पीतल नगरी में खास मसालों और मक्खन के साथ परोसी जाती है मुरादाबादी मूंग दालतुला राशिफल 25 सितंबर 2026: राहु और मंगल के प्रभाव से करियर में आएगी गति, वित्तीय संतुलन और रिश्तों पर दें ध्यानगोवा वोटर लिस्ट विवाद पर चुनाव आयोग का रुख साफ, मतदाता सूची संशोधन पर विपक्ष ने उठाए सवालनागोया में भारत के पास आज कई मेडल पक्के करने का मौका, निशानेबाजी और कबड्डी पर टिकी निगाहेंशी जिनपिंग के स्वागत में व्हाइट हाउस का शाही मेन्यू, फ्रेंच स्वाद के साथ परोसे गए खास व्यंजनराजस्थान के तीन बड़े शहरों में महापौर चुनने की जंग, जयपुर में भाजपा और कांग्रेस आमने-सामनेकश्मीरी गेट के पास ई-रिक्शा रोककर लूटपाट, चाकू के वार से युवक की जान गई और दो जख्मीछत और बालकनी पर सब्जियां उगाते समय न करें केमिकल का छिड़काव, पूसा विशेषज्ञ ने सुझाए जैविक खाद के आसान उपायवृश्चिक राशिफल 25 सितंबर 2026: 12वें भाव में शुक्र जगाएगा सुख-सुविधाओं की चाहत, बजट और सेहत का रखें ध्यानबिटगेट पर बड़ा साइबर हमला, हॉट वॉलेट से उड़ाए गए 351 मिलियन डॉलर
घोड़ों के खुरों में संक्रमण और दरार के लक्षण पहचानें, समय पर देखभाल न करने से बढ़ सकती है परेशानीराजस्थान
20 सित॰ 2026, 7:47 pm (4 दिन पहले)· 0

घोड़ों के खुरों में संक्रमण और दरार के लक्षण पहचानें, समय पर देखभाल न करने से बढ़ सकती है परेशानी

अस्वच्छ अस्तबल और अत्यधिक कठोर जमीन घोड़ों के खुरों को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा सकती है। शुरुआती संकेतों को पहचानकर सही समय पर विशेषज्ञ की मदद लेना जरूरी है।

अश्वपालकों के लिए घोड़ों के खुरों की तंदुरुस्ती बनाए रखना बेहद अहम जिम्मेदारी होती है। यदि खुरों की सही देखरेख न की जाए तो उनमें दरार पड़ना, आकार का अनियंत्रित बढ़ना, संक्रमण फैलना, चोट लगना अथवा सड़न पैदा होने जैसी गंभीर समस्याएं खड़ी हो जाती हैं। अत्यधिक गीले तथा गंदगी से भरे वातावरण में लंबे समय तक बंधे रहने से खुरों में बैक्टीरिया व अन्य संक्रमण पनपने की आशंका काफी बढ़ जाती है। इसके विपरीत, बहुत सूखी, पथरीली और कठोर सतह पर लगातार चलने के कारण खुर चटक सकते हैं या उनमें गहरी चोट लग सकती है। शुरुआत में छोटी दिखने वाली यह लापरवाही आगे चलकर पशु के लिए जानलेवा साबित हो सकती है।

चाल और शारीरिक सक्रियता पर पड़ता है बुरा असर

खुरों की किसी भी बीमारी का सीधा प्रभाव घोड़े की स्वाभाविक चाल और उसकी दिनचर्या पर दिखाई देने लगता है। जब खुर के भीतर दर्द या घाव पनपता है, तो घोड़ा चलने-फिरने में असहज महसूस करता है और लंगड़ाने लगता है। तीव्र पीड़ा के चलते पशु चलना-फिरना कम कर देता है, जिससे उसकी सामान्य शारीरिक सक्रियता एकदम घट जाती है। इतना ही नहीं, दर्द से बचने के चक्कर में घोड़ा अपनी चाल बदल लेता है, जिससे पैरों की दूसरी मांसपेशियों, हड्डियों और जोड़ों पर अनावश्यक अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इस असंतुलन से अन्य अंगों में भी विकृति आ सकती है, इसलिए खुर की बनावट या रंगत में तनिक भी फेरबदल दिखते ही तत्काल सतर्क हो जाना चाहिए।

ये भी पढ़ें

नियमित साफ-सफाई और सही रखरखाव के नियम

खुर संबंधी विकारों से बचाव का सबसे कारगर उपाय स्वच्छता का कड़ाई से पालन करना है। पशुपालकों को हर रोज नियमित रूप से खुरों का मुआयना करना चाहिए और खुर के निचले हिस्से में फंसे कंकड़, पत्थर, मिट्टी या सड़ी गंदगी को किसी उपयुक्त औजार से सावधानीपूर्वक निकाल देना चाहिए। अस्तबल और खड़े होने के बाड़े को सूखा तथा स्वच्छ रखना अनिवार्य है। दलदल, कीचड़ अथवा मलमूत्र से सनी जमीन पर घोड़े को कतई खड़ा न रखें। इसके अलावा, निश्चित समयांतराल पर खुरों की संतुलित तराशी और कटाई करवाकर उनका प्राकृतिक आकार बनाए रखना जरूरी होता है।

विशेषज्ञ परामर्श और तकनीकी देखभाल की जरूरत

खुरों की पेचीदा समस्याओं में घर पर मनमाना उपचार करने के बजाय किसी प्रशिक्षित नालबंद अथवा अनुभवी पशु चिकित्सक का सहारा लेना चाहिए। यदि खुर असामान्य रूप से बढ़ चुके हों, उनमें गहरा चीरा या दरार पड़ गई हो, दुर्गंध उठ रही हो, प्रभावित हिस्से में गर्माहट व सूजन आ गई हो या घोड़ा एक पैर पर वजन डालने से कतराए, तो तुरंत चिकित्सीय जांच कराएं। आवश्यकता पड़ने पर खुरों की वैज्ञानिक कटाई, आंतरिक घाव की सफाई और नई नाल लगवाने का कार्य केवल कुशल कारीगर से ही करवाना चाहिए। पशु के आसपास की भौगोलिक स्थिति और जमीन की कठोरता को ध्यान में रखकर खुरों के रखरखाव की समय-सारणी निर्धारित करनी चाहिए।

सतर्कता, संतुलित आहार और दैनिक दिनचर्या का महत्व

नियमित निगरानी रखकर पालक कई गंभीर संकटों को समय से पहले भांप सकते हैं। जब घोड़ा असामान्य गति से चले, किसी एक टांग को जमीन पर टिकाने से बचे, बार-बार खुर झटकाए या खुर छूने पर असामान्य गर्म लगे, तो इसे मामूली बात मानकर नजरअंदाज न करें। पोषण युक्त संतुलित चारा, स्वच्छ पेयजल, रोजाना हल्का व्यायाम और साफ-सुथरा बाड़ा घोड़े की प्रतिरोधक क्षमता मजबूत रखते हैं। यदि खुर में गंभीर सड़न, मवाद या असहनीय दर्द के लक्षण उभरें, तो बिना देरी किए अधिकृत पशु चिकित्सक से समुचित उपचार शुरू कराएं।

सवाल-जवाब

घोड़े के खुरों में संक्रमण होने का मुख्य कारण क्या है?
अस्तबल में अत्यधिक कीचड़, नमी और गंदगी में लंबे समय तक रहने से बैक्टीरिया पनपते हैं, जिससे खुरों में सड़न और संक्रमण होता है।
घोड़े के खुर में दर्द होने पर क्या संकेत दिखाई देते हैं?
घोड़ा लंगड़ाकर चलता है, प्रभावित पैर पर वजन डालने से बचता है, कम घूमता-फिरता है और खुर में गर्माहट या सूजन महसूस होती है।
कठोर जमीन पर चलने से घोड़े के पैरों पर क्या असर पड़ता है?
बहुत सूखी और पथरीली जमीन पर लगातार चलने से खुरों में दरारें पड़ सकती हैं और चोट लग सकती है।
खुरों की सफाई के लिए पशुपालकों को क्या सावधानी बरतनी चाहिए?
रोजाना खुरों की जांच करके उनमें फंसी मिट्टी और कंकड़ निकालने चाहिए तथा रहने की जगह को साफ व सूखा रखना चाहिए।
खुरों में गंभीर दरार या दुर्गंध दिखने पर क्या करना चाहिए?
स्वयं इलाज करने के बजाय प्रशिक्षित नालबंद या पशु चिकित्सक से संपर्क करके खुरों की कटाई और समुचित उपचार कराना चाहिए।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Amit Patel@amit-patel·4 दिन पहले

व्यावसायिक और आर्थिक दृष्टिकोण से, घोड़ों का स्वास्थ्य घुड़सवारी, खेल और कृषि क्षेत्रों में संपत्ति के मूल्य को सीधे प्रभावित करता है। घोड़ा एक मूल्यवान व्यावसायिक संपत्ति है। खुरों की बीमारी से उसकी कार्यक्षमता प्रभावित होती है, जिससे न केवल व्यावसायिक संचालन ठप होता है बल्कि भारी वित्तीय नुकसान और इलाज का खर्च भी बढ़ता है। अस्तबल के बुनियादी ढांचे और नियमित रखरखाव पर किया गया निवेश केवल पशु कल्याण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक महत्वपूर्ण जोखिम प्रबंधन रणनीति है जो व्यावसायिक पूंजी की रक्षा करती है।

Ravikash Gupta@ravikash·4 दिन पहले

घोड़ों के खुरों की सेहत केवल उनके चलने-फिरने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उनके पूरे शरीर की संरचनात्मक स्थिरता को प्रभावित करती है। इस रिपोर्ट से स्पष्ट है कि शुरुआती लक्षणों की अनदेखी पशुओं में गंभीर मस्कुलोस्केलेटल समस्याओं का कारण बनती है। केवल पारंपरिक तरीकों के बजाय प्रशिक्षित नालबंदों और डॉक्टरों की वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाकर ही पशुओं को इस दर्द से बचाया जा सकता है। निवारक प्रबंधन ही इसका एकमात्र दीर्घकालिक समाधान है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·4 दिन पहले

पशु कल्याण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के दृष्टिकोण से, यह मुद्दा स्थानीय पशुपालन विभागों की सक्रियता और नीतिगत हस्तक्षेप की मांग करता है। पारंपरिक तरीकों के स्थान पर प्रशिक्षित नालबंदों और डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए सरकारी स्तर पर कौशल विकास कार्यक्रमों की आवश्यकता है। पशु कल्याण नियमों का कड़ाई से पालन और ब्लॉक स्तर पर जागरूकता अभियान चलाकर ही ग्रामीण क्षेत्रों में इस मूक संकट से निपटा जा सकता है, जिससे पशुपालकों की आर्थिक सुरक्षा भी जुड़ी है।

Rohan Verma@rohan-verma·4 दिन पहले

उत्तर प्रदेश के ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों, विशेषकर ईंट-भट्टों और परिवहन में, घोड़ों और खच्चरों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह रिपोर्ट केवल पशु कल्याण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध गरीब परिवारों की आजीविका और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से है। शासन स्तर पर पशुपालन विभाग को स्थानीय नालबंदों के लिए विशेष प्रशिक्षण शिविर आयोजित करने चाहिए। खुरों की देखभाल पर जागरूकता फैलाकर ही हम इस मूक श्रम बल को लाचारी से बचा सकते हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुचारू रख सकते हैं।

Karan Malhotra@karan-malhotra·4 दिन पहले

रोहन की बात बिल्कुल सही है। कानून-व्यवस्था और लोक सुरक्षा के नजरिए से देखें तो गंभीर रूप से बीमार और लंगड़ाते घोड़ों से जबरन काम कराना 'पशु क्रूरता निवारण अधिनियम' के तहत एक दंडनीय अपराध है। ईंट-भट्टों और व्यावसायिक परिवहन में खुरों की उपेक्षा कर पशुओं को दर्द में धकेलना आपराधिक लापरवाही है। इसके अतिरिक्त, ऐसे अस्वस्थ घोड़ों को सार्वजनिक सड़कों पर उतारना यातायात सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है, जिससे हादसे हो सकते हैं। प्रशासन को इस पर कड़ा रुख अपनाना चाहिए।

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp