लोकसभा की कार्यवाही गुरुवार को शुरू होने के कुछ ही मिनटों के भीतर अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई, जिसके साथ ही संसद का मानसून सत्र भी समाप्त हो गया। पूरे सत्र के दौरान विपक्षी दलों के लगातार हंगामे के कारण सदन का कामकाज गंभीर रूप से प्रभावित रहा। संसद के इस सत्र में जनहित और नीति से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तृत विचार-विमर्श नहीं हो सका। यहां तक कि लगभग 12 महत्वपूर्ण विधेयक बिना किसी संसदीय बहस या चर्चा के ही सदन से पारित कर दिए गए। भारतीय संसदीय प्रणाली में सरकार के खिलाफ विरोध दर्ज कराना या गतिरोध पैदा करना विपक्ष का एक पारंपरिक हथियार रहा है, लेकिन इस बार की कार्यशैली ने संसदीय परंपराओं के स्तर पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
संसदीय परंपरा और विपक्ष के विरोध की भूमिका
संसदीय लोकतंत्र में जब सत्तारूढ़ दल किसी ज्वलंत या संवेदनशील मुद्दे पर सदन के भीतर चर्चा कराने से मना करता है या टालमटोल की नीति अपनाता है, तो विपक्षी दल सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाने के लिए कार्यवाही बाधित करते रहे हैं। भारत के संसदीय इतिहास में ऐसे दर्जनों उदाहरण मौजूद हैं जब विपक्ष के कड़े विरोध के चलते पूरा का पूरा सत्र ही लगभग ठप होकर रह गया। हालांकि, उन ऐतिहासिक घटनाओं का सूक्ष्म विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि अतीत में जब भी संसद को रोका गया, तो उसके पीछे कोई न कोई बेहद बड़ा, स्पष्ट और नीतिगत मुद्दा मौजूद था। विरोध का उद्देश्य किसी ठोस घोटाले या सरकारी विफलता पर कार्यपालिका की जवाबदेही तय करना होता था।
यूपीए शासनकाल और भाजपा की तत्कालीन संसदीय रणनीति
साल 2014 से पहले केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार सत्ता में थी और भारतीय जनता पार्टी प्रमुख विपक्षी दल की भूमिका निभा रही थी। उस दौरान भी भाजपा ने कई मौकों पर संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही को लंबे समय तक बाधित किया था। लेकिन उस दौर के विरोध प्रदर्शनों के पीछे सरकार के शीर्ष स्तर पर लगे गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप और बड़े घोटाले मुख्य आधार थे। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी कैग की रिपोर्टों और केंद्रीय जांच एजेंसियों की पड़ताल ने तत्कालीन सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाए थे, जिसके आधार पर विपक्ष ने सदन में सरकार को घेरा था।
दिवंगत सुषमा स्वराज और अरुण जेटली की राजनीतिक सोच
भाजपा की वरिष्ठ नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष रहीं दिवंगत सुषमा स्वराज ने एक समय संसदीय विरोध के दर्शन को स्पष्ट करते हुए कहा था कि विपक्ष का मूल कर्तव्य सरकार की नीतियों का विरोध करना और उस पर अंकुश लगाना है। हालांकि, उनका यह भी दृढ़ विश्वास था कि राजनीतिक विरोध कभी भी व्यक्तिगत दुश्मनी या मनभेद में नहीं बदलना चाहिए। सुषमा स्वराज और उनके साथ दिवंगत अरुण जेटली की कार्यशैली में यह लोकतांत्रिक परिपक्वता साफ झलकती थी। सुषमा स्वराज ने अपने संसदीय भाषणों के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की प्रशंसा करने से भी परहेज नहीं किया था। उनका मानना था कि वैचारिक मतभेद लोकतंत्र की ताकत हैं, परंतु व्यक्तिगत कटुता से बचना चाहिए।
2010 का शीतकालीन सत्र और 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन का मुद्दा
संसदीय गतिरोध के इतिहास में 2010 का शीतकालीन सत्र सबसे ज्यादा चर्चित सत्रों में गिना जाता है। उस समय 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन मामले में लगे गंभीर आरोपों की जांच के लिए भाजपा के नेतृत्व में समूचा विपक्ष संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी के गठन की मांग पर अड़ा हुआ था। तत्कालीन यूपीए सरकार इस जांच समिति के गठन के लिए तैयार नहीं थी। इसका परिणाम यह हुआ कि लगभग एक महीने तक लोकसभा और राज्यसभा में गतिरोध बना रहा। इस गतिरोध के कारण लोकसभा की कार्य उत्पादकता गिरकर 6 प्रतिशत से भी कम रह गई थी और लगभग पूरा सत्र हंगामे की भेंट चढ़ गया था।
2012 का मानसून सत्र और कोयला ब्लॉक आवंटन घोटाला
वर्ष 2012 के मानसून सत्र में कोयला ब्लॉक आवंटन यानी कोलगेट का मामला संसद के केंद्र में आ गया। कैग की रिपोर्ट में कोयला आवंटन की प्रक्रिया में व्यापक अनियमितताओं और राजकोष को हुए भारी नुकसान का उल्लेख किया गया था। इस गंभीर मुद्दे पर विपक्ष ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सीधे इस्तीफे की मांग की। दोनों सदनों में हुए भारी विरोध के कारण संसद का कामकाज ठप रहा और लोकसभा अपनी निर्धारित अवधि के केवल 20 प्रतिशत समय में ही काम कर सकी। लेकिन इस विरोध के पीछे कैग की आधिकारिक रिपोर्ट और अरबों रुपये के कथित घोटाले का ठोस आधार था।
2018 का बजट सत्र और 4 प्रतिशत की ऐतिहासिक निम्नतम उत्पादकता
वर्ष 2018 में केंद्र में भाजपा सरकार के दौरान संसद का बजट सत्र भी इतिहास के सबसे कम उत्पादक सत्रों में दर्ज हुआ। उस समय पंजाब नेशनल बैंक में हुए नीरव मोदी घोटाले, आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग और सरकार के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव जैसे विविध मुद्दों पर अलग-अलग राजनीतिक दलों ने जोरदार हंगामा किया। इस अभूतपूर्व विरोध के चलते सत्र की उत्पादकता मात्र 4 प्रतिशत तक सिमट गई थी, जो पिछले 18 वर्षों के संसदीय इतिहास में किसी भी बजट सत्र का सबसे निचला स्तर था। इन सभी ऐतिहासिक उदाहरणों से यह सिद्ध होता है कि अतीत में जब भी सदन बाधित हुआ, उसके पीछे स्पष्ट नीतिगत या कानूनी मुद्दे थे।
मौजूदा मानसून सत्र में कांग्रेस का बदलता रुख
हाल ही में संपन्न हुए मानसून सत्र में विपक्ष की रणनीति को लेकर विश्लेषक सवाल उठा रहे हैं। सत्र की शुरुआत में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने मांग की कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सदन में आएं और ज्वलंत मुद्दों पर सरकार का रुख स्पष्ट करते हुए आधिकारिक बयान दें। संसद का कामकाज सुचारू रूप से चलाने के लिए सरकार की ओर से संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने राहुल गांधी से मुलाकात की और उनसे सदन की कार्यवाही चलने देने की अपील की। सरकार ने स्पष्ट किया था कि वह विपक्ष द्वारा उठाए गए विषयों पर नियम के तहत विस्तृत चर्चा कराने और गृह मंत्री के जवाब के लिए पूरी तरह तैयार है।
बयान की मांग से सीधे इस्तीफे पर अड़ने की रणनीति
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के आश्वासन और सरकार द्वारा गृह मंत्री अमित शाह के जवाब देने की सहमति जताने के बाद विपक्ष का रुख अचानक बदल गया। जो विपक्ष पहले सदन में चर्चा और केंद्रीय गृह मंत्री के वक्तव्य की मांग कर रहा था, उसने अचानक अपनी मांग बदलकर सीधे इस्तीफे की शर्त सामने रख दी। यहीं से कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की संसदीय रणनीति पर प्रश्नचिह्न खड़े होने लगे। जब सरकार चर्चा के लिए तैयार थी, संबंधित मंत्री जवाब देने को सहमत थे और विपक्ष के पास अपने सवाल रखने का पूरा अवसर था, तब भी सदन की कार्यवाही को लगातार बाधित करने का विकल्प क्यों चुना गया?
लोकतंत्र और जनहित पर संसदीय गतिरोध का प्रतिकूल प्रभाव
लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर सरकार की कमियों को उजागर करना और उससे तीखे सवाल पूछना विपक्ष की संवैधानिक जिम्मेदारी है। सरकार को घेरने के लिए विरोध प्रदर्शन भी एक जायज माध्यम है। परंतु संसद केवल नारेबाजी या विरोध दर्ज कराने की जगह नहीं है, बल्कि यह देश के लिए कानून बनाने और 140 करोड़ नागरिकों से जुड़े मुद्दों पर बहस करने वाली सर्वोच्च संस्था है। यदि हर मुद्दे पर चर्चा के बजाय केवल सदन को ठप करने की परिपाटी स्थापित हो जाती है, तो इससे न केवल सरकार और विपक्ष की साख प्रभावित होती है, बल्कि सबसे बड़ा नुकसान उन आम नागरिकों का होता है जो अपने प्रतिनिधियों को संसद में बहस और जवाबदेही के लिए चुनकर भेजते हैं।



















