मतदाता सूची के संशोधन और चुनावी प्रक्रियाओं की निष्पक्षता को लेकर राजनीतिक गलियारों में बहस तेज हो गई है। विपक्षी दल मतदाता सूची से नाम जोड़ने और हटाने के तौर-तरीकों पर लगातार सवाल खड़े कर रहे हैं। विशेष पुनरीक्षण अभियान (SIR) के संचालन को लेकर चुनाव आयोग के प्रशासनिक निर्णयों पर असंतोष जताया जा रहा है, जिससे निर्वाचन प्रणाली की स्वतंत्रता को लेकर एक नई राष्ट्रीय बहस छिड़ गई है।
विपक्षी दलों के आरोप और प्रशासनिक सवाल
विपक्षी खेमे ने आरोप लगाया है कि पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान नियमों की अनदेखी की गई है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के प्रशासनिक कदमों और निर्णयों की निष्पक्षता पर सवाल उठाए गए हैं। विपक्षी नेताओं का दावा है कि बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने या जोड़े जाने से चुनावी प्रक्रिया की शुचिता प्रभावित हो सकती है, जिसके विरोध में कई दलों ने मुखर रुख अपनाया है।
फारूक अब्दुल्ला ने पुरानी व्यवस्था पर साधा निशाना
जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने इस विवाद में एक नया ऐतिहासिक दृष्टिकोण सामने रखा है। उन्होंने संवैधानिक संस्थाओं के निर्माण काल के निर्णयों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि स्वतंत्र संस्थाओं को पूर्ण स्वायत्तता न देना व्यवस्था की एक बड़ी कमी रही है। अब्दुल्ला ने सीधे तौर पर कहा कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने यदि चुनाव आयोग को पूरी तरह स्वायत्त बनाया होता, तो आज संस्था की कार्यप्रणाली पर ऐसे सवाल खड़े न होते।
संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता का मुद्दा
नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता ने इस बात पर बल दिया कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए निर्वाचन संस्था का पूर्ण नियंत्रण मुक्त होना अनिवार्य है। उनके अनुसार, शीर्ष प्रशासनिक नियुक्तियों और संस्थागत निर्णयों में कार्यपालिका के प्रभाव की आशंकाओं को समाप्त किया जाना चाहिए था, ताकि किसी भी दौर में संस्था की निष्पक्षता पर जनता का भरोसा न डगमगाए।
















