अफगानिस्तान की सीमा पर सुरक्षा बलों ने एक बड़े सैन्य अभियान को अंजाम देते हुए घुसपैठ की साजिश को पूरी तरह नाकाम कर दिया है। नूरिस्तान प्रांत के कामदेश जिले में डूरंड लाइन के पार से दाखिल हुए सशस्त्र लड़ाकों पर अफगान सुरक्षा और रक्षा बलों ने जोरदार प्रहार किया। इस मुठभेड़ में 41 आतंकी मारे गए, जबकि 62 लड़ाकों को जिंदा गिरफ्तार कर लिया गया। पकड़े गए लड़ाकों ने सुरक्षा बलों के सामने पूछताछ के दौरान कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं, जिनसे यह स्पष्ट हुआ है कि किस तरह आर्थिक तंगी और बेरोजगारी से जूझ रहे युवाओं को झूठे वादों में फंसाकर हथियार थमाए जा रहे हैं और सीमा पार धकेला जा रहा है। अफगानिस्तान के रक्षा मंत्रालय ने इस कार्रवाई के बाद साफ चेतावनी दी है कि मुल्क की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने वाले किसी भी तत्व को बख्शा नहीं जाएगा और सीमा पर दोबारा ऐसी हिमाकत होने पर गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।
ईरान से भर्ती और झूठे दावों का जाल
हिरासत में लिए गए लड़ाकों के बयानों से सामने आया है कि इस पूरे नेटवर्क में ईरान में रह रहे गरीब और बेसहारा अफगान प्रवासियों को निशाना बनाया जा रहा है। इन युवाओं को दफ्तर में सामान्य नौकरी देने और हर महीने 300 डॉलर का वेतन देने का लालच देकर भर्ती किया जाता है। हकीकत में, उन्हें कार्यालय के काम के बहाने बुलाया जाता है लेकिन बाद में उन्हें सीधे इस्लामाबाद और पेशावर के गुप्त ठिकानों पर पहुंचा दिया जाता है। वहां पहुंचते ही उनके हाथ में एके-47 और रॉकेट लॉन्चर जैसे घातक हथियार थमा दिए जाते हैं। सुरक्षा बलों के सामने आए कबूलनामों से यह भी जाहिर हुआ है कि किस तरह आईएसआईएस और 'शार-ओ-फसाद' जैसे आतंकी गुटों को तैयार करके सीमावर्ती इलाकों में अशांति फैलाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
पहले लड़ाके का बयान, कलाई घड़ी और कमांडर अजीज का दबाव
पकड़े गए लड़ाकों में से एक ने पूछताछ के दौरान बताया कि उसके समूह की कमान कमांडर अजीज नाम के शख्स के हाथ में थी। इस समूह में करीब 50 लड़ाके शामिल थे। जब सुरक्षा अधिकारियों ने उससे उसके पास मौजूद कलाई घड़ी के बारे में सवाल किया, तो उसने खुलासा किया कि यह घड़ी उसे पाकिस्तानी सेना ने दी थी। उसने बताया कि पाकिस्तानी फौज की तरफ से उन्हें साफ निर्देश दिए गए थे कि वे सीमा पार अफगानिस्तान में दाखिल हों और वहां मुजाहिदीन के खिलाफ मोर्चा खोलें। हालांकि, उस लड़ाके ने दावा किया कि उसने और उसके कई साथियों ने हथियार चलाने से साफ इनकार कर दिया था। कमांडर अजीज लगातार उन पर लड़ाई में शामिल होने का दबाव बना रहा था, लेकिन उन लोगों ने युद्ध में भाग लेने से मना कर दिया और अफगान बलों के सामने आत्मसमर्पण करने का फैसला किया।
नसरुल्ला का कबूलनामा, कोर प्रांत से लाकर सीमा पर धकेला
दूसरे पकड़े गए लड़ाके नसरुल्ला ने अपनी आपबीती बताते हुए कहा कि वह मूल रूप से ईरान के कोर प्रांत का रहने वाला है। उसने बताया कि उसे पैसों की सख्त जरूरत थी और इसी आर्थिक तंगी का फायदा उठाकर कुछ लोगों ने उसे पैसे देने का झांसा दिया। उसे ईरान से निकालकर पाकिस्तान पहुंचाया गया, लेकिन वहां पहुंचने के बाद उसे एक भी रुपया नहीं दिया गया। इसके बजाय, उसे हथियारों का बुनियादी प्रशिक्षण दिया गया और जबरन पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर भेज दिया गया। नसरुल्ला ने बताया कि हालांकि उसके हाथ में बंदूक थमाई गई थी, लेकिन उसने अफगान सीमा में दाखिल होने के बाद एक भी गोली नहीं चलाई और इस्लामिक इमारात के जवानों को देखते ही तुरंत आत्मसमर्पण कर दिया।
पेड़ के नीचे छिपकर सरेंडर की दुआ मांगता रहा सबूर
तीसरे लड़ाके सबूर ने भी नसरुल्ला जैसी ही कहानी बयां की। वह भी ईरान के कोर प्रांत का निवासी था और सीमाओं को अवैध रूप से पार करते हुए इस्लामाबाद पहुंचा था। सबूर ने बताया कि इस्लामाबाद में वह एक दिन रुका और नमाज पढ़ी। इसके तीन दिन बाद उसके दो परिचित दोस्त उसके पास पहुंचे, जिन्होंने उसे हथियार दिए और सीमावर्ती क्षेत्र की तरफ ले गए। सबूर 13 लोगों के एक समूह के साथ सरपोल में मौजूद था। उसने बताया कि जैसे ही दोनों तरफ से भारी गोलीबारी शुरू हुई, वह किसी भी तरह की हिंसा में शामिल नहीं होना चाहता था। जब अफगान सुरक्षा बल करीब तीन घंटे तक मुकाबला करते रहे, तब सबूर एक पेड़ के नीचे छिपकर बैठा रहा। वह केवल यही दुआ कर रहा था कि किसी तरह वह जिंदा बच जाए और आत्मसमर्पण कर सके। गोलीबारी थमने के बाद सुरक्षा बलों ने उसे सुरक्षित हिरासत में ले लिया।
जावेद का खुलासा, जाहिद कैंप से अब्दुल्लाह कैंप तक की ट्रेनिंग
सबसे विस्तृत और चौंकाने वाला विवरण जावेद नाम के लड़ाके ने दिया। जावेद, अब्दुल हकीम का बेटा और मोहम्मद उमर का पोता है, जो फरिया प्रांत के कैसार जिले के खाजीकांति गांव से ताल्लुक रखता है। जावेद ने बताया कि जब वह ईरान में था, तब मूसा नाम के एक व्यक्ति ने उससे संपर्क किया और डॉ जिया के 'जभ-ए-आजादी' कार्यालय में 300 डॉलर प्रति माह पर नौकरी की पेशकश की। इसके बाद जावेद, उसके पिता अब्दुल हमिद समेत चार लोगों को एक ईरानी कार में चाबहार ले जाया गया। चाबहार सीमा पर नदी के किनारे उनकी मुलाकात मुजीब नाम के एक पाकिस्तानी नागरिक से हुई। मुजीब उन सभी को लेकर पाकिस्तान के भीतर गया, जहां पहले से करीब 100 लोग मौजूद थे। वहां से उन्हें इस्लामाबाद स्थित 'जाहिद कैंप' ले जाया गया, जहां वे लगभग डेढ़ महीने तक रुके रहे।
इसके बाद 40 से 45 लोगों के जत्थे को पेशावर के कैंप भेजा गया। वहां से उन्हें 'अब्दुल्लाह' ट्रेनिंग कैंप में 15 दिनों के लिए रखा गया, जिसमें से 7 दिनों तक उन्हें कलाश्निकोव, रॉकेट लॉन्चर, भारी गोलियां और पीके मशीनगन चलाने का कड़ा प्रशिक्षण दिया गया। जावेद ने साफ तौर पर रेखांकित किया कि कैंप में प्रशिक्षण देने वाले सभी लोग पाकिस्तानी, पश्तून और उर्दू बोलने वाले थे, और उनमें एक भी अफगान प्रशिक्षक मौजूद नहीं था।
सेना के ट्रकों से सीमा तक परिवहन और 11 घंटे की खूनी जंग
हथियारों की ट्रेनिंग पूरी होने के बाद लड़ाकों को जाहिद कैंप के पास स्थित 'नवीद' कैंप में 15 दिन रखा गया। इसके बाद उन्हें पाकिस्तानी सेना के बड़े ट्रकों में भरकर चित्राल लाया गया। चित्राल पहुंचने के बाद वे पैदल चलकर सरखाज पहुंचे। सरखाज में लड़ाकों को राशन और गोला-बारूद बांटा गया। इसके बाद सीमा पर लगी कंटीली बाड़ को काटकर रास्ता बनाया गया और उन्हें अफगानिस्तान की सीमा में धकेल दिया गया। उन्हें भरोसा दिलाया गया था कि अभियान के दौरान उन्हें हवाई और जमीनी सहायता मुहैया कराई जाएगी, जो बाद में पूरी तरह खोखला साबित हुआ। अफगान सीमा में घुसते ही भीषण मुठभेड़ शुरू हो गई। सुबह 7 बजे से शाम 6 बजे तक करीब 11 घंटे तक चली इस खूनी जंग में जावेद के कई साथी मारे गए और बाकी लड़ाकों ने जिंदा रहने के लिए आत्मसमर्पण कर दिया। जावेद ने यह भी साझा किया कि उसके पिता पूर्व अफगान सैनिक थे जो हालात बिगड़ने के बाद ईरान चले गए थे, और इस पूरे घटनाक्रम में बिछड़े परिवारों की लाचारी का फायदा उठाकर उन्हें इस खतरनाक रास्ते पर झोंक दिया गया।



















