हरिद्वार का पौराणिक नाम हर द्वार यानी भगवान शिव का द्वार माना जाता है। इस पवित्र नगरी में महादेव से जुड़े कई प्राचीन और सिद्ध स्थल मौजूद हैं, जिनका उल्लेख धार्मिक ग्रंथों में विस्तार से मिलता है। सावन के महीने में इन सभी शिवालयों के साथ-साथ भगवान शिव की ससुराल का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है, जहां दर्शन मात्र से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
सावन महीने का आखिरी सोमवार होने के कारण आज सुबह तड़के से ही शिव मंदिरों में भक्तों का तांता लगा रहा। श्रद्धालु हाथों में गंगाजल से भरे लोटे थामे लंबी-लंबी कतारों में अपनी बारी का इंतजार करते नजर आए। ऐसा ही अद्भुत नजारा हरिद्वार की प्राचीन नगरी कनखल में देखने को मिला, जहां भगवान शिव की ससुराल स्थित है और भक्त वहां जलाभिषेक के लिए पहुंचे।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रावण मास में भगवान शिव अपने कैलाश धाम को छोड़कर अपनी ससुराल में वास करते हैं और यहीं से पूरी सृष्टि का संचालन करते हैं। कनखल स्थित दक्षेश्वर महादेव मंदिर में देश के कोने-कोने से श्रद्धालु पहुंच रहे हैं, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि यहां गंगाजल अर्पित करने से विशेष पुण्य और फलों की प्राप्ति होती है।
कनखल क्षेत्र को भगवान शिव की पहली पत्नी माता सती का जन्म स्थान भी माना जाता है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक, इसी स्थान पर क्रोधित होकर महादेव ने राजा दक्ष का सिर काट दिया था और बाद में देवताओं के अनुरोध पर उन्हें बकरे का सिर लगाया गया था। ऐसी आस्था है कि सावन के पूरे महीने भगवान शिव इसी पावन भूमि पर रहते हैं और भक्त केवल एक लोटा गंगाजल अर्पित करके ही उन्हें प्रसन्न कर लेते हैं.
इस प्राचीन दक्षेश्वर महादेव मंदिर परिसर में चमत्कारी शिवलिंग के साथ-साथ राजा दक्ष की यज्ञशाला भी स्थित है, जहां माता सती ने अपने शरीर को हवन कुंड की अग्नि को समर्पित कर दिया था। सावन के इस पवित्र महीने में आने वाले श्रद्धालु न केवल शिवलिंग पर गंगाजल, दूध और बेलपत्र चढ़ाते हैं, बल्कि इस ऐतिहासिक हवन कुंड के दर्शन भी करते हैं।
कनखल के दक्षेश्वर महादेव मंदिर के पंडित श्रीधर शास्त्री बताते हैं कि भगवान शिव सावन के पूरे महीने यहीं निवास करते हैं। जो भक्त सच्चे मन और श्रद्धा के साथ यहां पूजा-पाठ और व्रत करते हैं, महादेव उन पर अपनी विशेष कृपा बरसाते हैं। यहां शिवलिंग का एक लोटा गंगाजल से अभिषेक करने मात्र से जीवन के तमाम कष्ट और दरिद्रता दूर हो जाती है।
सावन का यह आखिरी सोमवार केवल व्रत और पूजन तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि यह उन लोगों के लिए भी एक सुनहरा अवसर साबित हुआ जो पूरे महीने अपनी व्यस्तता के चलते शिव आराधना नहीं कर पाए थे। कई श्रद्धालुओं ने यहां पहुंचकर कुछ पल शांति से बिताए और ॐ नमः शिवाय का जाप किया।


















