उत्तर प्रदेश के आगामी 2027 विधानसभा चुनावों को लेकर राज्य का राजनीतिक पारा अभी से चढ़ने लगा है। भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आक्रामक अभियानों और समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव के प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में 27,000 वोट जोड़ने के माइक्रो-मैनेजमेंट फॉर्मूले के बीच एक नया राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। मुरादाबाद की एक बड़ी जनसभा के मंच से ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन यानी एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने भाजपा विरोधी खेमे के सामने गठबंधन का खुला प्रस्ताव रख दिया है। ओवैसी ने समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को सीधी नसीहत देते हुए कहा कि अगर वे राज्य में भाजपा को लगातार तीसरी बार सत्ता में आने से रोकना चाहते हैं, तो उन्हें अकेले लड़ने के भ्रम से बाहर निकलकर फौरन बातचीत शुरू करनी चाहिए।
असदुद्दीन ओवैसी ने विपक्षी दलों पर यह आरोप लगाया कि चुनाव हारने के बाद अक्सर उन पर वोट काटने का ठीकरा फोड़ दिया जाता है। मुरादाबाद की जनसभा में उन्होंने साफ शब्दों में कहा,
"मजलिस कभी नहीं चाहती कि उत्तर प्रदेश में तीसरी बार बीजेपी की सरकार बने। मैं हाथ मिलाने और गठबंधन करने के लिए तैयार हूं।"उन्होंने विपक्षी नेताओं को आगाह करते हुए कहा कि अगर सच में भाजपा को रोकना मकसद है, तो गठबंधन के लिए चुनाव के बाद आंसू बहाने के बजाय आज ही सार्थक चर्चा की जरूरत है। ओवैसी ने जोर देकर कहा कि उनकी यह सियासी पहल केवल सत्ता पाने के लिए नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व और बराबरी के हक के लिए है। उनका कहना था कि उनकी पार्टी किसी के रहम पर नीचे फर्श पर बैठने के बजाय मेज पर बराबर की कुर्सी पाकर अपने लोगों के हकों की बात करेगी।
बिहार के पिछले चुनावी नतीजों की दिलाई याद
ओवैसी ने समाजवादी पार्टी और सेक्युलर कहे जाने वाले दलों के पुराने रवैये पर सवाल खड़े करते हुए बिहार विधानसभा चुनाव का उदाहरण सामने रखा। उन्होंने याद दिलाया कि बिहार में एआईएमआईएम के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल ईमान ने राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस और वामपंथी दलों के महागठबंधन को पत्र लिखकर केवल 6 सीटें मांगी थीं। इसके बावजूद वहां के मुख्य विपक्षी दलों ने एआईएमआईएम को पूरी तरह दरकिनार कर दिया था। ओवैसी के अनुसार, उस इनकार का नतीजा पूरे देश ने देखा कि किस तरह सेक्युलर वोटों के बिखराव ने समीकरण बदल दिए। उत्तर प्रदेश में उसी गलती को न दोहराने की चेतावनी देते हुए उन्होंने गैर-भाजपा दलों से समय रहते परिपक्व रुख अपनाने की अपील की।
अखिलेश यादव के पीडीए फॉर्मूले के सामने खड़ी हुई नई दुविधा
ओवैसी की इस सीधी पेशकश ने समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के सामने एक बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा कर दिया है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद से अखिलेश यादव अपने पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के सोशल इंजीनियरिंग मॉडल पर लगातार काम कर रहे हैं। समाजवादी पार्टी राज्य के लगभग 19 से 20 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं को अपना मजबूत और पारंपरिक जनाधार मानती रही है। जानकारों का मानना है कि अगर अखिलेश यादव एआईएमआईएम के साथ औपचारिक मंच साझा करते हैं, तो भाजपा को इस गठबंधन को तुष्टिकरण और कट्टरपंथी ध्रुवीकरण के रूप में प्रचारित करने का सीधा मौका मिल जाएगा। इससे समाजवादी पार्टी के साथ जुड़े गैर-यादव ओबीसी और हिंदू मतदाताओं में बिखराव का खतरा बढ़ सकता है, जिसका संकेत भाजपा ने इसे भाईजान पार्टनरशिप कहकर पहले ही दे दिया है।
मुस्लिम वोटों के एकाधिकार और समानांतर नेतृत्व का डर
समाजवादी पार्टी के भीतर सबसे बड़ी चिंता यह है कि एआईएमआईएम को उत्तर प्रदेश की मुख्य चुनावी धारा में साझेदार बनाने से राज्य में एक स्वतंत्र और आक्रामक मुस्लिम नेतृत्व खड़ा हो सकता है। अब तक समाजवादी पार्टी अल्पसंख्यक मतों के स्वाभाविक दावेदार के रूप में बिना किसी आंतरिक चुनौती के चुनाव लड़ती रही है। ओवैसी को गठबंधन में हिस्सेदारी देने का मतलब होगा कि राज्य के मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में एआईएमआईएम को स्थायी राजनीतिक जमीन सौंपना। यही वजह है कि अखिलेश यादव किसी भी ऐसे समझौते से कतराते रहे हैं जिससे उनके पारंपरिक वोट बैंक में कोई दूसरा भागीदार बन जाए।
इस सियासी प्रस्ताव के बाद उभरती तीन प्रमुख रणनीतिक संभावनाएं
ओवैसी के इस दांव के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में तीन रास्ते बनते दिख रहे हैं
- सपा की खामोशी या पूर्ण इनकार: अखिलेश यादव ओवैसी के इस बयान पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया न देकर इसे नजरअंदाज कर सकते हैं। सपा की कोशिश होगी कि 2027 का चुनाव पूरी तरह से भाजपा बनाम सपा के सीधे मुकाबले के रूप में लड़ा जाए, जिससे अल्पसंख्यक मतदाता मजबूरी में सपा के पक्ष में ही एकजुट रहें।
- पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सीटों पर सीधा बिखराव: यदि विपक्ष ने गठबंधन से इनकार कर दिया, तो एआईएमआईएम सीमांचल और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 30 से 40 मुस्लिम बहुल विधानसभा क्षेत्रों में अपने आक्रामक उम्मीदवार उतार सकती है। ऐसी स्थिति में मतों के विभाजन का सीधा फायदा सत्तारूढ़ भाजपा को मिल सकता है।
- पर्दे के पीछे रणनीतिक तालमेल: किसी औपचारिक और सार्वजनिक गठबंधन के जोखिम से बचने के लिए दोनों दल कुछ खास सीटों पर अघोषित समझ बना सकते हैं, ताकि भाजपा विरोधी मतों में सीधा टकराव टाला जा सके।
असदुद्दीन ओवैसी ने अपना प्रस्ताव रखकर गेंद अब सीधे समाजवादी पार्टी के पाले में डाल दी है। 2027 की चुनावी बिसात पर अब यह तय होना बाकी है कि अखिलेश यादव अपने पीडीए मॉडल के सहारे अकेले दम पर मैदान संभालेंगे या फिर अल्पसंख्यक मतों के संभावित बिखराव को रोकने के लिए कोई नया समीकरण साधेंगे।





















