समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने स्वतंत्रता सेनानी जयप्रकाश नारायण की जयंती के मौके पर भारतीय जनता पार्टी की सरकार पर कड़ा राजनीतिक हमला बोला है। सोशल मीडिया मंच एक्स पर साझा किए गए अपने संदेश में उन्होंने मौजूदा शासन व्यवस्था की तुलना तानाशाही प्रवृत्तियों से करते हुए आरोप लगाया कि जेपी जैसे महान व्यक्तित्व की विरासत को प्रशासनिक पाबंदियों के दायरे में बांधने की कोशिश की जा रही है।
काव्यात्मक तंज के जरिए प्रशासनिक रुख पर उठाए सवाल
अखिलेश यादव ने अपनी बात की शुरुआत एक संक्षिप्त काव्यात्मक तंज से की, जिसमें उन्होंने मौजूदा सत्ताधारियों की सोच पर ताले लगे होने का आरोप लगाया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में लिखा कि स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व करने वाले जयप्रकाश नारायण को आज भाजपा के शासनकाल में प्रतीकात्मक रूप से कैद कर दिया गया है। उनका कहना था कि महापुरुषों को याद करने और उनके प्रति सम्मान प्रकट करने के अवसरों पर ऐसी प्रशासनिक रुकावटें खड़ी करना लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों के पूरी तरह विपरीत है।
श्रद्धांजलि अर्पण पर रोक की तुलना ऐतिहासिक तानाशाही से
सपा प्रमुख ने अपने बयान को और धार देते हुए कहा कि इतिहास के सबसे क्रूर तानाशाहों ने भी शायद किसी महापुरुष की जयंती पर इस तरह श्रद्धांजलि देने के रास्ते नहीं रोके होंगे। उनके मुताबिक, किसी राष्ट्रीय नायक के स्मारक तक पहुंचने से रोकना और सार्वजनिक सम्मान जताने के अधिकार को सीमित करना शासन के डर और संकीर्ण मानसिकता को उजागर करता है।
जेपी की विरासत और जेपीएनआईसी परिसर से जुड़ा विवाद
यह पूरा राजनीतिक टकराव लखनऊ स्थित जयप्रकाश नारायण अंतर्राष्ट्रीय केंद्र यानी जेपीएनआईसी परिसर और वहां जेपी की प्रतिमा पर माल्यार्पण से जुड़ी प्रशासनिक पाबंदियों के संदर्भ में सामने आया है। हर साल 11 अक्टूबर को जयप्रकाश नारायण की जयंती के अवसर पर इस परिसर में सुरक्षा और अधूरे निर्माण कार्यों का हवाला देकर आवाजाही सीमित कर दी जाती है। समाजवादी पार्टी का मानना है कि यह रोक सुरक्षा कारणों से नहीं बल्कि राजनीतिक विद्वेष के चलते लगाई जाती है, जिससे पूर्व घोषित कार्यक्रमों को बाधित किया जा सके।
जनता की प्रतिक्रिया
इस बयान के सार्वजनिक होते ही सोशल मीडिया पर लोगों की ओर से मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। जहां कई नागरिकों ने विपक्ष की आवाज को जायज ठहराते हुए महापुरुषों के सम्मान पर रोक को सत्ता का अहंकार बताया, वहीं कई उपयोगकर्ताओं ने विपक्षी दलों पर केवल साल में एक दिन जयंती के अवसर पर राजनीति चमकाने और विकास परियोजनाओं को अधूरा छोड़ने को लेकर सवाल भी खड़े किए।































