राजस्थान के सीमावर्ती शहर बाड़मेर में राजकीय बालिका आदिवासी छात्रावास का परिसर आज हरियाली की नई मिसाल पेश कर रहा है. जिस भूभाग पर कभी नगर भर से आने वाला कचरा एकत्र होता था और चौतरफा गंदगी पसरी रहती थी, वही कोना अब घने पेड़ों और महकते फूलों के आशियाने में बदल चुका है. छात्रावास अधीक्षक सीमा मीणा ने निजी स्तर पर संकल्प लेकर इस वीरान व दुर्गंधयुक्त डंपिंग यार्ड को एक जीवंत प्राकृतिक अभयारण्य का रूप दिया है. इस इलाके में तकरीबन 1000 विविध प्रजातियों के पौधे रोपे गए हैं, जिसके चलते यह परिसर एक सघन ऑक्सीजन पार्क बनकर उभरा है.
बदबूदार डंपिंग यार्ड से हरित आशियाने का सफर
अतीत में इस भूखंड की हालत बेहद चिंताजनक थी. आसपास के बाशिंदे यहां बेरोकटोक ठोस अपशिष्ट फेंकते थे, जिसकी सड़ांध के कारण वहां से गुजरने वाले राहगीरों का सांस लेना भी दूभर हो जाता था. सरकारी मशीनरी अथवा औपचारिक अनुदान के इंतजार में हाथ पर हाथ धरे बैठने के बजाय सीमा मीणा ने व्यक्तिगत स्तर पर आर्थिक संसाधन जुटाए. उन्होंने अपने निजी खर्च से सबसे पहले पूरे इलाके से कचरे के अंबार हटवाए, जमीन की व्यापक सफाई करवाई और फिर पौधारोपण के अनुकूल उपजाऊ मिट्टी व खाद की व्यवस्था की. इस संपूर्ण अभियान में उनके पति करतार सिंह ने भी कदम से कदम मिलाकर श्रमदान और व्यवस्थाओं में सक्रिय सहयोग दिया.
रेगिस्तानी धूप में 5 डिग्री तक गिरता है तापमान
थार के रेतीले धोरों वाले इस शहर में मई और जून के महीनों में सूरज की तल्खी जानलेवा स्तर तक पहुंच जाती है. इस भीषण लू के दौर में भी इस परिसर के भीतर का तापमान सामान्य से 5 डिग्री सेल्सियस तक कम दर्ज होता है. सघन वृक्षारोपण की वजह से न सिर्फ गर्मी का प्रकोप कम हुआ है, बल्कि सुबह और शाम के वक्त परिसर विभिन्न पक्षियों के चहचहाने से गूंज उठता है. इस हरियाली का सीधा लाभ छात्रावास में रहने वाली बालिकाओं को शांतिपूर्ण और स्वास्थ्यवर्धक वातावरण के रूप में मिल रहा है.
विविध प्रजातियों के फलदार और औषधीय पेड़
इस ऑक्सीजन पार्क में पेड़-पौधों के चयन पर खास ध्यान दिया गया है. यहां स्थानीय जलवायु को सहन करने वाले और छाया देने वाले नीम, शीशम तथा गुलमोहर के बड़े वृक्ष खड़े हैं. इसके साथ ही सुगंध बिखेरने वाले मोगरा के फूलों के अलावा मौसमी, बादाम और केले जैसे फलदार पौधे भी रोपे गए हैं. कई औषधीय वनस्पतियों को भी स्थान दिया गया है, जिससे छात्राओं को पारंपरिक वनस्पतियों की पहचान और उनके स्वास्थ्य लाभों का व्यावहारिक ज्ञान मिलता है.
रेतीले इलाके में हरियाली बचाए रखने की साधना
सूखे मरुस्थल में पौधे लगाना जितना कठिन काम है, पानी के घोर संकट और चिलचिलाती धूप के थपेड़ों के बीच उन्हें जिंदा बचाए रखना उससे भी कहीं बड़ी चुनौती है. छात्रावास में नामांकित कुल 50 छात्राएं किताबों और कमरों की बंद दुनिया से बाहर निकलकर इन पौधों की देखभाल में हाथ बंटाती हैं. दैनिक जल आपूर्ति, खाद की निराई-गुड़ाई और सुरक्षा के काम में छात्राओं की भागीदारी से उनमें पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छता का स्वाभाविक संस्कार विकसित हो रहा है.




















