बुधवार को शुरुआती एशियाई कारोबारी सत्र के दौरान ब्रिटिश पाउंड गिरकर 1.3510 के स्तर के पास आ गया, जिससे यह दो सप्ताह के निचले स्तर पर पहुंच गया। संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य संघर्ष के कारण वैश्विक वित्तीय बाजारों में उथल-पुथल मच गई है। मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने निवेशकों को सुरक्षित निवेश के रूप में अमेरिकी डॉलर की ओर आकर्षित किया है, जिससे प्रमुख विदेशी मुद्रा जोड़ियों पर गहरा दबाव बना हुआ है। ताजा बाजार आंकड़ों के अनुसार GBP/USD 1.35 पर कारोबार कर रहा है, जो 1.30 से 1.38 के 52 सप्ताह के दायरे के भीतर पिछले बंद स्तर 1.36 से 0.33% की दैनिक गिरावट को दर्शा रहा है। हालांकि 1.3443 के पास स्थित 100 दिवसीय सिंपल मूविंग एवरेज पाउंड को नीचे सहारा दे रहा है, लेकिन कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और वैश्विक मुद्रास्फीति की चिंताओं के कारण स्टर्लिंग में तत्काल सुधार की संभावना बेहद सीमित नजर आ रही है।
फारस की खाड़ी में सैन्य संघर्ष से कच्चे तेल और बॉन्ड बाजारों में भारी उछाल
फारस की खाड़ी के रणनीतिक जलमार्ग के आसपास हुए सैन्य हमलों के बाद वैश्विक वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता का माहौल बन गया है। अमेरिकी सशस्त्र बलों ने इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग के आसपास ईरानी ठिकानों पर सटीक हमले किए। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट किया कि यह सैन्य कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग में बारूदी सुरंगें बिछाने के ईरानी प्रयासों और एक अमेरिकी सैन्य बेस पर हुए हमले के जवाब में की गई है। ट्रंप ने तेहरान को कड़ी चेतावनी दी कि यदि वह पलटवार करता है तो अमेरिका और अधिक कड़े सैन्य हमले करेगा।
दूसरी ओर, तेहरान ने घोषणा की है कि उसने पूरे क्षेत्र में अमेरिकी हितों को निशाना बनाते हुए एक बड़ा जवाबी सैन्य अभियान शुरू कर दिया है। इस महत्वपूर्ण व्यापारिक जलमार्ग पर बढ़ते तनाव ने सीधे तौर पर ऊर्जा और कमोडिटी बाजारों को प्रभावित किया है। फारस की खाड़ी से तेल की आपूर्ति बाधित होने की आशंका के चलते कच्चे तेल की कीमतें उछलकर लगभग छह सप्ताह के उच्चतम स्तर पर पहुंच गईं।
रिफाइंड ईंधन बाजार में इस भू-राजनीतिक झटके का असर सबसे ज्यादा देखा गया। अमेरिकी डीजल क्रैक स्प्रेड, जो वेस्ट टेक्सस इंटरमीडिएट (WTI) कच्चे तेल पर अल्ट्रा-लो सल्फर डीजल फ्यूचर्स के प्रीमियम को मापता है, इतिहास में पहली बार 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया। दिन के कारोबार के दौरान यह 102.00 डॉलर प्रति बैरल के ऑल-टाइम रिकॉर्ड उच्च स्तर को छू गया। रिफाइनिंग मार्जिन में यह अप्रत्याशित बढ़ोतरी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में आ रही दिक्कतों को उजागर करती है, जिससे दुनिया भर में मुद्रास्फीति फिर से भड़कने का गंभीर खतरा पैदा हो गया है।
मुद्रास्फीति की नई लहर के डर से महीने की शुरुआत में ही वैश्विक सरकारी बॉन्ड बाजारों में भारी बिकवाली शुरू हो गई। निवेशकों द्वारा मुद्रास्फीति अनुमानों में बदलाव के कारण सरकारी बॉन्ड यील्ड में तेजी से इजाफा हुआ। इस स्थिति का सबसे गहरा प्रभाव यूनाइटेड किंगडम के सरकारी कर्ज बाजार पर पड़ा। मंगलवार के कारोबार में ब्रिटेन की दो वर्षीय और दस वर्षीय गिल्ट यील्ड में एक समय 10 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी हुई, जिसके बाद ये क्रमशः 7 बेसिस पॉइंट्स और 8 बेसिस पॉइंट्स की बढ़त पर बंद हुईं। सरकारी उधारी लागत में इस वृद्धि से साफ है कि बाजार को आशंका है कि ऊर्जा कीमतों में उछाल केंद्रीय बैंकों के नीतिगत फैसलों को कठिन बना सकता है।
बैंक ऑफ इंग्लैंड का सतर्क रुख और यूके मुद्रास्फीति का परिदृश्य
कच्चे तेल की कीमतों और बॉन्ड यील्ड में अचानक आए उछाल के बावजूद बैंक ऑफ इंग्लैंड के गवर्नर एंड्रयू बेली ने यूनाइटेड किंगडम में घरेलू मूल्य दबावों को लेकर बेहद संतुलित दृष्टिकोण व्यक्त किया है। बेली ने कहा कि केंद्रीय बैंक यूके की अर्थव्यवस्था में द्वितीय चरण के मुद्रास्फीति प्रभावों को फिलहाल काफी सीमित रूप में देख रहा है। उन्होंने रेखांकित किया कि श्रम बाजार में पिछले कुछ समय से जारी नरमी मजदूरी के कारण बढ़ने वाली मुद्रास्फीति को रोकने में मददगार साबित हो रही है।
मौद्रिक नीति पर बात करते हुए एंड्रयू बेली ने कहा कि उनका मानना है कि नीतिगत बदलाव करने से पहले मौजूदा आर्थिक स्थिति पर लगातार नजर रखना सही कदम है। उनके इस बयान से संकेत मिलता है कि बैंक ऑफ इंग्लैंड ब्याज दरों में जल्दबाजी में कोई बड़ा बदलाव करने के मूड में नहीं है और वह आने वाले आर्थिक आंकड़ों का मूल्यांकन जारी रखेगा।
हालांकि वित्तीय बाजार अंतर्निहित मुद्रास्फीति दबावों से निपटने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना जता रहे हैं। ब्लूमबर्ग द्वारा संकलित आंकड़ों के अनुसार, निवेशक इस बात पर दांव लगा रहे हैं कि बैंक ऑफ इंग्लैंड इस साल ब्याज दर में 25 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी करेगा, जबकि वसंत ऋतु तक 25 बेसिस पॉइंट्स की एक और वृद्धि हो सकती है। कारोबारी बेली के सतर्क बयानों और बाजार की उम्मीदों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे ब्रिटिश पाउंड के मूल्यांकन में अनिश्चितता बनी हुई है।
GBP/USD का तकनीकी विश्लेषण और प्रमुख सपोर्ट व रेजिस्टेंस स्तर
तकनीकी विश्लेषण के नजरिए से देखें तो दैनिक चार्ट पर GBP/USD का ढांचा तटस्थ से थोड़ा सुधारात्मक बना हुआ है, हालांकि निकट अवधि में इसमें और गिरावट आने का जोखिम बना हुआ है। यह मुद्रा जोड़ी 1.3443 पर स्थित अपने 100 दिवसीय सिंपल मूविंग एवरेज (SMA) और निचले बोलिंगर बैंड के ऊपर बनी हुई है। हालांकि बोलिंगर मध्य बैंड 1.3550 के नीचे समेकन के कारण तात्कालिक रुझान दबाव में बना हुआ है।
दैनिक चार्ट पर 14 दिवसीय रिलेटिव स्ट्रेंथ इंडेक्स (RSI) 48 के आसपास बना हुआ है, जो एक तटस्थ गति का संकेत देता है। इसका मतलब है कि पाउंड को संरचनात्मक समर्थन तो प्राप्त है, लेकिन खरीदारों के पास तेजी से ऊपर जाने के लिए मजबूत प्रेरक बल की कमी है। लाइव बाजार आंकड़ों से पता चलता है कि 20 दिवसीय एक्सपोनेंशियल मूविंग एवरेज (EMA) और 50 दिवसीय EMA 1.35 के आसपास बने हुए हैं, जबकि 200 दिवसीय EMA 1.34 पर स्थित है। 50 दिवसीय EMA का 200 दिवसीय EMA से ऊपर होना एक गोल्डन क्रॉस की पुष्टि करता है, जो दीर्घकालिक तेजी के रुझान को बनाए रखता है।
ऊपरी स्तरों पर पहला तकनीकी प्रतिरोध बोलिंगर मध्य बैंड के पास 1.3550 पर स्थित है। यदि पाउंड इस स्तर से ऊपर निकलने में सफल रहता है, तो ऊपरी बोलिंगर बैंड के पास 1.3665 पर अगला मजबूत रेजिस्टेंस देखने को मिलेगा, जहां पहले भी बिकवाली का दबाव देखा गया था। इसके विपरीत, निचला सपोर्ट स्तर 1.3510 के पिवट क्षेत्र के पास बना हुआ है। यदि इस स्तर से नीचे ब्रेकडाउन होता है, तो बाजार का ध्यान 1.3445 के 100 दिवसीय SMA और 1.3435 के निचले बोलिंगर बैंड द्वारा निर्मित मजबूत सपोर्ट फ्लोर पर केंद्रित हो जाएगा। इस सपोर्ट क्लस्टर से नीचे दैनिक क्लोजिंग तेजी के ढांचे को कमजोर कर देगी और गिरावट को और गहरा कर सकती है।
यूओबी ग्रुप के मुद्रा विश्लेषकों ने ब्रिटिश पाउंड पर अपना सतर्क रुख बरकरार रखा है। यूओबी ग्रुप के विश्लेषकों ने शुक्रवार, 28 अगस्त को (जब स्पॉट 1.3595 पर था) कहा था कि स्टर्लिंग नीचे की ओर खिसक सकता है, हालांकि उनकी शुरुआती उम्मीद थी कि गिरावट 1.3550 से 1.3645 के दायरे तक ही सीमित रहेगी। लेकिन जब पाउंड गिरकर 1.3527 के निचले स्तर पर आ गया, तो यूओबी ग्रुप ने सोमवार, 31 अगस्त को (जब स्पॉट 1.3540 पर था) अपनी रिपोर्ट में कहा कि गिरावट का जोखिम अभी भी बना हुआ है और नजर रखने योग्य मुख्य स्तर 1.3480 है। यूओबी ग्रुप का मानना है कि जब तक पाउंड 1.3600 के मजबूत रेजिस्टेंस स्तर से नीचे बना रहता है, तब तक उस पर मंदी का दबाव बना रहेगा।
अन्य मुद्राओं और स्वर्ण बाजार पर पड़ा असर
मध्य पूर्व में सैन्य तनाव बढ़ने और अमेरिकी डॉलर की विनिमय दर में सुधार का असर अन्य संपत्ति श्रेणियों पर भी साफ दिखाई दिया। यूरो और अमेरिकी डॉलर की जोड़ी (EUR/USD) में गिरावट तेज हो गई और यह मंगलवार को अपने 1.1600 के मुख्य सपोर्ट स्तर को तोड़कर नीचे आ गई। अमेरिका से कमजोर आर्थिक आंकड़े आने के बावजूद सुरक्षित विकल्प के रूप में डॉलर की वैश्विक मांग बढ़ने के कारण यूरो में यह गिरावट देखी गई।
वहीं सोना भी दबाव में बना रहा और ढाई सप्ताह के निचले स्तर के करीब 4,300 डॉलर प्रति औंस के आसपास कारोबार करता दिखा। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने मुद्रास्फीति की चिंताओं को फिर से हवा दे दी है, जिससे निवेशकों ने फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावनाओं पर दोबारा विचार करना शुरू कर दिया है। अमेरिका में ब्याज दरें ऊंची रहने की उम्मीद से डॉलर को मजबूती मिलती है, जबकि बिना ब्याज देने वाली सोने जैसी धातुओं की मांग में कमी आती है।
ब्रिटिश पाउंड स्टर्लिंग का इतिहास और इसके मौलिक कारक
बैंक ऑफ इंग्लैंड द्वारा जारी किया जाने वाला ब्रिटिश पाउंड स्टर्लिंग दुनिया की सबसे पुरानी सक्रिय मुद्रा होने का गौरव रखता है, जिसका इतिहास 886 ईस्वी से चला आ रहा है। यह यूनाइटेड किंगडम की आधिकारिक मुद्रा है और वैश्विक विदेशी मुद्रा बाजार में चौथी सबसे अधिक कारोबार की जाने वाली मुद्रा है। वर्ष 2022 के बाजार आंकड़ों के अनुसार, विदेशी मुद्रा के कुल कारोबार में पाउंड स्टर्लिंग की हिस्सेदारी लगभग 12% है, जिसमें रोजाना औसतन 630 अरब डॉलर का लेन-देन होता है।
विदेशी मुद्रा बाजार में पाउंड स्टर्लिंग का कई प्रमुख मुद्रा जोड़ों में कारोबार होता है। GBP/USD जोड़ी, जिसे वित्तीय बाजार में केबल के नाम से जाना जाता है, वैश्विक विदेशी मुद्रा कारोबार का 11% हिस्सा बनाती है। GBP/JPY जोड़ी, जिसे कारोबारी इसकी उच्च उतार-चढ़ाव की प्रवृत्ति के कारण ड्रैगन कहते हैं, बाजार के 3% हिस्से का प्रतिनिधित्व करती है। वहीं EUR/GBP जोड़ी का कुल कारोबार में 2% योगदान है।
बैंक ऑफ इंग्लैंड द्वारा लिए गए मौद्रिक नीतिगत फैसले पाउंड के दीर्घकालिक मूल्य को निर्धारित करने वाले सबसे महत्वपूर्ण कारक होते हैं। केंद्रीय बैंक का प्राथमिक लक्ष्य मूल्य स्थिरता बनाए रखना और लगभग 2% की वार्षिक मुद्रास्फीति दर हासिल करना है। बैंक ऑफ इंग्लैंड ब्याज दरों में बदलाव को अपने मुख्य हथियार के रूप में इस्तेमाल करता है। जब मुद्रास्फीति तय सीमा से अधिक हो जाती है, तो केंद्रीय बैंक ब्याज दरें बढ़ाकर ऋण को महंगा करता है, जिससे अर्थव्यवस्था में मांग नियंत्रित होती है। ऊंची ब्याज दरें वैश्विक निवेशकों को यूके में निवेश के लिए आकर्षित करती हैं, जिससे पाउंड की मांग बढ़ती है। इसके विपरीत, जब आर्थिक वृद्धि धीमी होती है और मुद्रास्फीति कम हो जाती है, तो बैंक ऑफ इंग्लैंड ब्याज दरों में कटौती करता है ताकि कंपनियां नया निवेश कर सकें, जिससे मुद्रा में कुछ गिरावट आ सकती है।
इसके अलावा, यूके के आर्थिक आंकड़े भी पाउंड की विनिमय दर को सीधे प्रभावित करते हैं। सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि दर, विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों के पीएमआई (PMI) आंकड़े तथा रोजगार के आंकड़े यूके की आर्थिक स्थिति का आकलन करने में मदद करते हैं। मजबूत आर्थिक आंकड़े विदेशी निवेश को बढ़ावा देते हैं और ब्याज दरें बढ़ाने की उम्मीद जगाते हैं, जिससे पाउंड मजबूत होता है। इसके विपरीत, कमजोर आर्थिक आंकड़े पाउंड पर दबाव डालते हैं।
यूनाइटेड किंगडम का व्यापार संतुलन (Trade Balance) भी पाउंड के मूल्य निर्धारण में अहम भूमिका निभाता है। व्यापार संतुलन किसी देश द्वारा किए जाने वाले निर्यात और आयात के मौद्रिक मूल्य के अंतर को दर्शाता है। जब कोई देश ऐसे उत्पादों का निर्यात करता है जिनकी दुनिया भर में भारी मांग होती है, तो विदेशी खरीदारों को उन सामानों को खरीदने के लिए यूके की मुद्रा की आवश्यकता होती है। इस कारण सकारात्मक व्यापार संतुलन पाउंड की मांग को बढ़ाता है, जबकि लगातार बना रहने वाला व्यापार घाटा मुद्रा के मूल्य को कमजोर करता है।
कुल मिलाकर, विदेशी मुद्रा कारोबारी और मैक्रो निवेशक मध्य पूर्व में कूटनीतिक घटनाक्रमों के साथ-साथ अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम से आने वाले प्रमुख आर्थिक आंकड़ों पर लगातार नजर रखेंगे। जब तक भू-राजनीतिक तनाव कम नहीं होता या मौद्रिक नीति के संकेत अधिक स्पष्ट नहीं होते, तब तक विदेशी मुद्रा बाजारों में जोखिम की भावना और ऊर्जा कीमतों के उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशीलता बनी रहने की संभावना है।



















