राजस्थान के दौसा जिले में कार्तिक के पवित्र महीने की शुरुआत के साथ ही सुबह का समय पूरी तरह से भक्ति और अध्यात्म के रंग में रंग जाता है। शहर के अलग-अलग हिस्सों में सुबह पांच बजते ही पारंपरिक भजनों की गूंज सुनाई देने लगती है। ढोलक और मंजीरे की संगति के बीच भक्तों का समूह प्रभात फेरी निकालने के लिए सड़कों पर उतर आता है। इस विशेष परंपरा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह वर्ष 1998 से बिना किसी व्यवधान के लगातार चली आ रही है। बीते 27 वर्षों की लंबी अवधि से जारी यह आयोजन अब इस इलाके की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है.
गोपाल जी के मंदिर से शुरू होती है यात्रा
कार्तिक मास के पूरे महीने के दौरान दौसा में यह प्राचीन परंपरा पूरी निष्ठा और उत्साह के साथ निभाई जा रही है। प्रत्येक दिन अहले सुबह लगभग पांच बजे गोपाल जी के मंदिर से भक्तों का जत्था भजन-कीर्तन करते हुए आगे बढ़ता है। शहर के मुख्य रास्तों और तंग गलियों से होते हुए यह शोभायात्रा फलसे वाले बालाजी मंदिर तक जाती है। इस दौरान वाद्ययंत्रों की थाप और भक्तों के स्वर से पूरा नगर भक्तिमय हो उठता है और आसपास का वातावरण पूरी तरह से पवित्र हो जाता है.
भक्ति भाव से गूंजते हैं पावन जयकारे
इस प्रभात फेरी के दौरान शामिल होने वाले लोगों में गजब का उत्साह और समर्पण नजर आता है। जब यह टोली गोपाल जी के मंदिर से चलकर फलसे वाले बालाजी मंदिर की तरफ बढ़ती है, तो वहां गोविंद बोलो हरि गोपाल बोलो, राधा रमण हरि गोविंद बोलो के पवित्र जयकारे गूंजने लगते हैं। वापसी के मार्ग में जब यह यात्रा फलसे वाले बालाजी मंदिर के दर्शन के पश्चात पुनः गोपाल जी के मंदिर की ओर लौटती है, तो रास्ते भर हरे कृष्णा हरे राम का सामूहिक संकीर्तन चलता रहता है। इस अद्भुत आध्यात्मिक माहौल से स्थानीय परिवेश सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण हो जाता है.
स्नान करने वाले श्रद्धालुओं को मिलती है प्रेरणा
दौसा में आयोजित होने वाली इस प्रभात फेरी के पीछे एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सामाजिक उद्देश्य भी निहित है। इसका मुख्य उद्देश्य कार्तिक मास में धर्ममय वातावरण का निर्माण करना और सुबह सबेरे कार्तिक स्नान करने वाली महिलाओं तथा अन्य श्रद्धालुओं को समय पर जागने के लिए प्रेरित करना है। तड़के गलियों से गुजरने वाली इस फेरी की आवाज सुनकर लोग अपनी सुबह की शुरुआत ईश्वर की आराधना और पूजा-पाठ के साथ करते हैं.
पीढ़ियों के बदलाव के बाद भी नहीं डिगी आस्था
वर्ष 1998 में आरंभ हुई इस प्रभात फेरी के प्रति स्थानीय निवासियों की प्रतिबद्धता अनुकरणीय है। इतने लंबे सफर के दौरान भले ही समय के साथ कई पीढ़ियां बदल चुकी हैं, किंतु इस आयोजन को लेकर लोगों की आस्था और उत्साह में किसी प्रकार की कमी नहीं आई है। बुजुर्गों के साथ अब नई पीढ़ी के युवा और बच्चे भी इस सांस्कृतिक विरासत को सहेजने और आगे बढ़ाने में बढ़-चढ़कर अपनी हिस्सेदारी दर्ज करा रहे हैं. कार्तिक मास के पूरे महीने सुबह के वक्त दिखाई देने वाला यह दृश्य देखने वालों का मन मोह लेता है.




















