बलूचिस्तान को स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र घोषित करने तथा इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनयिक मान्यता प्रदान करने के लिए एक वैश्विक याचिका अभियान की शुरुआत की गई है। इस अंतरराष्ट्रीय पहल के जरिए दुनिया भर के राष्ट्रों और उनकी सरकारों से आग्रह किया गया है कि वे बलूच जनता की स्वतंत्रता की आकांक्षाओं को अपना कूटनीतिक और शांतिपूर्ण समर्थन दें। इसके अलावा विभिन्न देशों के आम नागरिकों से भी अपील की गई है कि वे इस अभियान से जुड़कर अपनी-अपनी सरकारों पर कूटनीतिक दबाव बनाने के लिए औपचारिक ज्ञापन प्रस्तुत करें।
दशकों से दमन और अवैध कब्जे का आरोप
इस वैश्विक याचिका दस्तावेज में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि बलूचिस्तान कई दशकों से पाकिस्तान के अनधिकृत सैन्य नियंत्रण में रहा है। इस अवधि के दौरान बलूच समुदाय को लगातार मानवाधिकार हनन, जबरन गुमशुदगी, सामूहिक विस्थापन और कड़े राजनीतिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है। बलूच प्रतिनिधियों ने अंतरराष्ट्रीय मंचों से यह गुहार लगाई है कि वहां के निवासियों की संप्रभुता और मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए विश्व समुदाय को अब अपनी चुप्पी तोड़नी होगी।
11 अगस्त 1947 का ऐतिहासिक संदर्भ और जनसांख्यिकी
याचिका में बलूचिस्तान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को रेखांकित करते हुए कहा गया है कि ब्रिटिश शासन की समाप्ति के ठीक बाद 11 अगस्त 1947 को बलूचिस्तान ने खुद को एक स्वतंत्र देश घोषित कर दिया था। हालांकि इसके बाद 27 मार्च 1948 को पाकिस्तानी सैन्य बल बलूचिस्तान के भूभाग में दाखिल हुए, जिसे इस दस्तावेज में अवैध कब्जे की औपचारिक शुरुआत बताया गया है। याचिका के आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में लगभग 6 करोड़ बलूच नागरिक अपनी खोई हुई स्वतंत्रता, स्वायत्तता और आत्मसम्मान की बहाली के लिए संघर्ष कर रहे हैं। मीर यार बलूच ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर साझा किए गए ज्ञापन के जरिए इस अभियान को सार्वजनिक किया।
प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और उपेक्षा का मुद्दा
बलूच समाज की सामाजिक पहचान हमेशा से धर्मनिरपेक्षता, विचारशील उदारवाद और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व पर आधारित रही है। इसके बावजूद यह क्षेत्र दशकों से आर्थिक और सामाजिक उपेक्षा का शिकार रहा है। प्राकृतिक गैस, बहुमूल्य खनिजों और विशाल समुद्र तटीय संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद बलूचिस्तान के मूल निवासी बुनियादी सुविधाओं और विकास से वंचित रखे गए। याचिका में आरोप लगाया गया है कि इन सभी प्राकृतिक संपत्तियों का इस्तेमाल केवल केंद्रीय शासन के अपने हितों को साधने के लिए किया गया, जबकि स्थानीय आबादी को गरीबी और पिछड़ेपन में धकेल दिया गया।
विश्व बिरादरी के समक्ष रखी गई छह प्रमुख मांगें
इस अंतरराष्ट्रीय याचिका के माध्यम से दुनिया भर की सरकारों और कूटनीतिक संस्थाओं के सामने छह स्पष्ट मांगें रखी गई हैं।
- रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान को एक पूर्ण स्वतंत्र एवं संप्रभु राष्ट्र के रूप में औपचारिक और कानूनी मान्यता देने पर गंभीरता से विचार किया जाए।
- बलूचिस्तान के वैध और निर्वाचित प्रतिनिधियों के साथ सीधे कूटनीतिक संबंध स्थापित किए जाएं और शांतिपूर्ण वार्ता की प्रक्रिया शुरू की जाए।
- बलूच नागरिकों के मौलिक मानवाधिकारों तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से आवाज उठाई जाए।
- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) समेत अन्य प्रमुख वैश्विक मंचों पर बलूचिस्तान के मानवीय संकट को उठाया जाए और वहां निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय निगरानी दल की तैनाती की मांग की जाए।
- रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान के नागरिकों, प्राकृतिक संसाधनों और भौगोलिक अखंडता की रक्षा के लिए आवश्यक रक्षा संसाधन एवं उपकरण उपलब्ध कराए जाएं।
- विभिन्न मित्र राष्ट्रों में रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान को अपने आधिकारिक राजनयिक मिशन और दूतावास स्थापित करने की वैधानिक स्वीकृति दी जाए।
क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक शांति पर जोर
याचिका में रेखांकित किया गया है कि लोकतांत्रिक मूल्यों, मानवाधिकारों और अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करने वाले देशों को बलूचिस्तान के प्रतिनिधियों के साथ सार्थक संवाद कायम करना चाहिए। बलूच लोगों की राजनीतिक स्वतंत्रता और अधिकारों को स्वीकार करने से केवल बलूचिस्तान ही नहीं, बल्कि संपूर्ण दक्षिण एशियाई क्षेत्र में स्थिरता, आर्थिक प्रगति और सुरक्षा का नया दौर शुरू हो सकता है। अभियान के समर्थकों ने सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को उठाने के लिए एक विशेष हैशटैग भी जारी किया है ताकि वैश्विक स्तर पर जनसमर्थन जुटाया जा सके। बलूचिस्तान में लंबे समय से जारी संघर्ष और मानवाधिकार उल्लंघन की स्थिति अब अंतरराष्ट्रीय चर्चा का मुख्य केंद्र बन चुकी है।



















