झीलों के खूबसूरत शहर उदयपुर की पहचान केवल जलस्रोतों और महलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां के प्राचीन धार्मिक स्थल मेवाड़ की समृद्ध विरासत की गवाही देते हैं। इसी ऐतिहासिक कड़ी में शहर के भीतर स्थित माता गज लक्ष्मी का देवालय अपनी अनूठी परंपराओं के लिए श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र है। सामान्य दिनों की तुलना में दीपावली के पावन पर्व पर इस धार्मिक स्थल की आभा कई गुना बढ़ जाती है, जहां सुख, समृद्धि और ऐश्वर्य के प्रतीक माने जाने वाले गज लक्ष्मी स्वरूप की आराधना पूरे विधि-विधान से की जाती है।
मेवाड़ के स्वर्णिम दौर और जगदीश मंदिर से जुड़ा निर्माण काल
इस पवित्र स्थल का अतीत मेवाड़ राजवंश के अत्यंत महत्वपूर्ण कालखंड से जुड़ा हुआ है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, जिस समय मेवाड़ के महाराणा ने शहर में भगवान जगदीश के विशाल और भव्य देवालय का निर्माण करवाया था, ठीक उसी समयावधि में माता गज लक्ष्मी के इस मंदिर की भी स्थापना की गई थी। उस ऐतिहासिक दौर में उदयपुर की सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक पहचान को एक मजबूत धरातल मिल रहा था। मंदिर के गर्भगृह में स्थापित प्रतिमा में देवी एक गज यानी हाथी पर आसीन हैं। सनातन धर्म परंपरा में गज पर विराजमान लक्ष्मी का यह स्वरूप धन, वैभव और सौभाग्य का दाता माना जाता है, जिसके दर्शन के लिए लोग दूर-दराज से खिंचे चले आते हैं।
पांच दिवसीय दीपोत्सव और बहुमूल्य रत्नों से शृंगार की परंपरा
दीपावली के आगमन के साथ ही यहां धार्मिक उत्सवों की एक विस्तृत श्रृंखला शुरू हो जाती है। उदयपुर शहर दीपोत्सव समिति के अध्यक्ष प्रकाश नागदा ने बताया कि प्रतिवर्ष दीपावली के उपलक्ष्य में यहां पांच दिनों तक चलने वाले विशेष दीपोत्सव का आयोजन किया जाता है। इन उत्सवों के दौरान समूचे परिसर को विशेष रूप से सजाया जाता है और देवी को सोने तथा चांदी से तैयार की गई भव्य पोशाक पहनाई जाती है। इसके साथ ही माता का अलौकिक शृंगार भी विशुद्ध सोने और चांदी के पारंपरिक आभूषणों से संपन्न होता है, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु उमड़ते हैं।
गोवर्धन पूजा पर भव्य अन्नकूट और दूर-दराज से आने वाले भक्त
इस धार्मिक केंद्र की सबसे प्रमुख और प्रतिष्ठित परंपराओं में अन्नकूट का आयोजन शामिल है। दीपावली की पावन रात्रि से लेकर गोवर्धन पूजा के दिन तक यहां सिलसिलेवार अनुष्ठान चलते हैं, जिसका समापन गोवर्धन पूजा के अवसर पर आयोजित होने वाले विशाल अन्नकूट महोत्सव के साथ होता है। इस विशेष दिन देवी को विविध प्रकार के पारंपरिक व्यंजनों का भोग अर्पित किया जाता है। इस महाप्रसाद और अनुष्ठान का हिस्सा बनने के लिए केवल स्थानीय नगरवासी ही नहीं, बल्कि संपूर्ण मेवाड़ अंचल तथा उदयपुर संभाग के सुदूर क्षेत्रों से श्रद्धालु पूरे परिवार सहित यहां पहुंचते हैं। पीढ़ियों से संजोई गई यह परंपरा आज भी मेवाड़ की अटूट धार्मिक निष्ठा को पूरी गरिमा के साथ जीवंत रखे हुए है।



















