जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति के जरिए राष्ट्रीय फलक पर सुर्खियां बटोरने वाले कन्हैया कुमार के सियासी सफर में मुश्किलें लगातार बढ़ती दिख रही हैं। पहले संसदीय चुनावों में बेगूसराय और उसके बाद उत्तर-पूर्वी दिल्ली से चुनावी शिकस्त झेलने के बाद, अब उनकी सीधी सांगठनिक जिम्मेदारी वाली कांग्रेस की छात्र शाखा एनएसयूआई को दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ (डूसू) के चुनावों में करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है। डूसू के चार केंद्रीय पदों में से संगठन के खाते में एक भी सीट नहीं आ सकी। इस चुनावी पराजय के साथ-साथ टिकट वितरण में हुई कथित गड़बड़ियों और अंदरूनी असंतोष को लेकर पार्टी के भीतर गंभीर चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
डूसू चुनाव परिणाम और निर्दलीय उम्मीदवारों का अप्रत्याशित दबदबा
दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ के हालिया नतीजों ने एनएसयूआई के सांगठनिक ढांचे को बड़ा झटका दिया है। चुनाव के चार मुख्य पदों में से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव के पदों पर जीत हासिल की। वहीं उपाध्यक्ष पद पर एनएसयूआई के पूर्व कार्यकर्ता और बागी होकर निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे दीपांशु शौकीन ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की। आंकड़ों के अनुसार, दीपांशु शौकीन ने कुल 30,615 वोट जुटाए और अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी एबीवीपी प्रत्याशी को 13,705 मतों के भारी अंतर से हरा दिया। इसके विपरीत, एनएसयूआई के आधिकारिक प्रत्याशी वीर चतरथ को महज 4,313 वोट मिले और वे दौड़ में पिछड़कर तीसरे स्थान पर रहे।
एक बागी उम्मीदवार का संगठन के आधिकारिक प्रत्याशी से सात गुना अधिक वोट पाकर जीतना एनएसयूआई के लिए बेहद असहज करने वाला साबित हुआ है। दीपांशु शौकीन पहले एनएसयूआई का सक्रिय हिस्सा थे और टिकट के प्रमुख दावेदारों में गिने जा रहे थे। टिकट आवंटन प्रक्रिया में मतभेद उभरने के बाद उन्होंने निर्दलीय ताल ठोक दी। चुनावी नतीजों ने यह स्पष्ट कर दिया कि जमीनी स्तर पर संगठन के आधिकारिक चेहरे की तुलना में बागी उम्मीदवार की पकड़ छात्रों के बीच कहीं अधिक मजबूत थी।
दीपांशु शौकीन के टिकट विवाद पर अलग-अलग दावे
डूसू चुनावों में टिकट वितरण का विवाद संगठन के भीतर मचे घमासान का मुख्य केंद्र बिंदु बन गया है। प्रारंभिक चर्चाओं के दौरान दीपांशु शौकीन को संभावित उम्मीदवारों की सूची में शामिल किया गया था। बाद में संगठन के भीतर से यह बात सामने आई कि नेतृत्व उन्हें अध्यक्ष पद पर उतारना चाहता था, जबकि शौकीन खुद उपाध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ने के इच्छुक थे। दोनों पक्षों के बीच सहमति नहीं बन सकी, जिसके चलते उनका नाम आधिकारिक सूची से हटा दिया गया और उपाध्यक्ष पद के लिए वीर चतरथ को टिकट थमा दिया गया।
चुनावी नतीजे आने के बाद कांग्रेस नेता अमिताभ दुबे ने इस मामले पर स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि संगठन ने शौकीन को अध्यक्ष पद की पेशकश की थी, लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया। वहीं दूसरी ओर, शौकीन के अपने अलग तर्क थे और इसी खींचतान के चलते उन्होंने निर्दलीय मैदान में उतरने का फैसला किया। नतीजों के बाद यह सवाल पुरजोर तरीके से उठा कि यदि कोई जमीनी उम्मीदवार एक विशेष पद पर मजबूत था, तो समन्वय बिठाकर उसे पार्टी के भीतर रोके रखने में विफलता क्यों हाथ लगी।
संयुक्त सचिव पद पर विशेष यादव का मुकाबला और वोटों का बिखराव
टिकट वितरण को लेकर नाराजगी सिर्फ उपाध्यक्ष पद तक ही सीमित नहीं रही। संयुक्त सचिव पद पर भी संगठन के भीतर इसी प्रकार का असंतोष देखने को मिला। विशेष यादव भी टिकट के प्रबल दावेदारों में शामिल थे और शुरुआत में उन्हें संयुक्त सचिव पद दिए जाने की चर्चा थी, लेकिन अंतिम क्षणों में उम्मीदवार बदल दिया गया। इस फैसले से खफा होकर विशेष यादव ने समाजवादी छात्र सभा के समर्थन से मैदान में उतरने का फैसला किया।
नतीजों में विशेष यादव ने अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराते हुए 15,778 वोट हासिल किए। एनएसयूआई के आधिकारिक प्रत्याशी गोपाल चौधरी को 15,206 वोट मिले। इस पद पर एबीवीपी के लक्ष्य राज सिंह 16,615 वोट हासिल कर विजयी रहे। आंकड़ों का विश्लेषण दिखाता है कि यदि बागी उम्मीदवार का यह असंतोष न होता, तो मुकाबला बेहद नजदीकी या एनएसयूआई के पक्ष में जा सकता था। संगठन से छिटककर दूसरे मंच से लड़े छात्र नेता ने न केवल आधिकारिक प्रत्याशी को पछाड़ा, बल्कि सीधे तौर पर एबीवीपी की जीत की राह आसान कर दी।
परिवारवाद के आरोप और वीर चतरथ के चयन पर बहस
दीपांशु शौकीन का टिकट काटकर वीर चतरथ को उपाध्यक्ष पद का उम्मीदवार बनाए जाने के फैसले ने भी भारी विवाद को जन्म दिया। वीर चतरथ कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मनीष चतरथ के बेटे हैं। ऐसे में छात्र संगठन के अंदरूनी हलकों में परिवारवाद और व्यक्तिगत प्राथमिकताओं को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। यद्यपि कन्हैया कुमार के करीबी लोगों ने किसी भी प्रकार की व्यक्तिगत जिद या अहंकार की लड़ाई के दावों को खारिज किया और कांग्रेस नेताओं ने यह भी दोहराया कि शौकीन को अध्यक्ष पद का विकल्प दिया गया था, लेकिन नतीजों के जमीनी आंकड़ों ने इन सभी दलीलों को गौण कर दिया। एक तरफ निर्दलीय प्रत्याशी 30,615 वोट ले गया, वहीं संगठन के आधिकारिक प्रत्याशी का 4,313 वोटों पर सिमट जाना चयन प्रक्रिया की गंभीर चूक की ओर इशारा करता है।
कांग्रेस नेतृत्व की आपात बैठक और जवाबदेही की मांग
डूसू के निराशाजनक नतीजों के बाद यह विवाद सिर्फ छात्र इकाई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पार्टी के शीर्ष स्तर तक जा पहुंचा। कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने इस पूरे घटनाक्रम और चुनावी प्रदर्शन की समीक्षा के लिए एक आपात बैठक बुलाई। इस बैठक में कांग्रेस और एनएसयूआई के कई वरिष्ठ पदाधिकारी मौजूद रहे। सामने आई जानकारियों के अनुसार, बैठक में टिकट वितरण में हुई चूक और संगठन के भीतर पनपे असंतोष को लेकर चर्चा की गई।
जुलाई 2023 से एनएसयूआई के एआईसीसी प्रभारी की जिम्मेदारी संभाल रहे कन्हैया कुमार से इस बैठक में टिकट वितरण और संगठन के निराशाजनक प्रदर्शन को लेकर जवाब तलब किए जाने की बात सामने आई। साथ ही राहुल गांधी द्वारा भी इस नाकामी पर स्पष्टीकरण मांगे जाने की चर्चाएं रहीं। बैठक में यह गंभीर चिंता जताई गई कि समय रहते बागी नेताओं के असंतोष को दूर क्यों नहीं किया गया, जिससे सीधे तौर पर विरोधी संगठन को वॉकओवर मिल गया।
छात्र राजनीति से मुख्यधारा की सियासत तक कन्हैया का सफर
कन्हैया कुमार का राजनीतिक सफर जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष के रूप में उभरे चर्चित दौर से शुरू हुआ था, जिसके बाद उन्होंने सीपीआई के जरिए मुख्यधारा की संसदीय राजनीति में कदम रखा। हालांकि, संसदीय स्तर पर उन्हें चुनावी सफलता नहीं मिल सकी। पहले वे बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र से पराजित हुए और इसके बाद कांग्रेस में शामिल होकर उत्तर-पूर्वी दिल्ली लोकसभा सीट से चुनाव लड़े, जहां भी उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। चुनावी मोर्चों पर लगातार असफलता के बाद अब जब उन्हें एनएसयूआई के प्रभारी के रूप में सांगठनिक जिम्मेदारी सौंपी गई थी, तब प्रतिष्ठित डूसू चुनाव में संगठन की यह करारी हार उनकी चुनावी और सांगठनिक रणनीति पर नए सिरे से सवाल खड़े कर रही है।























