चार साल का एक नन्हा बालक अपने पिता के सामने खिलौने की मांग लेकर खड़ा होता है। पिता शांत भाव से उसे इनकार करते हैं, और वह बालक बिना किसी विरोध या आंसुओं के अपनी रंग भरने वाली किताब उठाकर चित्रकारी में व्यस्त हो जाता है। कुछ ही मिनटों बाद जब उसकी मां रसोई का काम निपटाकर कमरे में आती है, तो वही बालक फर्श पर लेटकर चीखने-चिल्लाने लगता है, पैर पटकता है और उसी खिलौने की दोबारा मांग करने लगता है। पारिवारिक परिवेश में यह स्थिति बेहद आम है, जहां माता-पिता अक्सर इस दोहरे रवैये से उलझन में पड़ जाते हैं कि आखिर उनका लाडला एक अभिभावक के सामने इतना अनुशासित और दूसरे के सामने पूरी तरह अनियंत्रित क्यों हो जाता है।
पारिवारिक बातचीत में इस तरह के बदलाव को आमतौर पर बच्चे की बदमाशी, नटखटपन या फिर मां के अत्यधिक लाड-प्यार का नतीजा मान लिया जाता है। कई बार परिवार के सदस्य इसके लिए मां की परवरिश शैली पर भी सवाल खड़े करने लगते हैं। हालांकि बाल मनोविज्ञान के विशेषज्ञों का शोध इस पूरे मामले को एक बिल्कुल अलग रोशनी में प्रस्तुत करता है। विज्ञान बताता है कि यह स्थिति किसी तरह की अनुशासनहीनता नहीं है, बल्कि इसके पीछे बच्चे की गहरी भावनात्मक प्रक्रियाएं काम कर रही होती हैं।
सुरक्षित दायरा और भावनाओं का सहज निकास
बाल विकास विशेषज्ञों के विश्लेषण के मुताबिक, कोई भी बच्चा अपनी नाराजगी, हठ या तीव्र भावनाएं उसी इंसान के सामने खुलकर व्यक्त करता है, जिसके साथ वह खुद को भावनात्मक रूप से सबसे ज्यादा सुरक्षित महसूस करता है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक जॉन बॉल्बी के अटैचमेंट सिद्धांत के अनुसार, एक छोटा बच्चा अपनी मां या प्राथमिक देखभाल करने वाले व्यक्ति को अपना सबसे बड़ा सुरक्षित ठिकाना मानता है। यह वह आश्रय स्थल है जहां बच्चे को किसी बाहरी मूल्यांकन या अस्वीकार किए जाने का भय नहीं सताता।
बच्चा जब बाहरी परिवेश, स्कूल या अन्य लोगों के संपर्क में रहता है, तो वह लगातार सामाजिक नियमों और अपेक्षाओं के दबाव में रहता है। वह अपनी बेचैनी, थकान और खीझ को भीतर ही दबाकर रखने की कोशिश करता है। घर लौटने पर जब वह अपने सबसे भरोसेमंद व्यक्ति यानी मां को देखता है, तो उसका यह आंतरिक दबाव अचानक बाहर निकल आता है। मनोवैज्ञानिक भाषा में इसे भावनात्मक दबाव का हल्का होना कहा जाता है। मां की मौजूदगी बच्चे को यह यकीन दिलाती है कि वह चाहे रोए, गुस्सा करे या जिद्द दिखाए, उसका अपना स्थान कभी कम नहीं होगा।
नियमों की सीमाएं और प्रतिक्रिया का अंतर
बच्चों में यह समझने की सहज क्षमता होती है कि परिवार का कौन सा सदस्य उनके व्यवहार पर किस तरह की प्रतिक्रिया देगा। पिता आमतौर पर अपनी बातचीत और निर्णयों में अधिक स्पष्ट और सख्त रुख अपनाते हैं। जब पिता किसी बात के लिए ना कह देते हैं, तो बच्चे को स्पष्ट संकेत मिल जाता है कि आगे की जिद्द का कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकलने वाला है, बल्कि ऐसा करने पर डांट भी पड़ सकती है। इसी वजह से बच्चा उनके सामने तुरंत समझौता कर लेता है और शांत दिखाई पड़ता है।
दूसरी ओर, मां अक्सर अधिक धैर्यवान होती हैं और बच्चे के रोने या परेशान होने पर उसकी बात सुनने और उसकी मनोदशा को समझने का प्रयास करती हैं। बच्चे इस अंतर को बहुत जल्दी भांप लेते हैं। वे जानते हैं कि मां के सामने अपनी बात मनवाने की गुंजाइश अधिक है और वहां अपनी भावनाओं को पूरी तीव्रता के साथ प्रकट करने पर भी उन्हें तुरंत डांट या तिरस्कार का सामना नहीं करना पड़ेगा।
अनफ़िल्टर्ड पहचान और मां की दुनिया
शुरुआती विकास के वर्षों में बच्चा मां को स्वयं से अलग कोई स्वतंत्र इकाई नहीं समझता, बल्कि अपनी ही पहचान का एक अभिन्न हिस्सा मानता है। पिता या परिवार के अन्य सदस्यों के साथ रहने के दौरान बच्चे का सामाजिक व्यवहार को संतुलित रखने वाला फिल्टर सक्रिय रहता है। वह सतर्क रहता है और अपनी हरकतों को नियंत्रित रखने की चेष्टा करता है। जैसे ही मां सामने आती है, वह सामाजिक नियंत्रण वाला आवरण पूरी तरह हट जाता है और बच्चा अपने स्वाभाविक, बिना किसी दिखावे वाले रूप में आ जाता है।
यदि किसी मां के सामने आते ही उनका बच्चा जोर-जोर से रोने लगे या अजीबोगरीब नखरे दिखाने लगे, तो यह कतई साबित नहीं करता कि उनकी परवरिश में कोई कमी है। बल्कि यह इस बात का ठोस मनोवैज्ञानिक प्रमाण है कि बच्चा अपनी मां पर आंख मूंदकर भरोसा करता है और उसे अपनी हर कमजोरी दिखाने में रत्ती भर भी संकोच नहीं है।
अभिभावकों के बीच सही तालमेल के उपाय
इस तरह की स्थितियों को सुलझाने के लिए माता-पिता दोनों की समझ और अनुशासन में एकरूपता होना अत्यंत आवश्यक है। अगर पिता ने किसी विशेष मांग या व्यवहार के लिए मना किया है, तो मां को भी उसी नियम का दृढ़ता से समर्थन करना चाहिए। जब बच्चे को दोनों अभिभावकों की तरफ से अलग-अलग संदेश मिलते हैं, तो वह भ्रमित हो जाता है और अपनी जिद्द को हथियार बना लेता है।
जब बच्चा अचानक हठ करने लगे, तो उस पर गुस्सा करने या चीखने के बजाय शांत शब्दों में उसकी स्थिति को स्वीकार करना चाहिए। माता-पिता कह सकते हैं कि वे उसकी थकान या नाराजगी को समझ रहे हैं, लेकिन जिद्द करने से यह काम नहीं हो सकेगा। इसके साथ ही पिता को भी केवल अनुशासन बनाए रखने या खेल-कूद तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि बच्चे की छोटी-छोटी बातों को ध्यान से सुनने और उसे निरंतर भावनात्मक संबल प्रदान करने में समय लगाना चाहिए। दोनों अभिभावकों का साझा प्रयास ही बच्चे के इस दोहरे व्यवहार को संतुलित बना सकता है।



















