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राजस्थान के इस अनोखे मंदिर में शिव के मेहमान हैं विष्णु, जानिए क्या है इसके पीछे की पौराणिक कथाराजस्थान
17 सित॰ 2026, 10:44 am (1 दिन पहले)· 0

राजस्थान के इस अनोखे मंदिर में शिव के मेहमान हैं विष्णु, जानिए क्या है इसके पीछे की पौराणिक कथा

राजस्थान के सिरोही जिले में स्थित वास्तानेश्वर महादेव मंदिर अपनी अनूठी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है, जहां भगवान शिव के धाम में भगवान विष्णु मेहमान रूप में विराजते हैं।

अरावली पर्वतमाला की गोद में बसा राजस्थान का सिरोही जिला एक ऐसे अनोखे धार्मिक स्थल का गवाह है, जहां देवलोक की परंपराएं धरती पर जीवंत नजर आती हैं। माउंट आबू की तलहटी में पिंडवाड़ा तहसील के ईसरा गांव के पास स्थित इस प्राचीन धाम को वास्तान जी अथवा वास्तानेश्वर महादेव मंदिर के नाम से जाना जाता है। इस स्थान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह मूल रूप से भगवान शिव का पावन मंदिर है, किंतु यहां जगत के पालनहार भगवान विष्णु एक अतिथि के रूप में विराजमान हैं। धार्मिक श्रद्धा के साथ-साथ इस मंदिर का ऐतिहासिक और पौराणिक गौरव भी अत्यंत व्यापक है, जो इसे आसपास के क्षेत्र में बेहद खास बनाता है।

हरि और हर का अद्भुत संगम और पूजा की परंपरा

इस पवित्र मंदिर के मुख्य गर्भ गृह में भगवान शिव और भगवान विष्णु एक ही प्रांगण में एक साथ दर्शन देते हैं, जिसे सनातन संस्कृति में हरि और हर का अनूठा मिलन माना गया है। जनश्रुतियों और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, पौराणिक काल में भगवान विष्णु ने इस क्षेत्र में अतिथि के रूप में विश्राम किया था। इसी प्रसंग के चलते इस मंदिर में एक विशेष नियम का पालन किया जाता है, जिसके तहत सबसे पहले भगवान विष्णु की पूजा की जाती है और उसके उपरांत भगवान शिव की आराधना संपन्न होती है। पहाड़ी पर कुछ सीढ़ियां तय करने के बाद एक प्राकृतिक गुफा के भीतर मुख्य गर्भ गृह आता है, जहां सम्मुख भगवान शिव का पावन शिवलिंग और दाईं तरफ श्री विष्णु की श्यामल वर्ण की मनमोहक मूर्ति स्थापित है। इस गुफा के प्रवेश द्वार के बाहर भी कई प्राचीन कलाकृतियों वाली मूर्तियां और छोटे शिवलिंग भक्तों की आस्था का केंद्र हैं।

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आबू का प्राचीन प्रवेश द्वार और पौराणिक परिक्रमा

ऐतिहासिक नजरिए से इस स्थल को माउंट आबू का मुख्य और पुराना द्वार माना जाता है। हर वर्ष आयोजित होने वाली प्रसिद्ध आबू परिक्रमा का श्रीगणेश इसी पवित्र स्थल से किया जाता है, जिसमें भाग लेने के लिए सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु दूर-दूर से खिंचे चले आते हैं। कथाओं के मुताबिक, जब ब्रह्म खाई के समीप आबू पर्वत की स्थापना हुई थी, तब तैंतीस कोटि देवी-देवताओं ने इस भूभाग की यात्रा की थी। इस दिव्य यात्रा के दौरान सभी देवी-देवताओं ने इसी प्रांगण में रात्रि विश्राम किया था। देवताओं के यहां निवास करने के कारण ही इस स्थान का नाम वास्तान जी पड़ गया, जो समय के साथ इस क्षेत्र की पहचान बन गया।

तपस्वी संत मुनिजी महाराज की साधना स्थली

यह पावन परिसर केवल देवताओं के ठहराव के लिए ही नहीं, बल्कि उच्च कोटि के योगियों और तपस्वियों की भूमि के रूप में भी विख्यात रहा है। माउंट आबू के जाने-माने तपस्वी संत मुनि जी महाराज ने इसी स्थान पर लंबे समय तक अत्यंत कठिन साधना की थी। पुराने समय में लोग उन्हें भक्त मौनी महाराज के नाम से संबोधित करते थे, क्योंकि वे सदैव मौन रहकर अपने ईष्ट की आराधना में लीन रहते थे। आज भी इस परिसर में मुनिजी महाराज का एक भव्य और सुंदर मंदिर बना हुआ है, जहां भक्तजन नमन करने आते हैं। उनकी स्मृति में प्रत्येक वर्ष यहां एक बड़े मेले का आयोजन किया जाता है, जो इस स्थान की सांस्कृतिक महत्ता को और अधिक बढ़ाता है।

प्राकृतिक सौंदर्य और पर्वों पर उमड़ने वाली भीड़

इस मंदिर के प्रति स्थानीय निवासियों और आगंतुकों की अगाध श्रद्धा है। सावन के पवित्र मास, विशेष तौर पर हरियाली अमावस्या और महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर यहां भारी मेलों का आयोजन होता है, जिसमें सिरोही समेत दर्जनों गांवों के हजारों लोग भगवान के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। अरावली की हरी-भरी पहाड़ियों के बीच स्थित होने के कारण यहां का प्राकृतिक परिवेश मन को मोह लेता है। मंदिर परिसर के समीप एक प्राचीन कुंड मौजूद है और वर्षा ऋतु के दौरान यहां एक सुंदर झरना भी फूट पड़ता है, जो इसकी सुंदरता में चार चांद लगा देता है। शांत वातावरण और नैसर्गिक सुंदरता इसे एक आदर्श आध्यात्मिक केंद्र बनाती है।

सवाल-जवाब

वास्तानेश्वर महादेव मंदिर कहां स्थित है?
यह मंदिर राजस्थान के सिरोही जिले में पिंडवाड़ा तहसील के ईसरा गांव के पास अरावली की पहाड़ियों में स्थित है।
इस मंदिर की मुख्य विशेषता क्या है?
यह एक शिव मंदिर है जहां भगवान विष्णु मेहमान के रूप में विराजमान हैं और उनकी पूजा सबसे पहले की जाती है।
इस स्थान का नाम वास्तान क्यों पड़ा?
मान्यता है कि 33 कोटि देवी-देवताओं ने आबू की यात्रा के दौरान यहां रात्रि विश्राम या वास किया था।
कौन सी प्रसिद्ध परिक्रमा इस स्थान से शुरू होती है?
हर साल आयोजित होने वाली प्रसिद्ध आबू परिक्रमा की शुरुआत इसी पवित्र स्थान से होती है।
मुनिजी महाराज कौन थे?
वे माउंट आबू के एक प्रसिद्ध तपस्वी संत थे जिन्होंने इसी स्थान पर कई वर्षों तक कठोर मौन साधना की थी।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 4

Ravikash Gupta@ravikash·1 दिन पहले

राजस्थान के सिरोही जिले का वास्तानेश्वर महादेव मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर को भी मजबूत करता है। माउंट आबू की तलहटी में स्थित यह स्थल धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने की अपार क्षमता रखता है, जिससे स्थानीय आतिथ्य सत्कार, परिवहन और हस्तशिल्प जैसे क्षेत्रों में आजीविका के नए अवसर पैदा हो सकते हैं। इस प्रकार की ऐतिहासिक विरासतों का संरक्षण ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने में अहम भूमिका निभाता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·1 दिन पहले

वास्तानेश्वर महादेव मंदिर जैसे ऐतिहासिक स्थलों का विकास न केवल धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देता है, बल्कि यह सार्वजनिक नीति के उस दृष्टिकोण को भी पुष्ट करता है जहाँ सांस्कृतिक धरोहरें क्षेत्रीय विकास का इंजन बनती हैं। यदि स्थानीय प्रशासन और पर्यटन बोर्ड इस मार्ग पर बुनियादी ढांचे और कनेक्टिविटी को बेहतर बना सकें, तो सिरोही जिले में पर्यटकों के ठहरने की अवधि और आवाजाही दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है, जो ग्रामीण रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए दीर्घकालिक लाभ साबित होगा।

Rohan Verma@rohan-verma·1 दिन पहले

अरावली की तलहटी में स्थित यह स्थल केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पर्यटन के विकास की अपार संभावनाएं समेटे हुए है। यदि इस प्राचीन मार्ग और प्राकृतिक गुफा को पर्यटन सर्किट से जोड़ा जाए, तो सिरोही जिले में क्षेत्रीय आर्थिकी और स्थानीय रोजगार को एक नई गति मिल सकती है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 दिन पहले

सहकर्मी रोहन वर्मा के सांस्कृतिक पर्यटन और आर्थिकी वाले बिंदु को आगे बढ़ाते हुए, इस प्राचीन अरावली क्षेत्र में पर्यटकों की आवाजाही बढ़ने से सार्वजनिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के बुनियादी ढांचे को भी मजबूत करने की तत्काल आवश्यकता होगी। माउंट आबू के इस पुराने मार्ग और प्राकृतिक गुफा परिसर तक सुगम पुलिस गश्त, यातायात प्रबंधन और आपातकालीन सहायता प्रणाली विकसित करना अनिवार्य होगा, ताकि धार्मिक मेलों और परिक्रमा के दौरान बढ़ती भीड़ को सुरक्षित ढंग से प्रबंधित किया जा सके।

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