राजस्थान के राजसमंद जिले में स्थित सुप्रसिद्ध कृष्ण तीर्थ चारभुजा गढ़बोर में देव-पितृ श्राद्ध अमावस्या की पावन तिथि पर भक्ति का अद्भुत वातावरण निर्मित हुआ। सुबह की पहली किरण के साथ ही मेवाड़ के धणी के जयकारों से पूरा परिसर गुंजायमान हो उठा। अपने आराध्य के नयनाभिराम रूप को निहारने और आशीर्वाद लेने के लिए राजस्थान के विभिन्न अंचलों के साथ-साथ सीमावर्ती राज्यों से भी बड़ी तादाद में श्रद्धालु पहुंचे, जिससे पूरे दिन धाम में उत्सव जैसा नजारा बना रहा।
विविध पुष्पों की महक से महका ठाकुरजी का प्रांगण
पवित्र पर्व को लेकर मंदिर प्रबंधन एवं सेवकों द्वारा गर्भगृह से लेकर पूरे परिसर को बहुरंगी ताजे फूलों से सजाया गया था। फूलों की महक और मनमोहक लड़ियों के मध्य भगवान का दरबार अलौकिक आभा बिखेर रहा था। दूर-दराज से आने वाले दर्शनार्थियों ने ठाकुरजी के अलौकिक दरबार के समक्ष शीश नवाकर अपने कुटुंब की उन्नति, स्वास्थ्य एवं सुख-शांति के लिए प्रार्थना की।
पारंपरिक मेवाड़ी पाग और विशेष आभूषणों से अलौकिक श्रृंगार
उत्सव के निर्धारित विधान के अनुसार सबसे पहले प्रभु को वैदिक मंत्रोच्चार के साथ स्नान करवाकर ध्यान की प्रक्रिया पूर्ण की गई। इसके उपरांत प्रभु को एक भव्य पोशाक पहनाई गई। उनके स्वरूप को अस्त्र-शस्त्र, सुशोभित वैजयंती माला और सिर पर राजसी आन-बान की प्रतीक मेवाड़ी पाग धारण कराकर पूर्ण किया गया। भगवान के इस अनुपम स्वरूप को देखते ही श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे और हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे।
लापसी, सिंघाड़े की सेव और विशेष नैवेद्य का अर्पण
धाम की प्राचीन परिपाटी के अनुरूप प्रत्येक माह पुजारी की सेवा का क्रम बदलता है। इसी व्यवस्था के तहत वर्तमान औसरे के नवनियुक्त पुजारी परिवार की तरफ से भगवान चारभुजानाथ को पारंपरिक लापसी का महाभोग अर्पित किया गया। भोग की रस्म पूरी होते ही उपस्थित जनसमूह में प्रसाद वितरण किया गया। इसके अतिरिक्त दर्शनार्थियों ने अपनी श्रद्धा अनुसार विविध मिष्ठान्न भेंट किए, जिनमें मावा, कसार, सिंघाड़े की सेव और मौसमी फल सम्मिलित रहे। सभी ने विधि-विधान से पूजा संपन्न कर अपनी मनोकामना पूर्ति का निवेदन किया।
मेहसाणा संघ ने संभाली भोजन प्रसादी की जिम्मेदारी
इस बड़े धार्मिक समागम के दौरान गुजरात के मेहसाणा से आए चारभुजा अमावस्या संघ ने सेवा कार्य में हाथ बंटाया। संघ के सदस्यों द्वारा प्रभु को विशेष प्रसादी समर्पित करने के पश्चात बाहर से आने वाले सभी श्रद्धालुओं के लिए भोजन शाला में निशुल्क भोजन प्रसादी का प्रबंध किया गया। इस पुनीत कार्य से लंबी यात्रा कर गढ़बोर पहुंचे भक्तों को काफी सहूलियत मिली। पूरे दिन चले इस आध्यात्मिक उत्सव ने क्षेत्र में जन-आस्था की गहरी जड़ों को एक बार फिर उजागर किया।























