उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में स्थित रामगया घाट की धार्मिक पहचान देश भर में विख्यात है। मां विंध्यवासिनी मंदिर से करीब 500 से 700 मीटर की दूरी पर गंगा किनारे बना यह स्थल प्रभु श्री राम के चरणों और उनके द्वारा किए गए पितृ कर्मों की स्मृति संजोए हुए है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार लंकापति रावण का वध कर अयोध्या लौटने के पश्चात भगवान राम ने अपने पिता राजा दशरथ के निमित्त पितृदान की प्रक्रिया पूरी की थी। इसी क्रम में उन्होंने मिर्जापुर की इस पावन धरा पर आकर पिंडदान संपन्न किया, जिसके चलते इस तट का नामकरण उनके नाम पर रामगया घाट हुआ।
आनंद रामायण में वर्णित विंध्य पर्वत पर आगमन का प्रसंग
विंध्यधाम के आचार्य पं. अनुपम महाराज के अनुसार इस पूरे घटनाक्रम का स्पष्ट उल्लेख आनंद रामायण में प्राप्त होता है। ग्रंथ के विवरण बताते हैं कि प्रभु श्री राम अपने वनवास काल के दौरान विंध्याचल पर्वत क्षेत्र में भी पहुंचे थे और वहां उन्होंने अच्छा खासा समय बिताया था। उसी अवधि के दौरान प्रभु को यह आभास हुआ कि उनके पिता का देहावसान हो चुका है। चूंकि राजा दशरथ का निधन पुत्र वियोग के गहन शोक में हुआ था, इसलिए इसे अकाल मृत्यु के रूप में देखा गया।
पिता के गोलोक गमन का भान होते ही भगवान राम ने विंध्याचल मंदिर से थोड़ी दूरी पर गंगा तट की एक शिला पर आवश्यक अनुष्ठान शुरू किए। मान्यता है कि उस समय राजा दशरथ प्रेत स्वरूप में उसी शिला पर उपस्थित हुए थे।
प्रेत शिला पर पिंडदान और रामेश्वर महादेव की स्थापना
प्रभु श्री राम ने उसी स्थल पर संपूर्ण पितृ श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान की विधियां पूरी कीं। इस अनुष्ठान के प्रभाव से दशरथ जी को प्रेतत्व की स्थिति से मुक्ति मिली और वे पितृ योनि में प्रतिष्ठित हुए। भगवान राम ने यहां आराधना करते हुए मां विंध्यवासिनी के दर्शन किए और रामेश्वर महादेव की स्थापना भी की। यह शिवालय आज भी प्रभु राम द्वारा किए गए धार्मिक कार्यों के जीवंत प्रमाण के रूप में विद्यमान है।
घाट पर आज भी वह ऐतिहासिक प्रेत शिला मौजूद है, जिस पर भगवान राम ने अपने पिता के लिए श्राद्ध तर्पण किया था। इसके साथ ही वहां प्रभु श्री राम की चरण पादुका भी स्थापित है, जिनके दर्शन के लिए श्रद्धालु निरंतर पहुंचते हैं।
पितृदोष और पारिवारिक संकटों से मुक्ति की परंपरा
धार्मिक परंपराओं और पुराणों में इस स्थल को पितरों के तर्पण तथा श्राद्ध कर्म के लिए अत्यंत कल्याणकारी माना गया है। आचार्य अनुपम महाराज के अनुसार यहां पिंडदान करने वाले श्रद्धालुओं के परिवार पितृदोष की पीड़ा से मुक्त हो जाते हैं। यदि किसी परिवार में संतान प्राप्ति में अड़चनें आ रही हों, आर्थिक कर्ज का दबाव बना हुआ हो या घरेलू कलह लगातार अशांति पैदा कर रही हो, तो यहां त्रिपिंडी श्राद्ध कराने का विधान बताया गया है। मान्यता है कि इस पावन तट पर श्रद्धापूर्वक किया गया श्राद्ध कर्म संकटों को दूर कर जीवन में शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है।



















