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बाड़मेर के नेमाराम की प्रेरणादायक कहानी, ईंट भट्ठे पर की मजदूरी और अब बीएसएफ में बने जवानराजस्थान
18 सित॰ 2026, 7:11 pm (25 मिनट पहले)· 0

बाड़मेर के नेमाराम की प्रेरणादायक कहानी, ईंट भट्ठे पर की मजदूरी और अब बीएसएफ में बने जवान

कोविड-19 महामारी के दौरान पढ़ाई छोड़कर ईंट भट्ठे पर मजदूरी करने वाले बाड़मेर के नेमाराम चौहान ने अपनी कड़ी मेहनत के दम पर सीमा सुरक्षा बल में सफलता हासिल की है।

बाड़मेर जिले के एक युवा ने अपने बुलंद हौसलों और अदम्य साहस के बल पर विपरीत परिस्थितियों को मात देते हुए एक नई मिसाल पेश की है। जीवन में जब आर्थिक तंगी और संकटों ने रास्ता रोका, तो उन्होंने हार मानने के बजाय संघर्ष का मार्ग चुना। आज वही युवा देश की सीमाओं की रक्षा के लिए तैयार है और उनकी यह उपलब्धि पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी हुई है।

कोविड काल में छूटी पढ़ाई और गुजरात में मजदूरी

बाड़मेर जिले में भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे गांव भिलो का तला यानी आरबी की गफन के रहने वाले नेमाराम चौहान का शुरुआती जीवन काफी संघर्षों से भरा रहा है। उन्होंने 12वीं कक्षा तक की शिक्षा पूरी की थी, लेकिन इसके बाद परिवार की माली हालत बेहद खराब हो गई। इसी दौरान कोरोना वायरस महामारी के कारण हालात पूरी तरह से बिगड़ गए और उनकी पढ़ाई बीच में ही रुक गई। परिवार का भरण-पोषण करने के लिए उन्हें अपना घर छोड़कर गुजरात का रुख करना पड़ा। वहां उन्होंने अपने पिता विरधाराम के साथ मिलकर एक ईंट भट्ठे पर कड़ी मेहनत और मजदूरी का काम किया। तप्ती धूप और कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपनी आंखों में संजोए देश सेवा के सपने को कभी टूटने नहीं दिया।

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गांव के युवाओं से मिली प्रेरणा और वापसी

संघर्ष के उन दिनों के बीच नेमाराम के जीवन में एक बड़ा मोड़ तब आया जब उन्हें अपने ही गांव के कुछ अन्य युवाओं से आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली। वर्ष 2024 की सुरक्षा बलों की चयन प्रक्रिया में उनके गांव के दो लड़कों का चयन सीआईएसएफ में हो गया था। जब उन्होंने उन युवाओं को वर्दी पहने हुए और सफलता की सीढ़ियां चढ़ते देखा, तो उनके भीतर भी एक नई ऊर्जा का संचार हुआ। उन्होंने उसी पल यह ठान लिया कि चाहे कितनी भी बाधाएं आएं, वे भी फौज में जाने के अपने लक्ष्य को हासिल करके रहेंगे। इसके बाद वे गुजरात से अपने गांव लौट आए और एक बार फिर पूरी लगन के साथ किताबों से नाता जोड़कर तैयारी में जुट गए।

22 सप्ताह की कठोर ट्रेनिंग और बीएसएफ में चयन

अपनी मेहनत और पक्के इरादे के दम पर नेमाराम ने एसएससी जीडी 2025 की भर्ती परीक्षा में सफलता प्राप्त की और उनका चयन सीमा सुरक्षा बल यानी बीएसएफ में हो गया। इसके बाद उन्होंने 22 सप्ताह का बेहद कठिन और चुनौतीपूर्ण प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा किया। हाल ही में जब वे अपनी ट्रेनिंग पूरी करके फौजी की वर्दी में अपने पैतृक गांव लौटे, तो ग्रामीणों ने उनका शानदार स्वागत किया। इस दौरान उनके पिता विरधाराम और परिवार के अन्य सदस्यों की आंखें खुशी के आंसुओं से भर आईं।

बचपन का सपना हुआ पूरा

चूंकि नेमाराम का गांव अंतरराष्ट्रीय सीमा के बेहद करीब स्थित है, इसलिए उन्होंने अपने बचपन से ही बीएसएफ के जवानों को मुस्तैदी से ड्यूटी करते हुए देखा था। वे हमेशा से उन जवानों की कार्यशैली और उनकी शान से जुड़ी वर्दी से खासे प्रभावित रहे हैं। सरहद पर तैनात उन बहादुर प्रहरियों को देखकर ही उनके मन में देश सेवा की अलख जगी थी। आज अपनी अटूट निष्ठा और कठिन परिश्रम के बल पर उन्होंने अपने बचपन के उस सपने को हकीकत में बदल दिखाया है। उनकी यह सफलता आज के युवाओं के लिए एक प्रेरणा है जो यह साबित करती है कि यदि हौसले बुलंद हों, तो कोई भी कठिनाई बड़ी नहीं होती।

सवाल-जवाब

नेमाराम चौहान किस जिले के रहने वाले हैं?
नेमाराम चौहान राजस्थान के बाड़मेर जिले के भिलो का तला गांव के रहने वाले हैं।
उन्हें मजدूरी करने के लिए कहां जाना पड़ा था?
परिवार की आर्थिक तंगी दूर करने के लिए उन्हें गुजरात जाना पड़ा था जहां उन्होंने ईंट भट्ठे पर काम किया।
नेमाराम को सेना में जाने की प्रेरणा किससे मिली?
वर्ष 2024 की भर्ती में उनके गांव के दो युवाओं का सीआईएसएफ में चयन होने पर उन्हें प्रेरणा मिली।
उन्होंने किस परीक्षा के जरिए सफलता हासिल की?
उन्होंने एसएससी जीडी 2025 की भर्ती परीक्षा के माध्यम से सीमा सुरक्षा बल में सफलता प्राप्त की।
उन्होंने कितने सप्ताह की ट्रेनिंग पूरी की है?
नेमाराम ने 22 सप्ताह की बेहद कठोर और चुनौतीपूर्ण ट्रेनिंग पूरी की है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·8 मिनट पहले

बाड़मेर जैसे सीमावर्ती जिलों में आर्थिक तंगी के बावजूद युवाओं का सुरक्षा बलों में चुना जाना यह साबित करता है कि ग्रामीण भारत में दृढ इच्छाशक्ति और देशभक्ति की कोई कमी नहीं है। कोविड काल की बाधाओं को पार कर ईंट भट्ठे की मजदूरी से बीएसएफ तक का यह सफर क्षेत्र के अन्य युवाओं के लिए एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·4 मिनट पहले

सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के नजरिए से यह घटनाक्रम बेहद महत्वपूर्ण है। बाड़मेर जैसे संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय सीमावर्ती क्षेत्रों में आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं को सीमा पार के अपराधों और तस्करी से जुड़े आपराधिक सिंडिकेट अक्सर निशाना बनाते हैं। जब ऐसे क्षेत्रों के युवा विपरीत परिस्थितियों से लड़कर सुरक्षा बलों का हिस्सा बनते हैं, तो यह सीधे तौर पर सार्वजनिक सुरक्षा को मजबूत करता है। यह बदलाव न केवल स्थानीय स्तर पर युवाओं को गलत राह पर जाने से रोकता है, बल्कि सुरक्षा बलों के स्थानीय खुफिया तंत्र को मजबूत कर सीमा पर होने वाली आपराधिक गतिविधियों पर अंकुश लगाने में भी मदद करता है।

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