पलानी के अरुलमिगु दंडायुथपानी स्वामी मठ से जुड़े करीब 100 करोड़ रुपये के जमीन घोटाले की जांच ने अब रफ्तार पकड़ ली है। तमिलनाडु की सीबीसीआईडी टीम ने शुक्रवार को डिंडीगुल स्थित अपने दफ्तर में मंदिर और राजस्व विभाग के आधा दर्जन से ज्यादा अधिकारियों को बुलाकर उनसे पूछताछ की।
कैसे हुआ यह जमीन फर्जीवाड़ा
डिंडीगुल जिले में पलानी की तलहटी पर सन्निधि स्ट्रीट पर स्थित यह जमीन बाजार में करीब 100 करोड़ रुपये की आंकी जाती है। आरोप है कि फर्जी दस्तावेजों के सहारे और अदालत के आदेशों को पूरी तरह दरकिनार करते हुए इसे महज 2 करोड़ रुपये में रजिस्टर करा लिया गया, जबकि असली कीमत इससे कई गुना ज्यादा है।
शिकायत और पहला केस
यह मामला सामने आया पलानी मंदिर भूमि प्रभाग के अधीक्षक एस. मुरुगनंदम की शिकायत के बाद। उनकी शिकायत पर पलानी की तलहटी थाना पुलिस ने साजिश और धोखाधड़ी समेत नए आपराधिक कानूनों की 5 धाराओं में मामला दर्ज किया। एफआईआर में सब-रजिस्ट्रार जस्टिन मणिकंदन, खुद को एक फर्जी ट्रस्ट का सदस्य बताने वाले मुरुगादास और तीन अन्य लोगों के नाम दर्ज किए गए हैं।
राज्य सरकार ने सौंपा सीबीसीआईडी को केस
मामले की गंभीरता को देखते हुए तमिलनाडु सरकार ने जांच सीबीसीआईडी को सौंप दी। एजेंसी ने गुरुवार को अपनी अलग एफआईआर दर्ज की और दो से ज्यादा अधिकारियों को इस जांच में लगाया, ताकि कम समय में मामले की तह तक पहुंचा जा सके।
डिंडीगुल दफ्तर में हुई पूछताछ
शुक्रवार को मदुरै से डिंडीगुल पहुंचीं जिला सीबीसीआईडी अधीक्षक साजिता ने खुद मोर्चा संभाला और पांच से ज्यादा अधिकारियों से पूछताछ की। इनमें शिकायतकर्ता मुरुगनंदम के अलावा राजस्व विभाग के तहसीलदार और ग्राम प्रशासन अधिकारी भी शामिल रहे, जिनकी भूमिका जमीन के रिकॉर्ड जांचने में मानी जाती है। मंदिर के एचआर एंड सीई प्रशासन से जुड़े पांच से अधिक अधिकारी भी इस पूछताछ के दायरे में आए।
हाईकोर्ट ने बिक्री विलेख को बताया रद्द
इससे पहले मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने मठ की अपील मंजूर करते हुए बड़ा फैसला सुनाया था। जस्टिस सीवी कार्तिकेयन और आर शक्तिवेल की खंडपीठ ने पलानी की 1.35 एकड़ जमीन से जुड़े विवादित बिक्री विलेख को पूरी तरह रद्द और अमान्य करार दिया। इस फैसले ने सिंगल बेंच के उस पुराने आदेश को पलट दिया, जिसमें सब-रजिस्ट्रार को दस्तावेज सही पाए जाने पर उसका पंजीकरण करने को कहा गया था।
निलंबित सब-रजिस्ट्रार ने मांगी अग्रिम जमानत
विवादित दस्तावेज दर्ज करने वाले तत्कालीन प्रभारी सब-रजिस्ट्रार जस्टिन मणिकंदन सुब्रमण्यम को इस मामले में निलंबित किया जा चुका है। गिरफ्तारी की आशंका के बीच उन्होंने हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत के लिए याचिका दाखिल की, जिसमें उन्होंने दलील दी कि उन्होंने केवल हाईकोर्ट के पहले के आदेश का पालन करते हुए ही पंजीकरण किया था।
मठ ने अपील में उठाए ये सवाल
मठ ने अपनी अपील में कहा कि सिंगल बेंच का आदेश कानूनी और तथ्यात्मक, दोनों ही लिहाज से गलत था और बिना सभी जरूरी पक्षों को सुने ही याचिका को शुरुआती स्तर पर मंजूरी दे दी गई। मठ के वकीलों का कहना था कि पूरी प्रक्रिया इस तरह रची गई कि संस्था की निगरानी पूरी तरह दरकिनार हो जाए, क्योंकि जमीन के पंजीकरण की मांग वाली याचिका में मठ को पक्षकार ही नहीं बनाया गया, जबकि जमीन उसी की थी। मठ के मुताबिक बिक्री विलेख ऐसे तैयार किया गया मानो जमीन किसी निजी ट्रस्ट की हो, जबकि हकीकत में वह मठ की संपत्ति थी, और पूरी सुनवाई मठ की जानकारी के बिना ही हो गई। यह भी दलील दी गई कि सिंगल बेंच ने इस तथ्य को नजरअंदाज किया कि जमीन का वास्तविक कब्जा थक्कर के पास ही था, और अगर यह गड़बड़ भरा पंजीकरण बरकरार रहता, तो आगे और विवाद खड़े होते।
अलग एफआईआर और 1888 का पुराना दस्तावेज
पलानी आदिवरम पुलिस ने भी उसी 1.35 एकड़ जमीन के दो निजी व्यक्तियों के नाम पर फर्जी पंजीकरण को लेकर अलग से मामला दर्ज किया है, जो मठ के ही एक ट्रस्टी की शिकायत पर आधारित है। मंदिर प्रशासन का दावा है कि यह जमीन पूरी तरह दंडापाणि स्वामी मठ की है, और उसने पंजीकरण महानिरीक्षक से बिक्री विलेख रद्द करने की मांग की है, यह कहते हुए कि यह सौदा कई अदालती आदेशों का उल्लंघन करके किया गया। यह जमीन पलानी शहर के वार्ड नंबर 3 में आती है और पुराने सर्वे नंबर 998 और 999 से जुड़ी है। मंदिर के रिकॉर्ड के मुताबिक यह जमीन 1888 में हुए एक धर्मार्थ व्यवस्था विलेख के जरिए मठ को समर्पित की गई थी, जिसमें साफ लिखा है कि यह संपत्ति सिर्फ मठ के रखरखाव, धार्मिक गतिविधियों और भक्तों की सेवा के लिए है, इसे कभी निजी संपत्ति की तरह बेचा या हस्तांतरित नहीं किया जा सकता।




















