राजस्थान के नगर निकाय चुनाव में अब वोटिंग से ठीक पहले वाला सन्नाटा छाने वाला है. हफ्तों से गली-मोहल्लों में गूंज रहे लाउडस्पीकर, रैलियां और घर-घर जाकर वोट मांगने का सिलसिला थमने जा रहा है. इसके बाद फैसला सिर्फ मतदाता के हाथ में रहेगा, जो अकेले बूथ के भीतर अपनी पसंद तय करेगा.
दो चरण, नतीजा एक ही दिन
इस चुनाव में राजस्थान के 309 नगरीय निकायों में पार्षद चुने जाने हैं, जिनके लिए राज्यभर में कुल 10,245 वार्डों में वोटिंग होनी है. इतने बड़े पैमाने की वजह से मतदान को दो अलग-अलग चरणों में बांटा गया है. पहले चरण का मतदान 9 सितंबर को होगा, जबकि दूसरा चरण 11 सितंबर को होगा. दोनों ही दिन मतदान केंद्र सुबह 7 बजे से शाम 6 बजे तक खुले रहेंगे. दोनों चरणों की वोटिंग पूरी होने के बाद सभी वोटों की गिनती एक साथ 14 सितंबर को होगी, जिस दिन हर उम्मीदवार की किस्मत का फैसला सामने आ जाएगा.
पहला चरण: अलवर, भरतपुर, बीकानेर, भीलवाड़ा और जयपुर जिला
9 सितंबर को होने वाले पहले चरण में 162 नगरीय निकायों के 5,425 वार्डों में मतदान होगा. इस चरण में अलवर, भरतपुर, बीकानेर और भीलवाड़ा जिले शामिल हैं, साथ ही जयपुर जिले के अंदर आने वाली 18 स्थानीय निकाय भी इसी चरण का हिस्सा हैं. निर्वाचन आयोग के नियम के मुताबिक, जहां भी मतदान होना है वहां वोटिंग से ठीक 48 घंटे पहले प्रचार पूरी तरह बंद करना जरूरी है, यानी इन इलाकों में चुनाव प्रचार 7 सितंबर की शाम 6 बजे थम जाएगा. इसी समय से इन क्षेत्रों में 'ड्राई डे' भी लागू हो जाएगा, जिसके तहत 7 सितंबर शाम 6 बजे से लेकर 9 सितंबर शाम 6 बजे तक शराब की बिक्री और सप्लाई पर पूरी तरह पाबंदी रहेगी.
दूसरा चरण: जयपुर, जोधपुर समेत राज्य के बड़े नगर निगम
11 सितंबर को होने वाला दूसरा चरण आकार में बड़ा और ज्यादा अहम माना जा रहा है, इसमें 147 नगरीय निकायों के 4,820 वार्डों में वोटिंग होगी. इसी चरण में राजस्थान के सबसे बड़े नगर निगम भी शामिल हैं, जिनमें जयपुर, जोधपुर, कोटा, अजमेर, उदयपुर और पाली प्रमुख हैं. राजधानी जयपुर की बात करें तो यहां के सभी 150 वार्डों में मतदान 11 सितंबर को ही होगा, इसलिए जयपुर शहर में चुनाव प्रचार दो दिन पहले यानी 9 सितंबर की शाम 6 बजे ही थम जाएगा. यहां भी वही 48 घंटे का मौन काल और ड्राई डे के नियम पहले चरण जितनी ही सख्ती से लागू रहेंगे.
48 घंटे की खामोशी में क्या-क्या नहीं हो सकता
प्रचार थमने के बाद के ये 48 घंटे पूरी चुनावी प्रक्रिया का सबसे संवेदनशील और सबसे ज्यादा निगरानी वाला समय माने जाते हैं. इस दौरान किसी भी तरह की सार्वजनिक सभा, रैली या जुलूस निकालने की इजाजत नहीं होती. उम्मीदवार और पार्टियां लाउडस्पीकर या किसी और माध्यम से सीधे जनसंपर्क भी नहीं कर सकतीं. मतलब, वोटर को सीधे या घुमा-फिराकर प्रभावित करने वाली हर सार्वजनिक गतिविधि पर मतदान पूरा होने तक पूरी तरह रोक लग जाती है.
अब असली परीक्षा वोटर की खामोशी में
प्रचार का शोर थमते ही नेताओं के तमाम वादे, दावे और जवाबी दावे अपनी असली परीक्षा से गुजरते हैं, वह भी किसी मंच पर नहीं बल्कि हर वोटर के मन के भीतर. जो मंच कुछ दिन पहले तक नेताओं की आवाज से गूंज रहे थे, वे अब खामोश हो जाते हैं और किसी भी पार्टी के पास जनता को रिझाने के लिए आखिरी वक्त पर कोई नया दांव नहीं बचता. इस लगाई गई खामोशी में हर वोटर अकेले तय करता है कि उसे किस पर भरोसा करना है, किसे अपना नुमाइंदा बनाना है और किससे अपने वार्ड के विकास का हिसाब मांगना है.
राजस्थान के नगर निकाय चुनावों का यह हाई-वोल्टेज प्रचार अब अपने आखिरी पड़ाव की तरफ बढ़ चुका है और मुकाबला उम्मीदवारों के हाथ से निकलकर पूरी तरह वोटर के हाथ में आ गया है. 14 सितंबर को वोटों की गिनती के बाद ही यह तय हो पाएगा कि किसकी रणनीति काम आई और जनता ने किसे घर बिठा दिया.


















