राजस्थान का कोटा और उससे सटा हाड़ौती अंचल हमेशा से अपनी उपजाऊ मिट्टी और शानदार कृषि पैदावार के लिए मशहूर रहा है। पूरे राज्य में इस इलाके को गर्व से धान का कटोरा कहा जाता है। लेकिन इस साल प्रकृति की बेरुखी ने इस ऐतिहासिक पहचान पर गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। मानसून की भारी कमी के कारण यह पूरा कृषि बहुल क्षेत्र भीषण सूखे की चपेट में आ गया है। धान एक ऐसी प्रमुख फसल है जिसे पनपने और पकने के लिए सबसे अधिक मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। महीनों से पर्याप्त बारिश न होने के कारण खेतों की नमी पूरी तरह से गायब हो चुकी है, जिसके चलते किसानों की दिन-रात की मेहनत और उनकी उम्मीदें दोनों खेतों में ही दम तोड़ रही हैं। प्रकृति की इस मार ने एक समृद्ध इलाके को पूरी तरह से वीरान कर दिया है।
कृषि विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों का मानना है कि धान की खेती पूरी तरह से प्रचुर जल आपूर्ति पर निर्भर करती है। रोपाई के शुरुआती चरण से लेकर फसल के पूरी तरह पकने तक, खेतों में पानी भरा रहना बेहद जरूरी होता है। इस साल मानसून की शुरुआत में कुछ अच्छी बारिश हुई थी, जिससे उत्साहित होकर किसानों ने धान की रोपाई का काम जोर-शोर से शुरू कर दिया। लेकिन इसके तुरंत बाद मानसून ने जो ब्रेक लिया, वह आज तक नहीं टूटा। आसमान से पानी बरसना बंद हो गया और तेज धूप ने खेतों को सुखा दिया। अब धान, मक्का और सोयाबीन जैसी फसलें बिना पानी के खेतों में ही पीली पड़ने लगी हैं और किसानों की आंखों के सामने बर्बाद हो रही हैं।
जमीन के नीचे भी गहराया जल संकट
बारिश नहीं होने की वजह से सिर्फ ऊपरी सतह ही नहीं सूख रही है, बल्कि भूजल स्तर भी बहुत तेजी से नीचे खिसक गया है। कोटा के ग्रामीण इलाके गिरधरपुरा में हालात सबसे ज्यादा खराब हैं। आम तौर पर बारिश न होने की स्थिति में किसान ट्यूबवेल और बोरवेल के जरिए अपनी फसलों की सिंचाई कर लेते थे। लेकिन इस बार भूजल स्तर इतना ज्यादा गिर चुका है कि ज्यादातर बोरवेल ने पानी देना ही बंद कर दिया है। नहरी पानी की आपूर्ति भी इतनी कम है कि उससे खेतों की प्यास नहीं बुझ पा रही है। पानी का कोई दूसरा स्रोत न होने के कारण सिंचाई व्यवस्था पूरी तरह से ठप पड़ गई है।
इस इलाके में पीढ़ियों से खेती कर रहे पुराने किसानों का कहना है कि उन्होंने अपने जीवन में ऐसा भयानक सूखा पहले कभी नहीं देखा। गिरधरपुरा के स्थानीय किसान दालचंद ने बताया कि वे पिछले 30 से 35 सालों से खेती के पेशे से जुड़े हैं, लेकिन जल संकट का ऐसा भयावह रूप उन्होंने पहली बार देखा है। जिन किसानों ने सालों तक इस जमीन से बंपर पैदावार ली है, वे आज अपनी सूखी जमीन को देखकर हताश और परेशान हैं। यह उनके लिए एक ऐसा अभूतपूर्व संकट है, जिसने उनके रोजगार और जीवनयापन दोनों पर सवालिया निशान लगा दिया है।
बीमारियों का हमला और दोगुनी होती लागत
सूखे की इस मार ने सिर्फ फसलों को ही नहीं सुखाया, बल्कि खेती की लागत को भी आसमान पर पहुंचा दिया है। बारिश कम होने के कारण खेतों में कई तरह की खतरनाक बीमारियां और कीटों का प्रकोप बहुत ज्यादा बढ़ गया है। कमजोर और सूखती फसलों को इन बीमारियों से बचाने के लिए किसान अब जद्दोजहद कर रहे हैं। उन्हें बाजार से बहुत महंगे दामों पर डीएपी, यूरिया और तरह-तरह की कीटनाशक दवाइयां खरीदनी पड़ रही हैं। इससे खेती का बजट पूरी तरह से बिगड़ गया है।
किसानों की आर्थिक कमर टूट चुकी है। मस्तराम मीणा, धन्नालाल और खेती-किसानी से जुड़ी कई अन्य महिलाओं ने अपनी पीड़ा जाहिर करते हुए बताया कि पानी न मिलने से पहले बोया गया महंगा बीज खेतों में ही सड़ गया था। उस भारी नुकसान को झेलने के बाद किसानों ने दोबारा कर्ज लेकर दोगुनी लागत के साथ खेतों में बुवाई की थी। लेकिन भूजल स्तर नीचे जाने और बारिश न होने के कारण अब वह दूसरी फसल भी सूखने की कगार पर है। सिंचाई के अभाव में उनका सारा निवेश मिट्टी में मिल गया है, जिससे उनके सामने गहरा आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।
कर्ज का भारी बोझ और सरकार से गुहार
लगातार बढ़ रही कृषि लागत और पैदावार के पूरी तरह से शून्य होने की भयानक आशंका ने हाड़ौती अंचल के किसानों को गहरे कर्ज के जाल में धकेल दिया है। इस क्षेत्र के ज्यादातर किसानों के पास अपनी कोई बड़ी जमा-पूंजी नहीं होती। उन्होंने महंगे खाद, बीज और दवाइयों का इंतजाम करने के लिए स्थानीय साहूकारों और व्यावसायिक बैंकों से भारी ब्याज दर पर पैसा उधार लिया था। अब फसल के खेतों में ही जलकर बर्बाद हो जाने से इस कर्ज को चुकाने का कोई भी सुरक्षित रास्ता उनके पास नहीं बचा है। किसानों को अब सबसे बड़ी चिंता अपने परिवार के लालन-पालन की सता रही है। भविष्य में बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाना और घर का रोजमर्रा का राशन जुटाना भी उनके लिए एक असंभव चुनौती बन गया है।
खेतों में खड़ी अपनी बर्बाद होती फसलों को देखकर किसान भारी मानसिक दबाव में हैं। इस भयानक आपदा से बचने के लिए किसानों ने अब राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन से तत्काल मदद की गुहार लगाई है। उनकी सबसे प्रमुख मांग यह है कि प्रशासन बिना किसी देरी के खेतों में खराब हुई फसलों की गिरदावरी करवाए। इस सर्वे के आधार पर सरकार तुरंत एक विशेष राहत पैकेज और उचित मुआवजे की घोषणा करे। इसके साथ ही, बची हुई फसलों को बचाने के लिए आपातकालीन स्थिति में कहीं से भी सिंचाई के पानी का प्रबंध किया जाए। किसानों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि अगर प्रशासन ने समय रहते उनकी आर्थिक मदद नहीं की, तो स्थिति और भी ज्यादा विस्फोटक और जानलेवा हो सकती है।




















