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जालोर के खेतों से 15 मुल्कों तक पहुंचा किनोवा, 3500 टन पहुंचा सालाना कारोबारराजस्थान
20 सित॰ 2026, 6:56 am (5 दिन पहले)· 2

जालोर के खेतों से 15 मुल्कों तक पहुंचा किनोवा, 3500 टन पहुंचा सालाना कारोबार

राजस्थान के जालोर जिले में कम पानी वाली किनोवा की खेती किसानों की किस्मत संवार रही है, जहां 100 टन से शुरू होकर उपज का कारोबार अब 3500 टन के पार निकल चुका है।

राजस्थान के जालोर जिले की बंजर और कम पानी वाली जमीन पर अब एक नई कृषि क्रांति आकार ले रही है। पारंपरिक फसलों पर निर्भर रहने वाले स्थानीय किसान अब किनोवा जैसी पौष्टिक फसल को अपनाकर खेती का दायरा बदल रहे हैं। कभी सिर्फ अंतरराष्ट्रीय मंडियों में पहचानी जाने वाली यह फसल अब जालोर के ग्रामीण इलाकों में बड़े पैमाने पर उगाई जा रही है। कम सिंचाई में बेहतर पैदावार देने वाली इस फसल ने जिले के कृषि परिदृश्य को पूरी तरह बदलकर रख दिया है।

प्रसंस्करण और वैल्यू एडिशन से मिला बड़ा बाजार

जालोर के खेतों से कटाई के बाद किनोवा को सीधे मंडियों में नहीं बेचा जाता, बल्कि इसे व्यवस्थित तरीके से प्रसंस्कृत किया जाता है। खेतों से लाई गई उपज को आधुनिक प्रोसेसिंग इकाइयों में पहुंचाया जाता है, जहां सफाई, धुलाई, सुखाने और ग्रेडिंग के कई कड़े चरणों से गुजरने के बाद इसे उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद के रूप में पैक किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया के चलते उत्पाद की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता बढ़ती है और यह देश के प्रमुख महानगरों के साथ-साथ विदेशों के लिए भेजा जाता है।

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पोषण से भरपूर आहार के रूप में वैश्विक मांग

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किनोवा को एक अत्यंत पौष्टिक अनाज के तौर पर मान्यता मिली हुई है। स्वास्थ्य के प्रति जागरूक उपभोक्ताओं के बीच इसकी मांग लगातार बढ़ रही है, क्योंकि इसमें प्रचुर मात्रा में प्रोटीन और फाइबर के साथ-साथ आयरन एवं मैग्नीशियम जैसे आवश्यक पोषक तत्व मौजूद होते हैं। खानपान में विविधता पसंद करने वाले लोग इसे सलाद, खिचड़ी, पुलाव और अन्य कई तरह के सेहतमंद व्यंजनों में प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे इसके उपभोक्ता आधार में तेजी से विस्तार हुआ है।

स्थानीय रोजगार और 3500 टन तक पहुंचा निर्यात

किनोवा उत्पादन ने केवल किसानों की आमदनी ही नहीं बढ़ाई, बल्कि स्थानीय युवाओं और श्रमिकों के लिए रोजगार के नए रास्ते भी खोले हैं। फसल की छंटाई, धुलाई, पैकेजिंग और आपूर्ति श्रृंखला में बड़ी संख्या में लोगों को काम मिल रहा है। कभी महज 100 टन के शुरुआती स्तर से शुरू हुआ जालोर का यह कृषि उद्यम अब 3000 से 3500 टन के सालाना कारोबार तक पहुंच चुका है। आज यहां से तैयार होने वाला किनोवा दुनिया के 15 से अधिक देशों में निर्यात किया जा रहा है, जिसने जालोर को वैश्विक कृषि मानचित्र पर एक विशिष्ट पहचान दिलाई है।

सवाल-जवाब

जालोर में किनोवा की खेती किसानों के लिए क्यों फायदेमंद साबित हो रही है?
किनोवा कम पानी में तैयार होने वाली फसल है, जो जालोर जैसे इलाके के लिए उपयुक्त है और किसानों को पारंपरिक फसलों से अलग नया बाजार देती है।
खेत से कटाई के बाद किनोवा को कैसे तैयार किया जाता है?
फसल को सीधे बाजार भेजने के बजाय प्रोसेसिंग यूनिट में सफाई, धुलाई, सुखाने और ग्रेडिंग के बाद पैक किया जाता है।
किनोवा में कौन-कौन से मुख्य पोषक तत्व पाए जाते हैं?
किनोवा में प्रोटीन और फाइबर के साथ आयरन, मैग्नीशियम और अन्य जरूरी पोषक तत्व भरपूर मात्रा में मौजूद होते हैं।
किनोवा को खानपान में किन रूपों में उपयोग किया जाता है?
इसे सलाद, खिचड़ी, पुलाव और कई प्रकार के पौष्टिक एवं सेहतमंद व्यंजनों में तैयार करके खाया जा सकता है।
जालोर का किनोवा कारोबार कितने टन तक पहुंच चुका है?
100 टन से शुरू हुआ यह कारोबार अब बढ़कर करीब 3000 से 3500 टन सालाना तक पहुंच गया है।
जालोर से तैयार किनोवा कितने देशों में भेजा जा रहा है?
जालोर में प्रसंस्कृत किनोवा वर्तमान में 15 से अधिक देशों में निर्यात किया जा रहा है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Michael Anderson@michael-anderson·4 दिन पहले

जालोर के किनोवा उत्पादन का 15 देशों तक पहुंचना यह साबित करता है कि जलवायु अनुकूल कृषि और वैल्यू एडिशन से ग्रामीण आर्थिकी को वैश्विक स्तर पर जोड़ा जा सकता है। कम पानी की खपत वाली ऐसी फसलें अंतरराष्ट्रीय मांग और स्थानीय रोजगार दोनों मोर्चों पर दीर्घकालिक स्थिरता लाती हैं, जो भविष्य की कृषि नीतियों के लिए एक महत्वपूर्ण मॉडल बन सकती हैं।

Ravikash Gupta@ravikash·4 दिन पहले

जालोर के किनोवा उत्पादन का 3500 टन तक पहुँचना और 15 देशों में निर्यात होना यह साबित करता है कि आधुनिक वैल्यू एडिशन और प्रोसेसिंग से पारंपरिक कृषि को वैश्विक वित्तीय बाज़ार से जोड़ा जा सकता है। कम पानी वाली बंजर जमीन पर इस तरह के नकदी उद्यम न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहे हैं, बल्कि कृषि स्टार्टअप और निर्यात आधारित वित्तीय विकास के नए रास्ते भी खोल रहे हैं।

Arjun Mehta@arjun-mehta·4 दिन पहले

रविकेश जी के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह सफलता दर्शाती है कि नीतिगत स्तर पर कृषि विविधीकरण और सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा देकर बंजर जोत को भी ग्लोबल सप्लाई चेन का हिस्सा बनाया जा सकता है। जालोर का यह मॉडल यह रेखांकित करता है कि निर्यात-उन्मुख नीतियां और स्थानीय स्तर पर प्रोसेसिंग क्लस्टर विकसित करने से किस तरह ग्रामीण भारत को सीधे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का लाभ मिल सकता है, जो भविष्य में कृषि आधारित निर्यात नीति के लिए एक प्रभावी ब्लूप्रिंट बन सकता है।

Rohan Verma@rohan-verma·4 दिन पहले

जालोर में कम पानी वाली जमीन पर किनोवा की सफलता यह साबित करती है कि विपरीत भौगोलिक परिस्थितियों में भी सही प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन से कृषि को वैश्विक स्तर पर कैसे ले जाया जा सकता है। 100 टन से शुरू होकर 3500 टन के सालाना कारोबार और 15 देशों तक पहुंच यह दर्शाती है कि स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन और निर्यात आधारित खेती ग्रामीण अर्थव्यवस्था का नक्शा बदलने की पूरी क्षमता रखती है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·4 दिन पहले

जालोर में किनोवा की यह सफलता सिर्फ एक कृषि उपलब्धि नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़ी एक मजबूत कड़ी है। जब बंजर जमीन पर इस तरह का आर्थिक बदलाव आता है, तो पलायन रुकता है और स्थानीय स्तर पर रोजगार बढ़ने से आपराधिक गतिविधियों की संभावनाओं में भी कमी आती है। 15 देशों तक फैला यह कारोबार इस बात का प्रमाण है कि सही आपूर्ति श्रृंखला और कानूनी-प्रशासनिक समर्थन मिलने पर कृषि आधारित उद्यम ग्रामीण सुरक्षा और समृद्धि दोनों सुनिश्चित कर सकते हैं।

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