ईरान में अपनी 16 साल की इकलौती बेटी सेवदा को अपनी आंखों के सामने खोने के बाद समीरा के जीवन का मकसद पूरी तरह बदल गया है। पहले कॉस्मेटिक्स की बिक्री करने वाली और राजनीति से दूर रहने वाली यह मां आज छिपकर रह रही हैं और प्रदर्शनों के दौरान प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने वाले सुरक्षाबलों और सरकारी अधिकारियों के नाम इंटरनेट पर उजागर कर रही हैं। उनका साफ कहना है कि जब तक उनकी जान है, वे अपनी बेटी के लिए न्याय हासिल करने और जिम्मेदार लोगों को कटघरे में खड़ा कराने की अपनी लड़ाई से पीछे नहीं हटेंगी।
तेहरान के बाहरी इलाके में शुरू हुआ विरोध और जानलेवा गोलीबारी
ईरान में आर्थिक तंगी और महंगाई के विरोध में शुरू हुआ जनआक्रोश कुछ ही हफ्तों में इस्लामिक गणराज्य को खत्म करने की मांग में बदल गया था। राजधानी तेहरान के बाहरी इलाकों में बड़े पैमाने पर रैलियां निकाली जा रही थीं। समीरा के अनुसार, उनकी बेटी सेवदा पहले से ही विरोध आंदोलनों को लेकर काफी जागरूक थी। वह महसा अमीनी और नीका शकारामी को अपना आदर्श मानती थी, जिनकी मौत अनिवार्य हिजाब नियमों और सख्त ड्रेस कोड के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई थी। सेवदा अक्सर इन दोनों के बताए रास्ते पर चलने की बात करती थी।
समीरा बताती हैं कि प्रदर्शनों का दायरा बढ़ता देख सरकार घबरा गई थी और इसके बाद सुरक्षाबलों को देखते ही गोली मारने का आदेश दिया गया। पहले तो कई लोगों को लगा कि यह केवल डराने की रणनीति है, क्योंकि ईरान में सरकारी धमकियां अक्सर केवल माहौल दबाने के लिए दी जाती थीं। इसके अलावा, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान से भी लोगों को कुछ ढांढस मिला था, जिसमें उन्होंने 8 जनवरी को अमेरिकी मीडिया से कहा था, "मैंने ईरानी अधिकारियों को बता दिया है कि यदि वे लोगों को मारना शुरू करते हैं, जो वे अक्सर अपने दंगों में करते हैं, तो हम उन पर बहुत जोरदार हमला करेंगे।"
इसके बावजूद, अगले दिन यानी 9 जनवरी को जब समीरा और सेवदा प्रदर्शन में शामिल हुईं, तो वहां भीड़ पहले से कम दिखाई दे रही थी। सेवदा को शायद खतरे का पूर्वाभास हो गया था। घर से निकलने से पहले उसने अपने झुमके अपनी नानी को सौंप दिए थे और अपने मोबाइल फोन का पासकोड भी अपनी मां को बता दिया था। विरोध स्थल पर पहुंचकर सेवदा एक कचरे के डिब्बे पर खड़ी हो गई और नारे लगाने लगी। समीरा के अनुसार, उस पूरे इलाके में प्रदर्शनकारियों से ज्यादा बसीज और आईआरजीसी (इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स) के जवान तैनात कर दिए गए थे।
तभी दाईं ओर बनी एक इमारत की छत पर मौजूद स्नाइपर ने गोली चलाई। गोली सीधे सेवदा के सीने के पार निकल गई। समीरा उस मंजर को याद करते हुए बताती हैं कि वह चीख भी नहीं सकीं। सेवदा के मुंह और नाक से खून बहने लगा और उसकी आंखें अपनी मां को ही देख रही थीं। किसी तरह उसे अस्पताल पहुंचाया गया, जहां बताया गया कि उसका ऑपरेशन किया जा रहा है। थोड़ी देर बाद जब ऑपरेशन थिएटर का दरवाजा खुला, तो सेवदा का शव एक बॉडी बैग में बंद मिल चुका था।
मुर्दाघरों की खाक छानना और शव हासिल करने के लिए रखी गई शर्तें
अस्पताल से सेवदा का शव गायब कर दिया गया था। इसके बाद समीरा को अपनी बेटी के शव को खोजने के लिए कई दिनों तक तेहरान के सबसे बड़े मुर्दाघरों के चक्कर काटने पड़े। वहां का दृश्य बेहद भयानक था। चारों तरफ नौजवान लड़कों और लड़कियों के शव बैगों में बंद पड़े थे। समीरा जब भी किसी बैग की ज़िप खोलतीं, उनका दिल दहल जाता था। अंत में जब सेवदा का शव मिला, तो उसके ऊपर तीन अन्य शव लादकर रखे गए थे।
ईरानी प्रशासन का आधिकारिक दावा है कि इन प्रदर्शनों में 3,000 से अधिक लोगों की जान गई है, जिनमें सुरक्षाबलों के जवान भी शामिल बताए गए हैं। दूसरी ओर, मानवाधिकार संगठन हराना (Hrana) का अनुमान है कि मरने वालों का आंकड़ा 7,000 से अधिक है और उनमें से अधिकांश आम प्रदर्शनकारी थे।
समीरा का कहना है कि बेटी का शव मिलना उनकी मुश्किलों का अंत नहीं, बल्कि एक नए उत्पीड़न का दौर था। शव को अंतिम संस्कार के लिए ले जाने की अनुमति देने के बदले प्रशासन ने शर्त रखी कि उन्हें यह लिखित या मौखिक तौर पर स्वीकार करना होगा कि सेवदा की हत्या सुरक्षाबलों ने नहीं बल्कि आतंकवादियों ने की है। समीरा के मुताबिक, 8 और 9 जनवरी के हत्याकांड पर पर्दा डालने और मौतों की असली संख्या छिपाने के लिए परिजनों को यह कहने पर मजबूर किया गया कि उनके बच्चों की जान अमेरिकी या इजरायली आतंकवादियों ने ली है। अंतिम संस्कार के बाद भी समीरा को अपनी बेटी की कब्र पर जाने या स्मारक पत्थर लगाने से रोक दिया गया।
सरकारी दबाव, देश से पलायन और गुप्त ठिकानों से जारी जंग
ईरानी परंपरा में मृत्यु के 40वें दिन का कार्यक्रम बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। समीरा बताती हैं कि इस आयोजन से ठीक पहले उन्हें खुफिया मंत्रालय की स्थानीय शाखा में बुलाया गया। वहां उन पर दबाव बनाया गया कि वे एक साक्षात्कार देकर कहें कि सेवदा बसीज की सदस्य थी और प्रदर्शनकारियों ने उसकी हत्या की थी। अधिकारियों ने इसके बदले सेवदा को शहीद घोषित करने, सरकारी सुविधाएं देने और नया घर देने का प्रलोभन दिया।
समीरा के अनुसार, सरकार इसलिए डरी हुई थी क्योंकि देश में इंटरनेट सेवा दोबारा बहाल होने के बाद उन्होंने अपनी बेटी की मौत की जानकारी लंदन स्थित एक ईरानी मीडिया संगठन को दे दी थी। बाहरी दुनिया तक खबर पहुंचने से अधिकारी नाराज थे। अपनी बेटी के खून का सौदा न करने की ठानकर समीरा ने 40वें दिन की रस्म पूरी होते ही देश छोड़ने का फैसला कर लिया। मानव तस्करों की मदद से वे गहरी खाइयों, बर्फीले पहाड़ों और खतरनाक नदियों को पैदल पार करते हुए सुरक्षित स्थान पर पहुंचीं। पलायन के दौरान उन्होंने एक वीडियो भी बनाया था, जिसमें उन्होंने प्रशासनिक उत्पीड़न पर गहरा गुस्सा जाहिर किया था।
विदेश पहुंचने के बाद भी उनका संघर्ष थमा नहीं। विदेशी मीडिया से बातचीत जारी रखने के कारण ईरानी अदालत ने उनकी गैरहाजिरी में ही उन पर कई संगीन धाराओं में मामला दर्ज कर दिया। इनमें "मोहरेबेह" यानी ईश्वर के खिलाफ युद्ध छेड़ने का आरोप भी शामिल है, जिसमें मौत की सजा का प्रावधान है। जब सेवदा के 17वें जन्मदिन पर परिवार और दोस्तों ने कब्र के पास एक सभा आयोजित की और समीरा विदेश से लाइव स्ट्रीम के जरिए देख रही थीं, तभी अचानक प्रसारण बंद हो गया। बाद में पता चला कि आईआरजीसी ने वहां छापा मारकर कई दोस्तों और रिश्तेदारों को गिरफ्तार कर लिया। परिजनों को चेतावनी दी गई कि यदि वे दोबारा कब्र पर जुटे, तो शव को निकालकर दूसरी जगह फेंक दिया जाएगा।
सोशल मीडिया पर सुरक्षाबलों के नाम उजागर करने का अभियान
वर्तमान में अज्ञात स्थान पर रह रहीं समीरा 8 और 9 जनवरी को गोलीबारी करने वाले सुरक्षाकर्मियों और अधिकारियों के नाम और चेहरे ऑनलाइन साझा कर रही हैं। उनका लक्ष्य यह है कि इन लोगों की पहचान सामने आए ताकि भविष्य में उन पर कानूनी मुकदमा चलाया जा सके। इस अभियान के कारण उन पर जानलेवा खतरा मंडरा रहा है। समीरा द्वारा उजागर किए गए एक व्यक्ति की संदिग्ध मौत के बाद एक सरकार समर्थक ने समीरा का पता बताने वाले को 5,000 डॉलर (लगभग 3,732 पाउंड) का इनाम देने का ऐलान कर दिया। हालांकि, ईरानी सरकारी मीडिया ने बाद में उस व्यक्ति की मौत के मामले में नौ लोगों की गिरफ्तारी की जानकारी दी।
ईरान का यह पूरा संकट व्यापक क्षेत्रीय उथल-पुथल के बीच घटा, जब अमेरिका और इजरायल ने देश भर में बड़े हवाई हमले किए, जिसमें ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की भी मौत हो गई। वहीं लंदन में ईरानी दूतावास का रुख यह रहा है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को अमेरिका सहित विदेशी ताकतों ने हाईजैक कर लिया था, जिन्होंने हिंसा भड़काई, हथियार बांटे और सार्वजनिक सुरक्षा को खतरे में डाला। इन सबके बीच समीरा का कहना है कि अपनी बेटी के बिना हर पल काटना उनके लिए बेहद कठिन है, लेकिन उस नुकसान ने ही उन्हें ईरानी सत्ता तंत्र के खिलाफ अपनी आखिरी सांस तक लड़ने की हिम्मत दी है।



















