उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी से पंजाब के विभिन्न शहरों के लिए रवाना हुई एक निजी स्लीपर बस को उत्तराखंड के रुद्रपुर क्षेत्र में परिवहन विभाग की टीम ने देर रात जांच के दौरान पकड़ा। चेकिंग के दौरान इस बस में स्वीकृत क्षमता से कई गुना ज्यादा सवारियां भरी हुई पाई गईं। महज 30 स्लीपर और एक ड्राइवर सीट यानी कुल 31 यात्रियों की मंजूरी वाली इस गाड़ी में कुल 168 लोग ठंस-ठंसकर सफर कर रहे थे। इस गैर-कानूनी संचालन का पर्दाफाश होते ही प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया और अधिकारियों को बस के अंदर से सभी लोगों को उतारकर उनकी गिनती पूरी करने में ही लगभग चार घंटे का वक्त लग गया।
रूद्रपुर के लालपुर में देर रात परिवहन विभाग की बड़ी कार्रवाई
यह पूरी घटना रुद्रपुर के पास स्थित लालपुर क्षेत्र की है, जहां परिवहन कर अधिकारी और एआरटीओ जितेंद्र सिंगवान के नेतृत्व में प्रभारी सुतैया सचल दल गश्त पर था। देर रात करीब एक बजे जब इस निजी बस को जांच के लिए रोका गया, तो अधिकारियों के होश उड़ गए। बस के भीतर का नजारा किसी खचाखच भरी जनरल बोगी की तरह दिख रहा था। चेकिंग में यह बात सामने आई कि बस बिना वैध परमिट और बिना रोड टैक्स चुकाए सड़कों पर दौड़ रही थी। इसके अलावा गाड़ी में क्षमता की तुलना में अत्यधिक ओवरलोडिंग की गई थी। नियमों के गंभीर उल्लंघन को देखते हुए परिवहन विभाग की टीम ने ओवरलोडिंग, बिना परमिट और बिना टैक्स भुगतान समेत विभिन्न धाराओं के तहत वाहन का चालान काटा और उसे रुद्रपुर स्थित रोडवेज डिपो परिसर में ले जाकर सीज कर दिया।
31 सीट की स्वीकृत क्षमता पर 168 यात्रियों का जोखिमभरा सफर
नियमों के अनुसार इस स्लीपर बस में केवल 30 स्लीपर बर्थ और एक सीट दर्ज थी, जिस पर अधिकतम 31 लोग ही यात्रा कर सकते थे। हालांकि, जब चेकिंग टीम ने बस के अंदर मौजूद लोगों की संख्या जांचना शुरू किया, तो कुल 168 यात्री सवार मिले। इनमें 138 वयस्क नागरिक और 30 छोटे बच्चे शामिल थे। स्लीपर केबिनों, गलियारे और हर खाली जगह पर यात्रियों को बिठाया और लिटाया गया था। इतने बड़े पैमाने पर यात्रियों को बस में ठूंसकर लंबी दूरी के सफर पर भेजना न सिर्फ ट्रैफिक नियमों की धज्जियां उड़ाना है, बल्कि यात्रियों की जान को सीधे तौर पर खतरे में डालने जैसा गंभीर अपराध है।
4 घंटे चला यात्रियों का गिनती अभियान और वीडियो रिकॉर्डिंग
बस में यात्रियों की अत्यधिक संख्या होने के कारण चेकिंग दस्ता भी हैरान रह गया। परिवहन विभाग के कर्मचारियों को रात के अंधेरे में बस से एक-एक यात्री को बाहर निकालने और उनकी पारदर्शी तरीके से गिनती करने में चार घंटे से अधिक का समय लग गया। पूरी प्रशासनिक कार्रवाई को पारदर्शी और कानूनी रूप से मजबूत बनाने के लिए इसकी बाकायदा वीडियो रिकॉर्डिंग भी कराई गई। आधी रात को यात्रियों और बच्चों की असुविधा को ध्यान में रखते हुए सीज की गई बस को रोडवेज स्टेशन परिसर के सुरक्षित स्थान पर खड़ा कराया गया, ताकि यात्री पानी और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं का उपयोग कर सकें।
208 किलोमीटर की निर्बाध यात्रा पर खड़े हुए गंभीर सवाल
इस पूरे मामले ने राज्यों की सीमा सुरक्षा और ट्रैफिक चेकिंग व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। लखीमपुर खीरी से रुद्रपुर तक की दूरी लगभग 208 किलोमीटर है। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि 208 किलोमीटर के इस लंबे रास्ते में किसी भी जिले, पुलिस चौकी या परिवहन विभाग के चेकिंग पिकेट ने इस बस को रोकने या जांचने की कोशिश क्यों नहीं की। यह बस पंजाब के लुधियाना, खन्ना, जालंधर और अंबाला जैसे शहरों तक जाने वाली थी। रास्ते में पड़ने वाले अंतरराज्यीय चेकिंग प्वाइंट्स और सुरक्षा तंत्र की नजरों से इतनी भीषण ओवरलोडिंग का बच निकलना कई तरह के संदेह पैदा करता है। आखिर किसकी शह पर ऐसी बसें बिना परमिट सैकड़ों जिंदगियों को दांव पर लगाकर फर्राटा भर रही हैं, यह एक बड़ा प्रश्न बना हुआ है।
किराए के रिफंड पर फंसा पेंच और स्टेशन पर भटके यात्री
बस सीज होने के बाद सबसे ज्यादा मुसीबत उन बेबस यात्रियों पर टूटी, जो अपने छोटे-छोटे बच्चों और सामान के साथ सफर कर रहे थे। यात्रियों ने बताया कि निजी बस के ऑपरेटर ने लखीमपुर से चढ़ते समय ही उनसे प्रति व्यक्ति 700 रुपये से लेकर 800 रुपये तक का किराया एडवांस में वसूल लिया था। बस सीज हो जाने के बाद ऑपरेटर या उसके स्टाफ ने यात्रियों के पैसे वापस करने से साफ इनकार कर दिया। जब परिवहन विभाग ने यात्रियों को आगे भेजने के लिए सरकारी रोडवेज बसों का विकल्प तलाशने की कोशिश की, तो किराए का मुद्दा आड़े आ गया।
परिवहन निगम और एआरटीओ के बीच तालमेल की कमी
यात्रियों की दयनीय स्थिति को देखते हुए परिवहन विभाग की टीम ने उन्हें रुद्रपुर रोडवेज डिपो पहुंचाया और निगम प्रबंधन से उन्हें आगे की मंजिल तक भेजने का अनुरोध किया। हालांकि, रोडवेज के सहायक महाप्रबंधक मधुसूदन मिश्रा ने स्पष्ट किया कि यात्रियों से जब बातचीत की गई, तो उन्होंने दोबारा सरकारी बस का टिकट लेने या किराया देने में असमर्थता जताई। रोडवेज प्रशासन का कहना था कि बिना किराए के नि:शुल्क बस सेवा उपलब्ध कराना उनके नियमों के दायरे में संभव नहीं है। नतीजा यह हुआ कि रात के वक्त महिलाओं और बच्चों के साथ यात्री स्टेशन पर ही फंसे रहे और उन्हें अपने रिश्तेदारों से पैसे मंगवाकर या अन्य वैकल्पिक साधनों का सहारा लेकर आगे जाने के लिए विवश होना पड़ा।
तीन दिनों में ओवरलोडिंग का दूसरा बड़ा मामला
क्षेत्र में निजी बस संचालकों की मनमानी और नियमों के उल्लंघन का यह पहला मामला नहीं है। महज तीन दिनों के भीतर रुद्रपुर और आसपास के इलाकों में यह दूसरा बड़ा मामला सामने आया है। इससे पहले शनिवार रात को किच्छा क्षेत्र में परिवहन विभाग ने जगदंबा ट्रैवल्स की एक बस को पकड़ा था। वह बस टनकपुर से लुधियाना की ओर जा रही थी और उसकी स्वीकृत क्षमता केवल 50 सवारियों की थी, लेकिन चेकिंग के दौरान उसमें 110 यात्री ठंसकर भरे हुए पाए गए थे। उस मामले में भी कड़ी कार्रवाई करते हुए बस का परमिट तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया गया था।
ओवरलोडिंग के खिलाफ चलेगा कड़ा अभियान
कार्रवाई के संबंध में एआरटीओ परिवहन कर अधिकारी जितेंद्र सिंगवान ने बताया कि बिना टैक्स, बिना परमिट और क्षमता से कई गुना अधिक ओवरलोडिंग के गंभीर आरोपों में बस का चालान काटकर उसे रुद्रपुर डिपो में सीज किया गया है। उन्होंने कहा कि यात्रियों की आगे की यात्रा के सिलसिले में रोडवेज अधिकारियों के साथ बातचीत कर समाधान निकालने की कोशिश की जा रही है। वहीं विभाग ने स्पष्ट किया है कि सड़कों पर यात्रियों की जान जोखिम में डालने वाले वाहनों के खिलाफ यह विशेष चेकिंग अभियान लगातार जारी रहेगा। इसके साथ ही आम जनता से भी अपील की गई है कि वे ऐसे नियम तोड़ने वाले वाहनों में सफर न करें और ओवरलोडिंग की सूचना तत्काल संबंधित विभाग को दें।



















