राजस्थान के खैरथल शहर में बेसहारा और बीमार गोवंश की देखभाल का एक अनूठा और प्रेरणादायी उदाहरण देखने को मिलता है। यहां के स्थानीय निवासी राकेश शर्मा पिछले 25 वर्षों से पूरी निष्ठा और बिना किसी स्वार्थ के घायल, असहाय और बीमार गायों की सेवा में अपना जीवन समर्पित किए हुए हैं। सड़कों पर भटकने वाले और दुर्घटनाओं का शिकार होने वाले मवेशियों को नया जीवन देने के उद्देश्य से उन्होंने करीब ढाई साल पहले श्री गोबिंदम गौ शाला ट्रस्ट की नींव रखी थी। समय के साथ इस नेक काम से शहर के लगभग 25 व्यापारी और अन्य समर्पित गौ सेवक जुड़ गए हैं, जिससे यह सेवा अभियान और अधिक मजबूत हुआ है। अब यह पूरी टीम दिन-रात यानी 24 घंटे और सातों दिन किसी भी समय मिलने वाली सूचना पर घायल गोवंश के उपचार के लिए तत्पर रहती है।
तेरह लाख की आधुनिक एंबुलेंस और बेहतर इलाज की व्यवस्था
इस गौ सेवा के काम को और अधिक व्यापक और असरदार बनाने के लिए राकेश शर्मा और उनकी पूरी टीम ने मिलकर जनता के सहयोग से लगभग 13 लाख रुपये की लागत वाली एक अत्याधुनिक एंबुलेंस तैयार कराई है। जैसे ही टीम को शहर या आसपास के इलाके से किसी बीमार या दुर्घटनाग्रस्त गाय के बारे में कोई सूचना मिलती है, वे तुरंत इस विशेष एंबुलेंस के साथ निर्धारित स्थल पर पहुंच जाते हैं। मौके पर पहुंचने के बाद मवेशी को प्राथमिक उपचार दिया जाता है और फिर उसे सुरक्षित स्थान या उपचार केंद्र तक पहुंचाया जाता है। जिन गायों की हड्डियां टूटी होती हैं या जिनकी स्थिति बेहद गंभीर होती है, उन्हें बेहतर और उच्च स्तरीय चिकित्सा के लिए श्री गोकुल धाम संस्था, झज्जर भेजा जाता है, जहां विशेषज्ञ पशु चिकित्सक उनका ऑपरेशन और इलाज करते हैं। इस संस्था का दावा है कि उनके इस संयुक्त प्रयास से अब तक 3 हजार से अधिक गायों को नया जीवनदान मिल चुका है।
लम्पी वायरस का प्रकोप और सरकारी अस्पताल पर गंभीर सवाल
गौ सेवा के इस सराहनीय सफर के बीच खैरथल में लम्पी वायरस के संक्रमण को लेकर नई चिंताएं और तीखे आरोप सामने आने लगे हैं। क्षेत्र के गौ सेवकों का कहना है कि शहर में खुले आसमान के नीचे घूमने वाले कई पशुओं के शरीर पर मोटी-मोटी गांठे और गहरे घाव साफ दिखाई दे रहे हैं, जो इस खतरनाक बीमारी के पुख्ता लक्षण हैं। स्थानीय पशु चिकित्सालय के लम्पी यार्ड में भी कई गायें उपचाराधीन हैं। श्री गोबिंदम गौ शाला ट्रस्ट से जुड़े सदस्यों ने सरकारी पशु चिकित्सालय की व्यवस्थाओं और प्रबंधों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उनका मुख्य आरोप यह है कि खैरथल में जिला स्तर का ए श्रेणी अस्पताल होने के बावजूद वहां लम्पी बीमारी के इलाज के लिए पर्याप्त मात्रा में दवाइयां और पट्टियां तक उपलब्ध नहीं हैं, जिसके कारण उन्हें मजबूरन अपने खुद के पैसों से बाजार से दवा खरीदकर लानी पड़ती है।
पशुपालन विभाग का तर्क और बीमारी की स्थिति
गौ सेवकों द्वारा लगाए गए इन तमाम आरोपों के जवाब में पशुपालन विभाग के डिप्टी डायरेक्टर पीसी यादव ने अपनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट की है। उन्होंने जानकारी देते हुए बताया कि जिले में लम्पी बीमारी का यह संक्रमण लगभग एक महीने पहले सामने आया था, लेकिन अब यह समाप्ति की ओर अग्रसर है। उनके पास उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पूरे जिले में कुल 496 पशुओं में इस बीमारी के लक्षण पाए गए थे, जिनमें से 487 मवेशी पूरी तरह से स्वस्थ हो चुके हैं। पीसी यादव ने यह बात भी स्वीकार की कि खैरथल-तिजारा जिले में अपना खुद का ड्रग डिपो न होने की वजह से दवाइयां पुराने अलवर जिले से मंगवानी पड़ती हैं, जिसकी वजह से कभी-कभी सीमित आपूर्ति की समस्या पैदा हो जाती है। उन्होंने सभी पशुपालकों से यह अपील भी की है कि वे अपने मवेशियों को आवारा या खुले में न छोड़ें और जैसे-जैसे सर्दी का मौसम आगे बढ़ेगा, इस बीमारी के मामले और अधिक कम हो जाएंगे।
चुनौतियों के बावजूद डटे हैं गौ सेवक
इस पूरे सेवा कार्य का संचालन किसी सरकारी अनुदान के बजाय पूरी तरह से जन सहयोग और टीम के सदस्यों के आपसी योगदान से किया जाता है। किसी भी आपातकालीन स्थिति में ये सदस्य अपनी व्यक्तिगत दिनचर्या को छोड़कर तुरंत सक्रिय हो जाते हैं और गौ सेवा के लिए निकल पड़ते हैं। लम्पी वायरस के पहले दौर के संकट के दौरान भी इस संस्था ने काफी सराहनीय और उल्लेखनीय कार्य किया था। हालांकि दवाइयों की भारी किल्लत और प्रशासनिक उदासीनता जैसी समस्याएं लगातार बनी हुई हैं, लेकिन इसके बावजूद इन समर्पित गौ सेवकों का हौसला और उत्साह बिल्कुल कम नहीं हुआ है। वे निरंतर प्रशासन के समक्ष यह मांग रख रहे हैं कि अस्पताल में कम से कम प्राथमिक उपचार से जुड़ी दवाइयां हर समय अनिवार्य रूप से उपलब्ध रहनी चाहिए ताकि किसी भी बेजुबान जानवर को इलाज के अभाव में परेशानी न उठानी पड़े।


















