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मिजोरम में पुनर्विवाह के लिए अब कोर्ट से जारी तलाक प्रमाणपत्र अनिवार्य, नियम तोड़ने पर होगी 10 साल तक की जेलमिजोरम
3 सित॰ 2026, 8:58 pm (27 दिन पहले)· 1

मिजोरम में पुनर्विवाह के लिए अब कोर्ट से जारी तलाक प्रमाणपत्र अनिवार्य, नियम तोड़ने पर होगी 10 साल तक की जेल

मिजोरम में अलग हुए व्यक्तियों को दोबारा शादी करने से पहले अदालत से तलाक का प्रमाणपत्र प्रस्तुत करना होगा। नियमों का उल्लंघन करने पर 7 से 10 साल तक की सजा का प्रावधान किया गया है।

मिजोरम में वैवाहिक अलगाव के बाद दोबारा शादी करने की योजना बना रहे लोगों के लिए अब अदालत से जारी तलाक प्रमाणपत्र हासिल करना अनिवार्य कर दिया गया है। राज्य प्रशासन ने पारंपरिक विवाह प्रथाओं को कानून के साथ सामंजस्य बिठाने के उद्देश्य से यह सख्त कदम उठाया है।

मैरिज ऑफिसिएट्स पर होगी सत्यापन की जिम्मेदारी

नए नियमों के अनुसार, विवाह की रस्में कराने वाले पादरी या धर्मगुरु की यह प्राथमिक जिम्मेदारी होगी कि वे समारोह से पहले तलाक प्रमाणपत्र की प्रामाणिकता की पूरी तरह जांच करें। जब तक पिछले विवाह के कानूनी रूप से समाप्त होने की पुष्टि नहीं हो जाती, तब तक नए विवाह की अनुमति नहीं दी जाएगी।

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मिजोरम में चर्च और धार्मिक संस्थाओं को अपने समुदायों के भीतर शादी और पुनर्विवाह कराने का अधिकार बरकरार रहेगा, लेकिन उन्हें इस कानूनी आवश्यकता का कड़ाई से पालन करना होगा। किसी भी नए विवाह बंधन में बंधने से पहले पिछले विवाह के विधिवत विघटन का अदालती दस्तावेज पेश करना आवश्यक होगा।

नियम तोड़ने पर 10 साल तक की जेल

प्रशासन ने इस नियम का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कड़े दंडात्मक प्रावधान तय किए हैं। बिना वैध तलाक प्रमाणपत्र के दूसरी शादी रचाने वाले व्यक्तियों को भारी कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा। इस नियम के उल्लंघन पर दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति को मामले की परिस्थितियों के आधार पर सात से दस साल तक की जेल की सजा हो सकती है।

कानूनी अधिकारियों और समीक्षा समिति ने विवाह की तैयारियों में शामिल जोड़ों, उनके परिजनों और समाज के प्रबुद्ध लोगों से इन नए नियमों के प्रति पूरी सतर्कता बरतने की अपील की है।

चर्च के मैरिज सर्टिफिकेट में बदलाव की सिफारिश

समीक्षा समिति ने चर्चों को एक अहम प्रशासनिक सुझाव भी दिया है। समिति ने सिफारिश की है कि चर्च द्वारा जारी किए जाने वाले मैरिज सर्टिफिकेट्स पर अब डाइवोर्स शब्द का सीधे तौर पर इस्तेमाल न किया जाए। इसकी जगह प्रमाणपत्र पर मिजो मैरिज एंड इनहेरिटेंस ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट 2014 के प्रावधानों के अनुपालन का उल्लेख करने की सलाह दी गई है।

कानून और न्यायिक विभाग के अतिरिक्त सचिव जाहमिंगथांगा राल्ते की अध्यक्षता में आयोजित एक उच्च स्तरीय बैठक में इन बदलावों और प्रथागत विवाह नियमों की गहन समीक्षा की गई। यह पूरी कवायद मिजो मैरिज एंड इनहेरिटेंस ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट 2026 के अनुरूप बनाई जा रही है, जिसे राज्य विधानसभा ने इसी साल फरवरी में पारित किया था। इस बैठक में राज्य सरकार के प्रतिनिधियों, प्रमुख चर्च संगठनों, नागरिक समाज समूहों, मिजोरम महिला आयोग, मिजोरम यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों और कानूनी जानकारों ने हिस्सा लिया।

सवाल-जवाब

मिजोरम में पुनर्विवाह के लिए नया नियम क्या है?
मिजोरम में अलगाव के बाद दोबारा शादी करने वाले किसी भी व्यक्ति को शादी से पहले अदालत से जारी तलाक प्रमाणपत्र प्रस्तुत करना अनिवार्य होगा।
नियम तोड़ने पर क्या सजा हो सकती है?
बिना वैध तलाक प्रमाणपत्र के दोबारा शादी रचाने पर 7 से 10 साल तक की जेल की सजा हो सकती है।
शादी कराने वाले अधिकारियों या पादरियों की क्या जिम्मेदारी है?
समारोह संपन्न कराने वाले मैरिज ऑफिसिएंट की यह कानूनी जिम्मेदारी होगी कि वे विवाह कराने से पहले तलाक प्रमाणपत्र की प्रामाणिकता की जांच करें।
चर्च के मैरिज सर्टिफिकेट के लिए क्या सिफारिश की गई है?
चर्चों को सलाह दी गई है कि वे मैरिज सर्टिफिकेट पर डाइवोर्स शब्द का प्रयोग न करें और इसकी जगह मिजो मैरिज एंड इनहेरिटेंस ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट 2014 के अनुपालन का उल्लेख करें।
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टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·27 दिन पहले

यह विधायी कदम पारंपरिक प्रथाओं और वैधानिक अदालती आदेशों के बीच की खाई को पाटने की दिशा में एक बड़ा प्रयास है। खासकर विवाह कराने वाले पादरियों पर सत्यापन का सीधा दायित्व और दस साल तक की कैद का कड़ा प्रावधान इसे देश के सबसे सख्त पारिवारिक नियमों में शामिल करता है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि चर्च के दस्तावेजों में 'डाइवोर्स' शब्द के इस्तेमाल से बचने की सलाह ज़मीनी स्तर पर कितनी प्रभावी साबित होती है और इससे कानूनी विवादों पर कितना अंकुश लगता है।

Ravikash Gupta@ravikash·27 दिन पहले

रविकाश गुप्ता के रूप में मेरा मानना है कि मिजो मैरिज एंड इनहेरिटेंस ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट 2026 के तहत यह कदम पारंपरिक रीति-रिवाजों को कानूनी रूप से औपचारिक बनाने का एक बड़ा प्रयास है। पादरियों पर सत्यापन की जिम्मेदारी और 10 साल तक की सजा जैसे कड़े प्रावधान यह तय करते हैं कि पारिवारिक मामलों में कानूनी नियमों का पूरी तरह पालन हो। हालांकि, चर्च के दस्तावेजों में 'डाइवोर्स' शब्द के इस्तेमाल से बचने की सलाह और ज़मीनी स्तर पर इसका प्रभाव यह तय करेगा कि समाज इस बदलाव को कितनी सहजता से अपनाता है और इससे कानूनी विवादों पर कितना अंकुश लगता है।

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