झुंझुनूं जिले की सूरजगढ़ पंचायत समिति के चुनावी रण में एक अजीबोगरीब और बेहद गंभीर कानूनी विवाद सामने आया है। स्थानीय विधायक श्रवण कुमार के बेटे जयप्रकाश द्वारा वार्ड संख्या 7 से दाखिल किए गए पर्चे पर गहरा विवाद खड़ा हो गया है। पूरा मामला अदालत के एक कथित फर्जी आदेश का सहारा लेकर मतदाता सूची में नाम जुड़वाने और उसके आधार पर उम्मीदवारी हासिल करने से जुड़ा है। चुनावी हलकों में इस घटनाक्रम ने जबरदस्त हलचल पैदा कर दी है, हालांकि उम्मीदवार ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को पूरी तरह नकारते हुए खुद को इस मामले से अनभिज्ञ बताया है।
मतदाता सूची में नाम जुड़वाने की दौड़ और कानूनी अर्जी
इस पूरे मामले की जड़ें स्थानीय मतदाता सूची में संशोधन कराने की कोशिशों से जुड़ी हुई हैं। आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक, जयप्रकाश का नाम पहले से सूरजगढ़ नगर पालिका क्षेत्र की मतदाता सूची में पंजीकृत था। जब उन्होंने पंचायत समिति का चुनाव लड़ने का फैसला किया, तो नियमानुसार ग्रामीण क्षेत्र की मतदाता सूची में नाम होना जरूरी था। इसी मंशा के साथ उन्होंने जीणी ग्राम पंचायत के वार्ड संख्या 5 की मतदाता सूची में अपना नाम शामिल कराने के लिए औपचारिक अर्जी दी थी।
प्रशासनिक स्तर पर तय समयसीमा के भीतर प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई, जिसके कारण उनका नाम ग्रामीण मतदाता सूची में दर्ज नहीं हो सका। इसके बाद उन्होंने 15 अक्टूबर को राजस्थान हाईकोर्ट की शरण ली और एक याचिका दाखिल की। अगले ही दिन यानी 16 अक्टूबर को इस मामले पर अदालत में शुरुआती सुनवाई हुई। अदालत ने इस मामले में तत्काल कोई अंतरिम राहत देने के बजाय अगली सुनवाई के लिए 27 अक्टूबर की तारीख मुकर्रर कर दी थी।
व्हाट्सएप संदेश और रिटर्निंग अधिकारी का रुख
पर्चा दाखिल करने की अंतिम तारीख 16 अक्टूबर ही निर्धारित थी। इसी दिन जयप्रकाश सूरजगढ़ के उपखंड अधिकारी और रिटर्निंग अधिकारी संदीप चौधरी के कार्यालय में अपना नामांकन पत्र पेश करने पहुंचे। उपखंड अधिकारी के अनुसार, उस वक्त एक कथित अदालती आदेश फोन के माध्यम से सीधे उपखंड अधिकारी के आधिकारिक व्हाट्सएप नंबर पर मंगवाया गया। अधिकारी ने उसी डिजिटल दस्तावेज का प्रिंट निकलवाकर जयप्रकाश का चुनावी पर्चा जमा कर लिया।
बाद में जब इस कथित आदेश की सत्यता पर सवाल उठे और अदालत के वास्तविक रिकॉर्ड की पड़ताल की गई, तो हकीकत कुछ और ही निकली। आधिकारिक अदालती रिकॉर्ड में ऐसा कोई निर्देश मौजूद ही नहीं था जिसमें मतदाता सूची में नाम जोड़ने या नामांकन स्वीकार करने की बात कही गई हो। अदालत ने तो केवल मामले को 27 अक्टूबर को अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया था। इस खुलासे के बाद चुनावी अमले में हड़कंप मच गया।
निर्वाचन तंत्र की सख्ती और पर्चा निरस्त करने का फैसला
मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला निर्वाचन अधिकारी एवं जिला कलेक्टर डॉ. अरुण गर्ग ने पूरी स्थिति पर कदम उठाया। उन्होंने बताया कि उपखंड अधिकारी ने संबंधित आदेश की कोई मूल प्रति या अदालत से जारी प्रमाणित प्रति हासिल किए बिना ही फाइल आगे भेज दी थी। चूंकि मतदाता सूची से जुड़ा ऑनलाइन पोर्टल पहले ही फ्रीज हो चुका था, इसलिए स्थानीय प्रशासन ने दिशा-निर्देश प्राप्त करने के लिए राज्य निर्वाचन आयोग से संपर्क साधा।
राज्य निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया कि बिना प्रमाणित अदालती आदेश के कोई भी बदलाव स्वीकार नहीं किया जा सकता और उन्होंने आदेश की सत्यापित प्रति प्रस्तुत करने को कहा। तय समयसीमा समाप्त होने तक अभ्यर्थी की तरफ से कोई भी अधिकृत या सत्यापित प्रतिलिपि नहीं दी जा सकी। इसके परिणामस्वरूप 17 अक्टूबर को जयप्रकाश का नामांकन पत्र पूरी तरह से निरस्त कर दिया गया। जिला कलेक्टर ने कड़े शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि दस्तावेजों की जांच में कूटरचना या धोखाधड़ी की पुष्टि होती है, तो संबंधित पक्षों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
विधायक पुत्र की ओर से दी गई सफाई
दूसरी तरफ, विधायक के बेटे जयप्रकाश ने इस पूरे विवाद में अपनी स्थिति स्पष्ट की है। उन्होंने माना कि उन्होंने मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के लिए विधिक रास्ता अपनाया था और अदालत में याचिका भी लगाई थी, लेकिन समय बीत जाने के कारण नाम नहीं जुड़ सका था। उनका कहना है कि उन्होंने अपने नामांकन पत्र के साथ अदालत का कोई भी जाली आदेश संलग्न नहीं किया था।
उन्होंने यह भी दावा किया कि उपखंड अधिकारी के व्हाट्सएप नंबर पर वह आदेश किसने और किस माध्यम से भेजा, इस बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है। फिलहाल प्रशासनिक स्तर पर इस बात की तहकीकात की जा रही है कि वह फर्जी दस्तावेज किसने तैयार किया, उसे किस नंबर से भेजा गया और चुनावी दौड़ में बने रहने के लिए इस तरह का खेल रचने के पीछे कौन लोग शामिल थे।



















