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झारखंड में हाथियों के पारंपरिक गलियारे उजड़ने से इंसानी बस्तियों तक बढ़ा संकट, डॉ० डी एस श्रीवास्तव ने समझाया पूरा गणितझारखंड
20 सित॰ 2026, 11:36 am (5 दिन पहले)· 0

झारखंड में हाथियों के पारंपरिक गलियारे उजड़ने से इंसानी बस्तियों तक बढ़ा संकट, डॉ० डी एस श्रीवास्तव ने समझाया पूरा गणित

झारखंड में वन क्षेत्र घटने, खनन और सड़क निर्माण से हाथियों के प्राकृतिक रास्ते बाधित हो रहे हैं, जिससे मानव और वन्यजीव टकराव बढ़ रहा है। पलामू के शोधकर्ता डॉ० डी एस श्रीवास्तव के अनुसार इस संकट का स्थायी समाधान उनके पुराने गलियारों और आवास के संरक्षण में ही छिपा है।

झारखंड के घने जंगलों में हाथियों की चहलकदमी सिर्फ वन्यजीवों की मौजूदगी का प्रमाण नहीं, बल्कि उस पूरे इलाके में पर्याप्त वन क्षेत्र और प्रचुर जल स्रोतों का भी संकेत मानी जाती रही है। इसके बावजूद बीते कुछ दशकों में राज्य के कई हिस्सों से जंगली हाथियों के इंसानी बस्तियों में दाखिल होने, फसलों को रौंदने और आम लोगों पर हमले करने के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। जब कोई जंगली हाथी अचानक रिहायशी इलाकों की तरफ रुख करता है, तो भारी तबाही और जानमाल के नुकसान की आशंका पैदा हो जाती है। इंसान और प्रकृति का सह-अस्तित्व जितना अनिवार्य है, वन्यजीवों के अप्रत्याशित हमलों से बस्तियों को सुरक्षित रखना भी उतना ही अहम पहलू है। हाथियों के इस बदलते बर्ताव और उनसे जुड़े जमीनी हालात पर पलामू के हाथी शोधकर्ता डॉ० डी एस श्रीवास्तव ने गहरी रोशनी डाली है।

मानवीय दखल और सिकुड़ते प्राकृतिक गलियारों की हकीकत

विकास कार्यों की अंधी दौड़ ने जंगलों के भीतरी तंत्र को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। जंगलों के बीच लगातार बढ़ता इंसानी दखल, बेरोकटोक खनन गतिविधियां, सड़कों का जाल और अनियोजित निर्माण कार्य हाथियों के पारंपरिक आवासों को उजाड़ रहे हैं। हाथियों के पीढ़ियों पुराने आवागमन मार्ग यानी कॉरिडोर कट जाने के चलते ये विशालकाय जानवर अपनी प्राकृतिक राह भटक रहे हैं। जब इनके तय रास्ते बीच से टूट जाते हैं, तो भोजन और पानी की तलाश में हाथियों के झुंड भटकते हुए सीधे इंसानी बस्तियों और खेतों में पहुंच जाते हैं। डॉ० डी एस श्रीवास्तव का मानना है कि इस पूरे संकट को केवल हाथियों द्वारा किए गए नुकसान या उनके उग्र होने के नजरिये से नहीं आंका जाना चाहिए, बल्कि उस दबाव को समझना जरूरी है जो इंसानी गतिविधियों ने उनके घरों और रास्तों पर बनाया है।

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झारखंड में हाथियों की ऐतिहासिक मौजूदगी और उनके रूट

झारखंड में हाथियों का एक लंबा और समृद्ध इतिहास रहा है, हालांकि पहले उनकी बसावट कुछ तय और सीमित जंगलों तक ही केंद्रित थी। पुराने समय में मुख्य रूप से पलामू और सिंहभूम के जंगलों में ही हाथियों के झुंड स्पष्ट रूप से दर्ज किए जाते थे। पलामू के वन क्षेत्र में छत्तीसगढ़ के सरगुजा इलाके से हाथियों के आने की पुष्टि होती रही है, और शोधकर्ताओं के अनुसार इन हाथियों का स्वभाव और बर्ताव अन्य क्षेत्रों के हाथियों से काफी अलग माना जाता है। इसी तरह सिंहभूम के विस्तृत जंगलों में ओडिशा के मयूरभंज इलाके से हाथियों का प्राकृतिक आवागमन एक तय कॉरिडोर के जरिए सदियों से होता रहा है। वक्त के साथ इनके मूल प्राकृतिक ठिकानों पर जब दबाव बढ़ा, तो हाथियों ने नए रास्तों की तरफ रुख किया, जिसके चलते अब झारखंड के कई जिलों में हाथियों की लगातार मौजूदगी दिखने लगी है।

मुआवजे की व्यवस्था और बुनियादी नुकसान का बड़ा सवाल

इंसान और हाथियों के बीच होने वाले टकराव में जब ग्रामीणों के घर ढहते हैं, फसलें बर्बाद होती हैं या अन्य संपत्तियों का नुकसान होता है, तो मौजूदा नियमों के तहत सरकार द्वारा प्रभावित लोगों को आर्थिक मुआवजा दिया जाता है। लेकिन डॉ० डी एस श्रीवास्तव एक बेहद बुनियादी सवाल उठाते हैं कि जब इंसानी हरकतों की वजह से इन बेजुबानों के घर और प्राकृतिक रास्ते छीने जाते हैं, तो उस विनाश की भरपाई कैसे की जा सकती है। खनन के निरंतर विस्तार, पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और निर्माण कार्यों से वन्यजीवों का पूरा पारितंत्र चरमरा गया है। प्राकृतिक वातावरण में चारे और पानी का संकट गहराने पर ये झुंड रिहायशी इलाकों की ओर मुड़ते हैं, जिससे टकराव और हिंसक घटनाएं जन्म लेती हैं।

जागरूकता, निगरानी और स्थायी संरक्षण ही असली हल

मानव और हाथी के इस बढ़ते द्वंद्व को थामने के लिए सरकार और वन विभाग नियमित रूप से निगरानी दल तैनात करते हैं, जागरूकता अभियान चलाते हैं और सुरक्षा उपाय अपनाते हैं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक हाथियों के मूल प्राकृतिक गलियारों को कानूनी और जमीनी तौर पर सुरक्षित नहीं किया जाएगा, तब तक यह समस्या खत्म नहीं होगी। हाथियों को महज तबाही मचाने वाले जानवर के रूप में देखने के बजाय उन्हें वन पारिस्थितिकी तंत्र के अभिन्न और जरूरी घटक के रूप में स्वीकार करना होगा। यदि उनके ऐतिहासिक रास्तों को अवैध निर्माण और खनन से मुक्त रखा जाए और जंगलों में उनके प्राकृतिक भोजन-पानी की व्यवस्था सुचारू रहे, तो इंसानी बस्तियों और हाथियों के बीच होने वाले खूनी टकराव को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

सवाल-जवाब

झारखंड में हाथी रिहायशी इलाकों की तरफ क्यों आ रहे हैं?
खनन, सड़क निर्माण और जंगलों में बढ़ते मानवीय दखल के कारण हाथियों के पारंपरिक आवास और गलियारे कट गए हैं, जिससे भोजन-पानी की तलाश में वे बस्तियों तक पहुंच रहे हैं।
डॉ० डी एस श्रीवास्तव कौन हैं और उन्होंने क्या मुद्दा उठाया है?
डॉ० डी एस श्रीवास्तव पलामू के हाथी शोधकर्ता हैं, जिन्होंने हाथियों के उजड़ते प्राकृतिक कॉरिडोर और उनके संरक्षण की आवश्यकता पर विस्तार से बात की है।
पलामू और सिंहभूम में हाथी ऐतिहासिक रूप से कहां से आते रहे हैं?
पलामू क्षेत्र में छत्तीसगढ़ के सरगुजा इलाके से और सिंहभूम क्षेत्र में ओडिशा के मयूरभंज इलाके से हाथियों के आवागमन का प्राकृतिक इतिहास रहा है।
हाथियों द्वारा नुकसान पहुंचाए जाने पर क्या व्यवस्था है?
हाथियों के हमले में घर, फसल या अन्य संपत्ति को नुकसान पहुंचने पर सरकार प्रभावित लोगों को मुआवजा प्रदान करती है।
मानव-हाथी टकराव को कम करने के लिए विशेषज्ञ क्या समाधान बताते हैं?
विशेषज्ञों का कहना है कि हाथियों के पुराने आवासों और पारंपरिक गलियारों की सुरक्षा सुनिश्चित करके ही इस टकराव को स्थायी रूप से रोका जा सकता है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Kavya Nair@kavya-nair·4 दिन पहले

झारखंड का समृद्ध वन क्षेत्र और वन्यजीवन जिम्मेदार ईको-टूरिज्म तथा एडवेंचर ट्रैवल के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। हालांकि, प्राकृतिक गलियारों के कटने और बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष से न केवल स्थानीय सुरक्षा संकट में पड़ती है, बल्कि राज्य की प्राकृतिक पर्यटन क्षमता और सतत पर्यटन स्थलों की छवि को भी गहरा नुकसान पहुंचता है। अगर इन पारंपरिक कॉरिडोर का समय रहते संरक्षण नहीं किया गया, तो वन्यजीवों के साथ-साथ प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक पर्यटन पर आधारित आजीविका के अवसर भी खत्म होने की कगार पर पहुंच जाएंगे।

Arjun Mehta@arjun-mehta·4 दिन पहले

यह संकट बुनियादी तौर पर विकास नीतियों और पर्यावरण संरक्षण के बीच असंतुलन तथा नीतिगत समन्वय की कमी को उजागर करता है। जब बुनियादी ढांचे, खनन और सड़क परियोजनाओं की रूपरेखा तय की जाती है, तो पारंपरिक वन्यजीव गलियारों के संरक्षण को भूमि-उपयोग नीतियों में अनिवार्य स्थान मिलना चाहिए। केवल प्रशासनिक मुआवजा बांटकर जन-सुरक्षा और आजीविका के इस गहरे संकट को नहीं सुलझाया जा सकता; इसके लिए अंतर-राज्यीय गलियारा प्रबंधन और जिम्मेदार शासन की सख्त जरूरत है।

Ravikash Gupta@ravikash·4 दिन पहले

अर्जुन की बात आगे बढ़ाते हुए, आर्थिक और बुनियादी ढांचा नियोजन के नजरिये से देखें तो वन्यजीव गलियारों की अनदेखी दीर्घकालिक निवेश और परिचालन जोखिम को बढ़ाती है। खनन और अवसंरचना परियोजनाओं का मूल्यांकन केवल अल्पकालिक आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं हो सकता। जब अनियोजित विकास से स्थानीय कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है, तो इसका सीधा असर क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ता है। टिकाऊ विकास और ESG मानकों के तहत परियोजनाओं की शुरुआती रूपरेखा में ही प्राकृतिक गलियारों का संरक्षण शामिल करना आवश्यक है, ताकि बुनियादी ढांचे के विस्तार के साथ जन-सुरक्षा और आर्थिक दायित्व का संतुलन बना रहे।

Rohan Verma@rohan-verma·4 दिन पहले

विकास परियोजनाओं और बुनियादी ढांचे के विस्तार में पर्यावरण संतुलन की अनदेखी का खामियाजा अब आम नागरिकों और वन्यजीवों दोनों को भुगतना पड़ रहा है। पलामू और सिंहभूम जैसे अंतरराज्यीय गलियारों में अनियंत्रित खनन व सड़क निर्माण ने हाथियों के प्राकृतिक रास्तों को तोड़ दिया है। जब तक शासन स्तर पर नीतिगत फैसले लेते समय वन्यजीव गलियारों को कानूनी संरक्षण और ढांचागत योजनाओं में प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक केवल मुआवजा बांटने से इस गंभीर मानवीय व सामाजिक संकट का स्थायी समाधान संभव नहीं है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·4 दिन पहले

रोहन की बात को आगे बढ़ाते हुए, कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा के नजरिये से यह स्थिति ग्रामीण इलाकों में गंभीर नागरिक सुरक्षा संकट खड़ी करती है। हाथियों के गलियारे टूटने से होने वाले टकराव सीधे तौर पर आम जन-जीवन को खतरे में डालते हैं और स्थानीय प्रशासन के सामने शांति व्यवस्था बनाए रखने की चुनौती पेश करते हैं। महज मुआवजा देना इसका समाधान नहीं है; वन गलियारों को कानूनी संरक्षण और अदालती मानकों के तहत अतिक्रमण-मुक्त क्षेत्र बनाना होगा। जब तक विकास योजनाओं में कानूनी जवाबदेही और जन-सुरक्षा को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक यह संकट सामाजिक अशांति और कानूनी मुकदमों की वजह बनता रहेगा।

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