राज्यसभा की कार्यवाही के दौरान बुधवार को देश में जीवनरक्षक दवाओं की कीमतों में असमानता और ब्रांडेड औषधियों की आड़ में हो रही भारी मुनाफाखोरी का गंभीर मामला उठाया गया। महाराष्ट्र से भारतीय जनता पार्टी की सांसद डॉ. मेधा विश्राम कुलकर्णी ने उच्च सदन में शून्यकाल के दौरान इस संवेदनशील विषय को रेखांकित करते हुए केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की गुहार लगाई। उन्होंने जोर देकर कहा कि जब दो अलग-अलग कंपनियों की दवाओं का रासायनिक सॉल्ट, सक्रिय तत्व, खुराक की मात्रा और मरीज पर उनका चिकित्सीय असर बिल्कुल एक समान होता है, तो उनकी बिक्री दरों में कई गुना का भारी अंतर नहीं होना चाहिए। इस मनमाने मूल्य अंतर के कारण आम नागरिकों और मरीजों की जेब पर भारी आर्थिक बोझ पड़ रहा है। इस स्थिति से राहत दिलाने के लिए उन्होंने मांग की कि समान औषधीय संरचना वाली सभी दवाओं के लिए देश भर में एक समान अधिकतम खुदरा मूल्य यानी 'एक देश, एक एमआरपी' की व्यवस्था तत्काल प्रभाव से लागू की जानी चाहिए।
दवाओं के मूल्यों में भारी अंतर और आम मरीजों की लाचारी
सदन में बोलते हुए डॉ. मेधा विश्राम कुलकर्णी ने स्पष्ट किया कि वर्तमान में बाजार के भीतर एक ही बीमारी के इलाज के लिए इस्तेमाल होने वाली दवाओं की दरों में चौंकाने वाला अंतर बना हुआ है। उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में जानकारी के अभाव के कारण अधिकांश मरीजों को विवश होकर महंगी ब्रांडेड दवाएं खरीदनी पड़ती हैं। अधिकांश समय मरीजों को यह पता ही नहीं होता कि जिस साल्ट के लिए वे भारी रकम चुका रहे हैं, वही दवा बेहद किफायती दरों पर जेनेरिक रूप में भी उपलब्ध है। इतना ही नहीं, चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े कुछ डॉक्टरों और दवा विक्रेताओं की ओर से भी जाने-अनजाने ऐसी धारणा निर्मित कर दी जाती है कि केवल अधिक कीमत वाली ब्रांडेड दवाएं ही गुणवत्तापूर्ण और असरदार होती हैं, जबकि सस्ती जेनेरिक दवाएं निष्प्रभावी होती हैं। यह धारणा पूरी तरह से भ्रामक है, क्योंकि वैज्ञानिक मानकों के अनुसार दवाओं के क्रियाशील घटक और उनका चिकित्सीय प्रभाव पूरी तरह एक जैसा ही रहता है।
अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए भाजपा सांसद ने राज्यसभा में दवाओं की कीमतों के कुछ प्रत्यक्ष आंकड़े पेश किए। उन्होंने बताया कि एक मूल औषधीय साल्ट वाली सामान्य दवा बाजार में महज 25 रुपये में उपलब्ध कराई जा सकती है, लेकिन उसी दवा का बहुराष्ट्रीय या बड़ी कंपनियों का ब्रांडेड संस्करण 132 रुपये जैसी ऊंची कीमत पर बेचा जा रहा है। उच्च रक्तचाप के इलाज में प्रयुक्त होने वाली महत्वपूर्ण दवा टेल्मीसार्टन की कीमत बाजार में 17 रुपये से शुरू होकर विभिन्न ब्रांडों के तहत 222 रुपये तक पहुंच जाती है। इसी प्रकार पेट में एसिडिटी और गैस के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दवा पैंटोप्राजोल की 25 रुपये की मूल प्रति खुराक के मुकाबले कुछ चुनिंदा ब्रांड इसे 150 रुपये तक में बेच रहे हैं। एक ही असर वाली दवाओं की दरों में यह कई गुना अंतर देश के करोड़ों मरीजों पर अनावश्यक वित्तीय दबाव पैदा कर रहा है।
संसदीय समिति का खुलासा और 1000 प्रतिशत तक मुनाफाखोरी
दवा क्षेत्र में जारी वित्तीय अनियमितताओं का जिक्र करते हुए डॉ. कुलकर्णी ने संसद की एक उच्चस्तरीय समिति का हवाला भी दिया। उन्होंने सदन को अवगत कराया कि हाल ही में आई संसदीय समिति की रिपोर्ट में देश के भीतर औषधियों की बिक्री पर 600 प्रतिशत से लेकर 1000 प्रतिशत तक की अत्यधिक मुनाफाखोरी की बात सामने आई है। वर्तमान में दवा मूल्य नियंत्रण के कानूनी ढांचे में ऐसी कई श्रेणियां हैं, जो गैर-अनुसूचित दवाओं के अंतर्गत आती हैं। इन गैर-अनुसूचित दवाओं की अधिकतम बिक्री दरों पर सरकार का सीधा या कड़ा नियंत्रण न होने का अनुचित लाभ दवा निर्माता कंपनियां उठाती हैं। कंपनियां अपने स्तर पर मनमाने दाम तय करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हो जाती हैं। इसके अतिरिक्त, दवाइयों की थोक खरीद दरों और खुदरा बिक्री मूल्य के बीच एक बहुत बड़ा अंतर मौजूद है, जिसकी अंतिम मार सीधे उपभोक्ता यानी मरीज को झेलनी पड़ती है।
डब्ल्यूएचओ के अंतरराष्ट्रीय मानक और कोविड-19 महामारी के सबक
वैश्विक स्तर पर अपनाई जाने वाली पारदर्शी नीतियों का संदर्भ देते हुए सांसद डॉ. मेधा विश्राम कुलकर्णी ने विश्व स्वास्थ्य संगठन की सिफारिशों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दवाओं की दरों को तर्कसंगत और किफायती बनाए रखने के लिए 'आंतरिक संदर्भ मूल्य निर्धारण' और 'मूल्य आधारित मूल्य निर्धारण' जैसी आधुनिक प्रणालियों को अपनाने का सुझाव दिया है। भारत को भी मरीजों के हित में इन अंतरराष्ट्रीय मानकों और सर्वोत्तम प्रथाओं को अपने दवा बाजार में लागू करना चाहिए, ताकि दवाइयों का बाजार पूरी तरह पारदर्शी और न्यायसंगत बन सके।
इसके साथ ही उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा पूर्व में उठाए गए जनहितकारी कदमों का स्मरण कराया। उन्होंने कहा कि सरकार ने देश भर में जेनेरिक दवाओं की स्वीकार्यता और उपलब्धता बढ़ाने के लिए कई सार्थक प्रयास किए हैं। विशेष रूप से कोविड-19 महामारी के संकटपूर्ण दौर में जब आम जनता स्वास्थ्य संकट से जूझ रही थी, तब सरकार ने दवाओं पर कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन को सीमित करने का ऐतिहासिक फैसला लिया था। सरकार के उस कड़े कदम के कारण देश के नागरिकों को काफी सस्ती दर पर जीवनरक्षक औषधियां मिल सकीं और मरीजों के लगभग 950 करोड़ रुपये की सीधी बचत हुई थी।
समान एमआरपी और दवा नियंत्रण तंत्र को मजबूत करने के सुझाव
अपने वक्तव्य के अंतिम चरण में डॉ. मेधा विश्राम कुलकर्णी ने केंद्र सरकार के समक्ष मरीजों के वित्तीय संरक्षण के लिए ठोस सुझाव और मांगें प्रस्तुत कीं। उन्होंने मांग रखी कि एक समान रासायनिक संरचना और क्षमता वाली सभी दवाओं के लिए पूरे देश में अनिवार्य रूप से एक समान एमआरपी तय की जाए। इसके अलावा राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित दवा मूल्य नियंत्रण प्रणाली को कानूनी और व्यावहारिक रूप से अधिक शक्तिशाली बनाया जाए, ताकि गैर-अनुसूचित दवाओं की कीमतों पर भी कड़ा अंकुश लगाया जा सके। दवा कंपनियों और बिचौलियों द्वारा की जाने वाली अतिरिक्त मुनाफाखोरी पर पूर्ण विराम लगाने के लिए सख्त विनियामक तंत्र विकसित किया जाए।
सांसद ने यह भी सुझाव दिया कि देश के सभी सरकारी व निजी डॉक्टरों तथा मेडिकल स्टोर संचालकों को जेनेरिक दवाएं लिखने और उन्हें मरीजों को सुलभ कराने के लिए विशेष प्रोत्साहन दिए जाएं। साथ ही देश के दूर-दराज के इलाकों तक गुणवत्तापूर्ण जेनेरिक औषधियों की आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत किया जाए। उन्होंने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि इस गंभीर विषय की संवेदनशीलता को देखते हुए शीघ्र अति शीघ्र प्रभावी नीतिगत कदम उठाए जाएं, ताकि हर नागरिक को उचित और पारदर्शी दरों पर जीवनरक्षक दवाएं मिल सकें।



















