उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में आयोजित अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी सम्मेलन के दौरान सभागार में कुर्सियां खाली रहने की घटना ने राज्य के सियासी गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। 24 सितंबर को आयोजित इस महासम्मेलन में उम्मीद के मुताबिक भीड़ न जुटने और प्रमुख नेताओं की गैरमौजूदगी के दृश्य सामने आने के बाद विपक्षी खेमा पूरी तरह हमलावर हो गया है। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी पर तीखा तंज कसा है और दावा किया है कि पिछड़े वर्ग के लोगों ने सत्तारूढ़ दल की नीतियों को पूरी तरह नकार दिया है।
बरेली के पिछड़ा वर्ग सम्मेलन में क्या हुआ
बरेली में 24 सितंबर को पिछड़ा वर्ग सम्मेलन का आयोजन किया गया था, जिसका मुख्य उद्देश्य अन्य पिछड़ा वर्ग समुदाय के लोगों को संगठित करना और उनसे संवाद स्थापित करना था। हालांकि, कार्यक्रम स्थल पर नजारा बिल्कुल उलट देखने को मिला जब आयोजन स्थल पर लगाई गई अधिकांश कुर्सियां खाली पड़ी रहीं। इस सम्मेलन में कई बड़े नेताओं को भी शामिल होना था, लेकिन वे भी मंच तक नहीं पहुंचे। वहां मौजूद सांसद और स्थानीय पदाधिकारी काफी समय तक लोगों के जुटने का इंतजार करते दिखे। जब सभागार में पर्याप्त संख्या में लोग नहीं पहुंचे, तो जनप्रतिनिधियों ने व्यस्तता और अन्य कारणों का हवाला दिया। इस स्थिति ने स्थानीय स्तर पर राजनीतिक चर्चाओं को गर्म कर दिया।
अखिलेश यादव ने साधा तीखा निशाना
इस पूरे मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने एक्स पर लिखा कि सम्मेलन में कुर्सियां खाली ही रह गईं और मंच पर सांसद व स्थानीय नेता कई घंटों तक जनता के आने की प्रतीक्षा करते रहे। उन्होंने आरोप लगाया कि भ्रष्टाचार का सहारा लेकर भी लोगों का समर्थन नहीं जुटाया जा सका। अखिलेश यादव ने पीडीए यानी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समाज का जिक्र करते हुए कहा कि जनता सच्चाई समझ चुकी है और इस तरह के आयोजनों से वास्तविक मुद्दों से ध्यान नहीं भटकाया जा सकता। उन्होंने दावा किया कि पिछड़े वर्ग के लोग अब झूठे दावों के बहकावे में आने वाले नहीं हैं।
ओबीसी समुदाय को साधने की राजनीतिक होड़
उत्तर प्रदेश की राजनीति में अन्य पिछड़ा वर्ग हमेशा से बेहद निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। राज्य में विभिन्न दल लगातार ओबीसी वोटरों को अपने पाले में लाने के लिए प्रयासरत रहते हैं। कुछ दिन पहले ही 19 सितंबर को बरेली में कांग्रेस ने भी पिछड़ा वर्ग सम्मेलन आयोजित किया था, जिसमें राजेंद्र पाल गौतम ने शिक्षा, रोजगार और निजीकरण जैसे मुद्दों को उठाते हुए मौजूदा सरकार पर कड़े सवाल दागे थे। वहीं दूसरी तरफ, भारतीय जनता पार्टी भी समय-समय पर ओबीसी मोर्चा के माध्यम से संवाद कार्यक्रम और महासम्मेलन करती रही है, जैसे पूर्व में मेरठ और सिसवा में आयोजित सम्मेलनों में विपक्षी दलों के पीडीए फॉर्मूले को खारिज करने की कोशिश की गई थी। इटावा में हुए युवा संवाद में भी पिछड़े वर्ग को जोड़ने की रणनीति पर जोर दिया गया था। बरेली का यह हालिया घटनाक्रम इसी राजनीतिक रस्साकशी का ताजा हिस्सा है।
भारतीय जनता पार्टी के बारे में
भारतीय जनता पार्टी भारत की दो प्रमुख राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों में से एक है और साल 2014 से केंद्र की सत्ता में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में यह दल राष्ट्रीय स्तर के साथ-साथ कई राज्यों में सत्ता का संचालन कर रहा है। दक्षिणपंथी विचारधारा और पारंपरिक राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से जुड़ी इस पार्टी के वैचारिक संबंध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से हैं। 18 दिसंबर 2023 तक देशभर में पार्टी के कुल 1,435 विधायक मौजूद थे, जिससे यह संसद और विभिन्न विधानसभाओं में सबसे अधिक प्रतिनिधित्व वाली पार्टी बन चुकी है। अक्टूबर 2022 तक के आंकड़ों के अनुसार, 17 करोड़ से ज्यादा सदस्यों के साथ यह दुनिया का सबसे बड़ा राजनीतिक संगठन होने का दावा करती है।
जनता की प्रतिक्रिया
सोशल मीडिया पर इस पूरे घटनाक्रम को लेकर आम लोगों और कार्यकर्ताओं के बीच मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। जहां कई उपयोगकर्ताओं ने खाली कुर्सियों को सत्ता पक्ष के प्रति जनाक्रोश और पीडीए की मजबूती का संकेत बताया, वहीं अन्य लोगों का कहना था कि यह कोई आधिकारिक राजनीतिक रैली नहीं बल्कि एक सामाजिक मंच था, जिस पर बेवजह की राजनीति की जा रही है।



























