राजस्थान के सिरोही जिले में स्थित आबूरोड के मानपुर इलाके में विजयदशमी पर्व को लेकर तैयारियां जोर पकड़ चुकी हैं। बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक रावण दहन के लिए इस बार कारीगर बड़े पैमाने पर पुतलों के निर्माण में जुटे हैं। मानपुर में एक ही परिवार की तीन पीढ़ियों के करीब 15 सदस्य दिन-रात मेहनत करके दो दर्जन से अधिक छोटे-बड़े पुतलों को आकार दे रहे हैं। पर्व नजदीक आते ही आसपास के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों से लोग इन पुतलों को देखने और उनकी अग्रिम बुकिंग के लिए पहुंचने लगे हैं।
बांस के ढांचे से लेकर वाटरप्रूफ फिनिशिंग तक की कला
पुतला निर्माण की यह प्रक्रिया काफी जटिल और समय लेने वाली होती है। कारीगरों के अनुसार सबसे पहले मजबूत बांस की खपच्चियों की सहायता से रावण के शरीर और उसके दस सिरों का कंकाल तैयार किया जाता है। इसके बाद उस ढांचे पर रद्दी अखबारों और विशेष कागजों की कई परतें गोंद की मदद से चढ़ाई जाती हैं, ताकि पुतला मजबूत रहे और हवा के दबाव को झेल सके। कागजी ढांचा सूखने के बाद उस पर चटकीले रंगों और वाटरप्रूफ पेंट से चेहरे के भाव, मुकुट और वस्त्रों की नक्काशी की जाती है।
बाजार में हर वर्ग की जरूरत और जेब को ध्यान में रखकर पुतले बनाए जा रहे हैं। सबसे छोटे पुतले की ऊंचाई 4 फीट है, जिसे बच्चे और छोटी सोसायटियां आसानी से खरीद सकती हैं। वहीं सबसे बड़ा पुतला 35 फीट ऊंचा तैयार किया जा रहा है, जिसे बड़े मैदानों और सार्वजनिक आयोजनों में दहन के लिए उपयोग में लाया जाता है। ग्राहकों की मांग और पुतलों के आकार के आधार पर इनकी कीमतें 500 रुपये से लेकर अधिकतम 35,000 रुपये तक तय की गई हैं। कई ग्राहक अपनी पसंद के अनुसार ऑर्डर देकर विशेष रंग-रूप के पुतले भी बनवा रहे हैं।
एक दशक से जारी है कारीगरों की यह पारिवारिक परंपरा
क्यारियां जोड़ क्षेत्र की जोगी कॉलोनी के निवासी भंवरलाल और किरण कुमार ने बताया कि उनका परिवार पिछले 10 वर्षों से लगातार बांस की लकड़ियों से रावण के आकर्षक पुतले बनाने का काम कर रहा है। विजयदशमी से करीब दो महीने पहले ही परिवार के सभी 15 लोग इस काम में जुट जाते हैं, जिसमें महिलाएं और बुजुर्ग भी सहयोग करते हैं। यह परिवार केवल मौसमी पुतलों पर ही निर्भर नहीं रहता, बल्कि साल के बाकी महीनों में भी अपनी आजीविका चलाने के लिए बांस की खूबसूरत झोपड़ियां, घरेलू उपयोग की टोकरियां, धार्मिक ध्वज लगाने के लिए डंडे और तरह-तरह की पारंपरिक हस्तशिल्प कलाकृतियां बनाता है।
मौसम की अनिश्चितता और सरकारी उपेक्षा का दोहरा संकट
इस हुनर के पीछे कारीगरों का भारी जोखिम और आर्थिक दर्द भी छिपा हुआ है। कारीगर भंवरलाल के अनुसार, वे अपनी जीवनभर की जमापूंजी और बाजार से उधार लेकर पुतलों के लिए बांस, कागज, कपड़े और रंग खरीदते हैं। इतनी भारी लागत लगाने के बाद भी उनके सिर पर मौसम की मार का खतरा मंडराता रहता है। पिछले वर्ष का अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि दशहरे के ठीक दिन अचानक मूसलाधार बारिश हो गई थी। खुले आसमान के नीचे रखे अधिकांश पुतले भीगकर नष्ट हो गए, जिससे परिवार को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा था और लागत तक नहीं निकल पाई थी।
इसके अलावा स्थानीय कारीगरों को प्रशासन या सरकार की ओर से कोई प्रोत्साहन या वित्तीय सुरक्षा नहीं मिलती है। कारीगरों का कहना है कि दूसरे राज्यों में हस्तशिल्पियों के लिए कई सरकारी कल्याणकारी योजनाएं, बीमा और रियायती दरों पर ऋण की व्यवस्था होती है, लेकिन यहां उन्हें कोई बुनियादी सहायता नहीं दी जाती। यदि कोई पुतला बिकने से रह जाए या भीग जाए, तो सारा नुकसान कारीगर को ही अपनी जेब से भरना पड़ता है। इन तमाम चिंताओं के बीच इस बार आसमान साफ रहने की उम्मीद ने कारीगरों का हौसला बढ़ाया है। उन्हें पूरा विश्वास है कि तैयार किए गए सभी 24 से ज्यादा पुतले समय रहते बिक जाएंगे और परिवार को अच्छी आय होगी।



















