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करौली में पांच रुपये के गुलाब लच्छे आज भी बच्चों के बने हैं पसंदीदा, बुजुर्गों को याद दिलाते हैं बीता जमानाखानपान
20 सित॰ 2026, 11:10 pm (31 मिनट पहले)· 0

करौली में पांच रुपये के गुलाब लच्छे आज भी बच्चों के बने हैं पसंदीदा, बुजुर्गों को याद दिलाते हैं बीता जमाना

आधुनिक मिठाइयों के दौर में भी करौली के गुलाब लच्छे अपनी खास मिठास, अनोखी बनावट और 5 रुपये की मामूली कीमत की वजह से हर उम्र के लोगों को लुभा रहे हैं।

बाजार में चॉकलेट और फैंसी कन्फेक्शनरी के बढ़ते चलन के बीच पारंपरिक भारतीय मिठास का जादू आज भी फीका नहीं पड़ा है। राजस्थान के करौली में मिलने वाली पारंपरिक मिठाई गुलाब लच्छे आज भी हर उम्र के लोगों को अपनी ओर खींच रही है। अनोखे रूप-रंग और पुरानी मिठास से सजी यह मिठाई केवल नन्हे बच्चों का ही मन नहीं ललचाती, बल्कि परिवार के बुजुर्गों को भी उनके सुनहरे बचपन की यादों में ले जाती है।

सड़क पर गूंजता अनोखा नारा और बच्चों की दीवानगी

करौली की गलियों और ग्रामीण हाट-बाजारों में इस मिठाई को लेकर बच्चों के बीच एक खास तुकबंदी बरसों से दोहराई जाती रही है। बच्चे खेलते-कूदते अक्सर कहते हैं कि गुलाब लच्छे, खाने में अच्छे, 10 के दो, लपक कर लो। इस मजेदार नारे के साथ बिकने वाली यह रंग-बिरंगी मिठाई देखते ही बच्चों का ध्यान खींच लेती है। ठेले या दुकान पर इसे सजा देखकर बच्चे अक्सर अपने अभिभावकों से इसे दिलाने की जिद करने लगते हैं। यह स्थानीय बाल संस्कृति का एक जीवंत हिस्सा बन चुकी है।

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पीढ़ियों का जुड़ाव और पुरानी यादों का अहसास

यह पारंपरिक मिठास सिर्फ आज की नई पीढ़ी को ही नहीं लुभा रही, बल्कि बड़े-बुजुर्गों के दिल में भी इसके लिए खास जगह है। पुरानी पीढ़ी के लोगों का कहना है कि जब वे खुद छोटे थे, तब मेलों और बाजारों में इसी मिठाई का भरपूर स्वाद लेते थे। अब दशकों बाद जब वे अपने पोते-पोतियों के हाथ में इसे देखते हैं, तो उन्हें अपना बीता हुआ दौर याद आ जाता है। पीढ़ियां बदलने के बाद भी इस मिठाई का यह भावनात्मक रिश्ता जस का तस बना हुआ है।

महंगाई के दौर में सिर्फ 5 रुपये का किफायती भाव

मौजूदा समय में जहां आम जरूरत की चीजों और ब्रांडेड मिठाइयों के दाम आसमान छू रहे हैं, वहीं गुलाब लच्छे अपनी बेहद कम कीमत की वजह से चर्चा में रहते हैं। आज भी यह मिठाई मात्र 5 रुपये में आसानी से मिल जाती है। दस रुपये में दो मिलने वाली यह किफायती मिठास समाज के हर तबके के बजट में पूरी तरह फिट बैठती है। यही वजह है कि कम जेब खर्च में भी बच्चे इसे खुशी-खुशी खरीद लेते हैं।

गजक की तरह खींचकर तैयार करने की मुश्किल कारीगरी

इस मिठाई के निर्माण से जुड़े स्थानीय व्यापारी राजेश गुप्ता का कहना है कि गुलाब लच्छे तैयार करना काफी मेहनत का काम है। इसे बनाने का तरीका काफी हद तक सर्दियों में बनने वाली गजक से मिलता-जुलता है, जिसमें चाशनी को हाथों से लगातार खींचा जाता है। कारीगर सबसे पहले गाढ़ी चाशनी तैयार करते हैं और फिर उसमें भुना हुआ मैदा मिलाया जाता है। इसके बाद मिश्रण को बार-बार खींचकर लच्छेदार रेशेदार रूप दिया जाता है और अंत में मनचाहा आकार बनता है। राजेश गुप्ता के अनुसार, एक घंटे की कड़ी मेहनत के बाद लगभग 100 गुलाब लच्छे बनकर तैयार होते हैं।

समय बदला लेकिन नहीं बदली करौली की यह मिठास

खान-पान की दुनिया में नित नए बदलाव आने के बावजूद करौली और उसके आसपास के देहाती इलाकों में गुलाब लच्छे का क्रेज जरा भी कम नहीं हुआ है। हाथों की इस पारंपरिक कारीगरी ने खुद को बदलते वक्त के थपेड़ों से बचाकर रखा है और यह मिठाई आज भी स्थानीय सांस्कृतिक पहचान का एक मीठा प्रतीक बनी हुई है।

सवाल-जवाब

गुलाब लच्छे क्या हैं और यह कहां सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं?
गुलाब लच्छे एक पारंपरिक लच्छेदार मीठा व्यंजन है, जो राजस्थान के करौली और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों और बड़ों के बीच बेहद लोकप्रिय है।
गुलाब लच्छे की मौजूदा कीमत क्या है?
यह पारंपरिक मिठाई आज भी बेहद सस्ती है और मात्र 5 रुपये में एक तथा 10 रुपये में दो पीस मिलती है।
गुलाब लच्छे बनाने के लिए किन सामग्रियों का इस्तेमाल किया जाता है?
इसे मुख्य रूप से चीनी की गाढ़ी चाशनी और भुने हुए मैदे के मिश्रण से तैयार किया जाता है।
गुलाब लच्छे को तैयार करने की प्रक्रिया क्या है?
कारीगर चाशनी और भुने मैदे के घोल को गजक की तरह हाथों से बार-बार खींचते हैं, जिससे इसमें रेशेदार लच्छे बनते हैं और फिर इन्हें खास आकार दिया जाता है।
एक घंटे में लगभग कितने गुलाब लच्छे बनाए जा सकते हैं?
स्थानीय व्यापारी राजेश गुप्ता के अनुसार, एक घंटे की कड़ी मेहनत में लगभग 100 गुलाब लच्छे बनकर तैयार होते हैं।
गुलाब लच्छों को लेकर बच्चों के बीच कौन सा नारा प्रसिद्ध है?
करौली में बच्चों के बीच 'गुलाब लच्छे, खाने में अच्छे, 10 के दो, लपक कर लो' का तुकबंदी भरा नारा काफी मशहूर है।
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टिप्पणियाँ 2

Divya Reddy@divya-reddy·7 मिनट पहले

यह खबर केवल एक पुरानी मिठाई की नहीं, बल्कि हमारी लोक संस्कृति और स्थानीय बाल मनोविज्ञान के अनूठे जुड़ाव को दर्शाती है। महज पाँच रुपये की कीमत यह साबित करती है कि बच्चों के लिए खुशी और सामाजिक मेलजोल महंगे विज्ञापनों या विदेशी ब्रांडों पर निर्भर नहीं हैं। भविष्य में ऐसे पारंपरिक कुटीर उद्योगों को यदि कौशल विकास और एमएसएमई योजनाओं से जोड़ा जाए, तो स्थानीय कारीगरों की इस पारंपरिक कला को वैश्विक पहचान मिल सकती है और रोजगार के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं।

Ravikash Gupta@ravikash·7 मिनट पहले

यह स्थानीय मिठास महज़ बालपन की याद नहीं, बल्कि हमारी सूक्ष्म ग्रामीण अर्थव्यवस्था की सहनशक्ति का प्रमाण है। जहाँ वैश्विक ब्रांड अपनी सप्लाई चेन के दबाव में महँगे होते जा रहे हैं, वहीं मात्र पाँच रुपये की यह परम्परा बिना किसी कॉर्पोरेट निवेश के मुद्रास्फीति के झटकों को झेल रही है। यदि इसे डिजिटल भुगतान और स्थानीय एमएसएमई क्लस्टर के साथ जोड़ दिया जाए, तो यह पारंपरिक कारीगरी ग्रामीण भारत में एक बेहतरीन माइक्रoeconomic मॉडल बन सकती है।

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