बरसात का मौसम खेती-किसानी के साथ-साथ पशुपालन के लिए भी अहम माना जाता है, लेकिन यही मौसम पशुओं की सेहत के लिए सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण भी बन जाता है। बाड़े में जमा नमी, कीचड़ और भीगा हुआ चारा मिलकर पशुओं में कई तरह की बीमारियों को न्योता दे देते हैं। पशु चिकित्सकों की मानें तो इस मौसम में जरा सी लापरवाही जानवरों को गंभीर रूप से बीमार कर सकती है और इसका सीधा असर दूध उत्पादन और पशुपालक की कमाई पर पड़ता है।
सूखा बिछावन ना हो तो खुर और फेफड़े दोनों खतरे में
पशु चिकित्सक विनोद चौधरी के मुताबिक, पशु अगर लंबे समय तक गीली और कीचड़ भरी जमीन पर खड़े रहें तो उनके खुरों में घाव बनने लगते हैं और फुट रॉट जैसी तकलीफ हो सकती है। इसके अलावा सीलन भरी जगह पर बैठे रहने से पशुओं के फेफड़ों पर असर पड़ता है, जिससे सांस की बीमारियां और निमोनिया होने का डर बना रहता है। यही वजह है कि पशुपालकों को पशुओं के बैठने की जगह हमेशा जमीन से थोड़ा ऊंचा, सूखा और साफ-सुथरा रखने की सलाह दी जाती है।
नमी भरे मौसम में सिर्फ बिछावन ही नहीं, चारे को लेकर भी सतर्क रहना जरूरी है। हवा में नमी बढ़ने से खली, चोकर और दाने जैसे अनाज में फफूंद बहुत जल्दी लग जाती है। ऐसा फफूंद लगा चारा लंबे समय तक खिलाया जाए तो पशुओं की उत्पादन क्षमता घटने लगती है, वहीं गाभिन पशुओं में इससे गर्भपात होने का खतरा भी बढ़ जाता है। इसीलिए दाने की बोरियों को सीधे जमीन या दीवार से सटाकर रखने के बजाय लकड़ी के तख्तों या ईंटों के ऊपर, हवादार और सूखी जगह पर रखा जाना चाहिए।
हरे चारे के साथ सूखा चारा भी दें, वरना बिगड़ेगा पाचन
बारिश के मौसम में हरे चारे की कोई कमी नहीं रहती, लेकिन इसे अचानक बड़ी मात्रा में खिला देना पशुओं के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। ज्यादा हरा चारा खाने से पाचन गड़बड़ाने और दस्त लगने की आशंका रहती है, जिसका सीधा असर दूध की मात्रा पर पड़ता है। इससे बचने के लिए हरे चारे को हमेशा सूखे चारे या भूसे के साथ संतुलित मात्रा में मिलाकर देना चाहिए। साथ ही, सुबह के वक्त अगर घास पर ओस या बारिश की बूंदें जमी हों तो पशुओं को तुरंत चरने के लिए न भेजें। बाहर छोड़ने से पहले उन्हें थोड़ा सूखा चारा खिला देने से आफरा जैसी पेट की तकलीफ होने की गुंजाइश कम हो जाती है।
नई घास के साथ शरीर में घुस सकते हैं परजीवी
बरसात थमते ही खेतों और चरागाहों में तेजी से नई घास उग आती है, लेकिन इसके साथ कई तरह के परजीवी और उनके लार्वा भी पशुओं के पेट में पहुंच जाते हैं। यही कारण है कि भरपूर चारा खाने के बावजूद कई पशु धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगते हैं और उनके दूध देने की क्षमता घटने लगती है। इस समस्या से बचाव के लिए पशुपालकों को समय-समय पर पशुओं को कृमिनाशक दवा जरूर पिलानी चाहिए। इसके साथ ही गलघोटू और मुंहपका-खुरपका जैसी संक्रामक बीमारियों की चपेट में आने से बचाने के लिए पशुओं का टीकाकरण भी सही समय पर करवाना जरूरी माना जाता है।
फिसलन भरा फर्श गाभिन पशुओं के लिए बड़ा जोखिम
बारिश के दिनों में गोबर और बारिश का पानी मिलकर पशुशाला के फर्श को काफी चिकना बना देते हैं। ऐसे फर्श पर भारी-भरकम गाय या भैंस का पैर फिसल जाए तो चोट लगने या हड्डी टूटने का खतरा रहता है, और अगर पशु गाभिन हो तो यह नुकसान और भी गंभीर हो सकता है। इसीलिए पशुपालकों को फर्श पर पानी और गोबर जमा नहीं होने देना चाहिए और जरूरत पड़ने पर वहां सूखी रेत डालते रहना चाहिए। पक्के फर्श पर हल्की धारियां बनवाना भी एक कारगर तरीका माना जाता है, क्योंकि इससे पशुओं के खुरों को पकड़ मिलती है और फिसलने की आशंका काफी हद तक कम हो जाती है।
थन की सफाई से टलेगा थनैला रोग का खतरा
बरसात में जब पशु कीचड़ और गंदगी में बैठते हैं तो गोबर-मिट्टी उनके थनों पर चिपक जाती है। दूध निकालते समय यही गंदगी संक्रमण का जरिया बन सकती है और पशुओं में थनैला रोग होने का खतरा बढ़ा सकती है। इसीलिए दूध दुहने से पहले थनों को साफ पानी या कीटाणुनाशक घोल से धोना चाहिए और फिर उन्हें साफ कपड़े से पोंछकर ही दूध निकालना चाहिए। इसके साथ ही दूध दुहने वाले व्यक्ति के हाथ और इस्तेमाल होने वाले बर्तन भी पूरी तरह से साफ होने चाहिए, वरना संक्रमण का खतरा बना रहता है।
जलभराव रोकें, बाहरी परजीवियों से भी करें बचाव
पशु चिकित्सक विनोद चौधरी बताते हैं कि बाड़े के आसपास पानी जमा रहने से मच्छर, मक्खियां और किलनियां तेजी से पनपने लगती हैं। ये कीड़े-मकोड़े पशुओं में सर्रा और बबेसिया जैसी बीमारियों को फैलाने का माध्यम बन जाते हैं। इसीलिए बाड़े के आसपास पानी को इकट्ठा न होने देना चाहिए और वहां नियमित रूप से सफाई बनाए रखनी चाहिए। साथ ही अगर किसी पशु में बीमारी के लक्षण नजर आएं तो उसे तुरंत बाकी स्वस्थ पशुओं से अलग बांध देना चाहिए और उसके दाना-पानी के बर्तन भी अलग रखने चाहिए, ताकि बीमारी बाकी पशुओं तक न फैल सके।





















