QE) नामक गैर-पारंपरिक नीति का सहारा ले सकता है। इसके तहत संकट में फंसी वित्तीय प्रणाली में उधारी के प्रवाह को बड़े पैमाने पर बढ़ाया जाता है। यह नीति संकट काल या अत्यधिक कम मुद्रास्फीति के समय काम में लाई जाती है, जैसा 2008 के बड़े वित्तीय संकट के दौरान देखा गया था। इस प्रक्रिया में फेड अतिरिक्त डॉलर जारी कर वित्तीय संस्थानों से उच्च श्रेणी के बॉन्ड खरीदता है, जिससे आमतौर पर डॉलर कमजोर होता है।
इसके विपरीत क्वांटिटेटिव टाइटनिंग (QT) वह प्रक्रिया है जिसमें केंद्रीय बैंक वित्तीय संस्थानों से बॉन्ड खरीदना बंद कर देता है और परिपक्व होने वाले बॉन्ड की मूल राशि को नए बॉन्ड में फिर से निवेश नहीं करता। इस कदम से बाजार में तरलता घटती है, जो आमतौर पर अमेरिकी डॉलर के मूल्य के लिए सकारात्मक साबित होती है। नीतिगत दरों और बैलेंस शीट की इन रणनीतियों के बीच वैश्विक वित्तीय तंत्र आने वाले नीतिगत संकेतों पर नजरें गड़ाए बैठा है।

















