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मुस्लिम पर्सनल लॉ में 15 साल की उम्र में शादी वैध, पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने सुरक्षा देने के फैसले में दिया बड़ा तर्कहरियाणा
15 सित॰ 2026, 6:52 pm (7 दिन पहले)· 0

मुस्लिम पर्सनल लॉ में 15 साल की उम्र में शादी वैध, पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने सुरक्षा देने के फैसले में दिया बड़ा तर्क

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत 15 वर्ष की आयु पूरी कर चुके लोग अपनी मर्जी से निकाह करने के लिए स्वतंत्र हैं और उन्हें सुरक्षा पाने का पूरा संवैधानिक अधिकार है।

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने युवा जोड़ों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को मजबूत करते हुए एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत प्यूबर्टी (यौवन) हासिल कर चुका कोई भी व्यक्ति अपनी पसंद के साथी से विवाह करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है। यह आदेश एक युवा मुस्लिम जोड़े द्वारा दायर की गई सुरक्षा याचिका पर सुनवाई के दौरान आया, जिन्होंने अपने परिवारों की मर्जी के खिलाफ जाकर निकाह किया था। हाईकोर्ट ने साफ किया कि सामाजिक या पारिवारिक विरोध के बावजूद, भारतीय संविधान के आर्टिकल 21 के तहत मिलने वाले मौलिक अधिकार सर्वोपरि हैं। अदालत ने यह भी साफ किया कि यदि कोई विपरीत मेडिकल या दस्तावेजी प्रमाण न हो, तो 15 वर्ष की आयु पूरी होने पर कानूनन यह मान लिया जाएगा कि व्यक्ति ने प्यूबर्टी हासिल कर ली है।

15 साल की उम्र में प्यूबर्टी की कानूनी धारणा

हाईकोर्ट ने अपने इस फैसले में कानूनी सिद्धांतों का गहराई से विश्लेषण किया और सर दिनशाह फरदूनजी मुल्ला की प्रसिद्ध पुस्तक 'प्रिंसिपल्स ऑफ महोमडन लॉ' के आर्टिकल 195 का विशेष रूप से उल्लेख किया। इस कानूनी ढांचे के अंतर्गत, शादी करने की योग्यता के मामले में प्यूबर्टी प्राप्त करने को वयस्कता (मेजॉरिटी) के समान माना गया है। माननीय अदालत ने इस संबंध में तीन अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांतों को रेखांकित किया। सबसे पहला सिद्धांत 'फ्री विल' यानी स्वतंत्र इच्छा का है, जिसके अनुसार प्यूबर्टी हासिल कर चुका कोई भी मुस्लिम लड़का या लड़की अपनी पसंद के जीवनसाथी से विवाह करने का पूरा कानूनी अधिकार रखता है।

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दूसरा सिद्धांत 'पेरेंटल वीटो' यानी माता-पिता या अभिभावकों के हस्तक्षेप को पूरी तरह खारिज करता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि परिवार या संरक्षकों के पास ऐसी शादी को रोकने, उसे अवैध घोषित करने या उसमें दखल देने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। तीसरा बिंदु 'लीगल प्रिजंपशन' यानी कानूनी धारणा का है, जिसके तहत जब तक कोई ठोस मेडिकल या दस्तावेजी सबूत विपरीत परिस्थिति को साबित न करे, तब तक 15 साल की उम्र पार करने वाले हर व्यक्ति को कानूनन प्यूबर्टी हासिल कर चुका माना जाएगा।

आर्टिकल 21 और जीवन व सुरक्षा का मौलिक अधिकार

यह पूरा मामला तब अदालत के समक्ष आया जब एक नवविवाहित मुस्लिम जोड़े ने सुरक्षा की गुहार लगाते हुए हाईकोर्ट का रुख किया। इस जोड़े का आरोप था कि अपनी मर्जी से शादी करने के कारण उन्हें अपने ही परिजनों से जान-माल का गंभीर खतरा सता रहा है। इस संवेदनशील मुद्दे पर सुनवाई करते हुए अदालत ने भारतीय संविधान के आर्टिकल 21 का हवाला दिया, जो देश के प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है। हाईकोर्ट ने दृढ़ता से कहा कि जब देश के किसी नागरिक की जान और आजादी पर खतरा मंडरा रहा हो, तो अदालतें अपनी आंखें बंद नहीं रख सकतीं। भले ही यह निकाह परिवार के सदस्यों की सहमति के बिना हुआ हो, लेकिन इस आधार पर किसी भी व्यक्ति को सुरक्षा और गरिमा के साथ जीने के उसके बुनियादी संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।

पर्सनल लॉ और सामान्य कानूनों के बीच का कानूनी द्वंद्व

हाईकोर्ट का यह फैसला भारत में चल रही एक बेहद व्यापक और जटिल कानूनी बहस को दोबारा चर्चा के केंद्र में ले आया है। इस बहस के एक छोर पर विभिन्न पर्सनल लॉ हैं, तो दूसरी तरफ POCSO (पॉक्सो) और PCMA (बाल विवाह निषेध अधिनियम) जैसे बेहद कड़े सामान्य कानून मौजूद हैं। सामान्य नागरिक कानूनों के तहत भारत में शादी के लिए लड़कियों की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष और लड़कों के लिए 21 वर्ष निर्धारित की गई है। इसके विपरीत, जब अपनी मर्जी से घर छोड़कर शादी करने वाले जोड़ों के जीवन और स्वतंत्रता पर बन आती है, तो विभिन्न उच्च न्यायालयों ने बार-बार मानवीय और संवैधानिक रुख अपनाया है। ऐसे मामलों में अदालतों ने अक्सर पर्सनल लॉ के तहत प्यूबर्टी के नियमों को मान्यता दी है ताकि संकट में घिरे जोड़ों को आवश्यक पुलिस सुरक्षा प्रदान की जा सके और उनके जीवन की रक्षा की जा सके।

सवाल-जवाब

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने मुस्लिम विवाह की आयु पर क्या फैसला दिया है?
कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत प्यूबर्टी हासिल कर चुका कोई भी व्यक्ति (जिसकी कानूनी धारणा 15 वर्ष की आयु है) अपनी पसंद से निकाह करने के लिए स्वतंत्र है।
क्या माता-पिता इस प्रकार के विवाह को अवैध घोषित करा सकते हैं?
नहीं, अदालत के अनुसार परिवार या गार्जियंस के पास ऐसे जोड़े की मर्जी के विवाह को रोकने या उसे अवैध ठहराने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
कानूनन प्यूबर्टी की उम्र क्या मानी गई है?
जब तक कोई विपरीत मेडिकल या दस्तावेजी सबूत न हो, तब तक 15 वर्ष की आयु पूरी करने पर कानूनन प्यूबर्टी हासिल मान लिया जाएगा।
अदालत ने किस संवैधानिक अधिकार के तहत जोड़े को सुरक्षा प्रदान की?
अदालत ने भारतीय संविधान के आर्टिकल 21 का हवाला देते हुए जोड़े की सुरक्षा सुनिश्चित की, जो प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है।
यह नियम सामान्य नागरिक कानून से किस प्रकार भिन्न है?
सामान्य नागरिक कानून के तहत लड़कियों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 18 वर्ष और लड़कों के लिए 21 वर्ष है, लेकिन कोर्ट ने इस मामले में पर्सनल लॉ के नियमों को प्राथमिकता दी।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Ananya Iyer@ananya-iyer·5 दिन पहले

मनोरंजन और सिनेमा हमेशा से व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक मर्यादाओं के टकराव को पर्दे पर दिखाता रहा है। कोर्ट द्वारा आर्टिकल 21 के तहत निजी पसंद की आजादी को प्राथमिकता देना यह दर्शाता है कि समाज और कानून का यह द्वंद्व ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और फिल्मों के लिए भी एक विचारणीय विषय बनेगा। मनोरंजन जगत के क्रिएटर्स अब ऐसी कहानियों में व्यक्तिगत अधिकारों, पारिवारिक विरोध और कानूनी प्रावधानों के बीच फंसे युवाओं के संघर्ष को अधिक यथार्थवादी ढंग से पेश करेंगे, जिससे पॉप कल्चर में भी इस मुद्दे पर गहराई से विमर्श देखने को मिलेगा।

Ravikash Gupta@ravikash·5 दिन पहले

यह फैसला व्यक्तिगत कानूनों, बाल कल्याण कानूनों और संविधान के अनुच्छेद 21 के बीच लंबे समय से चले आ रहे जटिल संतुलन को उजागर करता है। उच्च न्यायालय ने साफ तौर पर मौलिक अधिकारों और व्यक्तिगत सुरक्षा को सामाजिक या पारिवारिक दबाव से ऊपर रखा है। हालांकि, पर्सनल लॉ के तहत विवाह की आयु और विशेष कानूनों के बीच तालमेल को लेकर न्यायिक हलकों में स्पष्टता की मांग आगे भी बनी रहेगी। भविष्य में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शीर्ष अदालत ऐसे मामलों में संवैधानिक स्वतंत्रता और बाल संरक्षण के बीच कैसे संतुलन स्थापित करती है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·5 दिन पहले

रविकेश की बात को आगे बढ़ाते हुए, यह फैसला संसद और कार्यपालिका के समक्ष मौजूद नीतिगत चुनौतियों को भी रेखांकित करता है। बाल विवाह निषेध कानून और विभिन्न पर्सनल लॉ के बीच विरोधाभास लंबे समय से विधायी अस्पष्टता का कारण रहा है। राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से, ऐसे न्यायिक आदेश पूरे देश में विवाह की एक समान वैधानिक आयु तय करने से जुड़े नीतिगत विमर्श को और तेज़ करेंगे। अब देखना यह होगा कि क्या विधायिका केंद्रीय बाल संरक्षण कानूनों की सर्वोच्चता को स्पष्ट करने के लिए कानून में आवश्यक संशोधन करती है या यह विषय केवल अदालती व्याख्याओं पर निर्भर रहेगा।

Rohan Verma@rohan-verma·6 दिन पहले

यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों के दायरे को स्पष्ट करता है, लेकिन इसके साथ ही यह बाल विवाह निषेध अधिनियम जैसे धर्मनिरपेक्ष कानूनों और पर्सनल लॉ के बीच चल रही कानूनी बहसों को भी नए सिरे से सामने लाता है। जमीनी स्तर पर ऐसे मामलों में पुलिस सुरक्षा और सामाजिक गतिशीलता को संभालना स्थानीय प्रशासन के लिए एक संवेदनशील चुनौती बना रहेगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·6 दिन पहले

रोहन वर्मा के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह देखना महत्वपूर्ण है कि कानूनी रूप से मुस्लिम पर्सनल लॉ और धर्मनिरपेक्ष कानूनों के बीच का यह अंतर्विरोध अदालतों के सामने बार-बार आ रहा है। आर्टिकल 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा तो हो जाती है, लेकिन बाल विवाह के अन्य कानूनी पहलुओं के साथ इसका टकराव ज़मीनी स्तर पर कानून-व्यवस्था और पुलिस के लिए गंभीर पशोपेश पैदा करता है। आगे चलकर इस तरह के मामलों में न्यायपालिका को और स्पष्ट दिशा-निर्देश तय करने पड़ सकते हैं ताकि संवैधानिक सुरक्षा और वैधानिक जटिलताओं के बीच संतुलन बना रहे।

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