कृषि के क्षेत्र में नए प्रयोग और कड़ी मेहनत के दम पर झारखंड की महिलाएं अपनी अलग पहचान बना रही हैं। रांची जिले के नगरी प्रखंड स्थित पोखर टोली गांव की रहने वाली मुन्नी देवी इसका एक बड़ा उदाहरण हैं। वह 25 एकड़ के विशाल भूभाग पर बैंगन की व्यापक खेती करती हैं। अपनी 5 सहयोगियों की टीम के साथ मिलकर उन्होंने पारंपरिक किसानी को एक सफल व्यापारिक मॉडल में तब्दील कर दिया है। उनकी फसल की गुणवत्ता इतनी बेहतर है कि उनके खेतों का बैंगन दक्षिण भारत के राज्यों से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक के बाजारों में सप्लाई किया जाता है।
उत्पादन का गणित और सीजन में 12 लाख रुपये तक की कमाई
मुन्नी देवी के अनुसार, उनकी 25 एकड़ खेती में प्रति एकड़ औसतन 30 क्विंटल बैंगन का उत्पादन होता है। वह अपनी फसल को सीधे बड़े व्यापारियों को बेचती हैं, जिससे उन्हें बिचौलियों के बिना उचित दाम मिल पाते हैं। बैंगन के पूरे सीजन के दौरान उन्हें 10 से 12 लाख रुपये तक की कुल कमाई हो जाती है। हालांकि, इस कमाई में से एक हिस्सा बीज, खेत की तैयारी, खाद, सिंचाई और कीटनाशकों की लागत पर खर्च होता है। अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा पुनः खेती के विस्तार और बेहतरी में लगाकर वह अपने मॉडल को टिकाऊ बनाए हुए हैं।
कीट प्रबंधन और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के देशी उपाय
बैंगन की खेती में सबसे बड़ी चुनौती कीटों और कीड़ों का प्रकोप होता है। मुन्नी देवी बताती हैं कि 25 एकड़ के विशाल क्षेत्र में कीड़ों के कारण लगभग 2 से 3 क्विंटल बैंगन खराब हो जाते हैं। इस नुकसान को कम करने के लिए वह आवश्यकतानुसार रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग करती हैं। इसके साथ ही, मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता बढ़ाने के लिए वह सूखे गोबर को जलाकर उसकी राख खेत में डालती हैं। उनका मानना है कि गोबर की राख से मिट्टी को पोषण मिलता है और प्राकृतिक रूप से कीटों का हमला भी कम होता है। वह रासायनिक खादों के बजाय जैविक खाद के उपयोग को प्राथमिकता देती हैं।
खेती की तैयारी और जैविक खाद का सही संतुलन
फसल बोने से पहले खेत की तैयारी पर विशेष ध्यान दिया जाता है। मुन्नी देवी खेत की जुताई के समय गोबर और केंचुआ खाद (वर्मीकंपोस्ट) का मिश्रण मिट्टी में मिलाती हैं। इसके बाद खेत को 3 से 4 बार अच्छी तरह जोता जाता है और फिर मिट्टी को धूप में सूखने के लिए खुला छोड़ दिया जाता है। तेज धूप लगने से मिट्टी में मौजूद हानिकारक जीवाणु खत्म हो जाते हैं और जमीन की जलधारण क्षमता में सुधार होता है। यह प्रक्रिया पौधों को तेजी से बढ़ने और पोषक तत्व खींचने में मदद करती है।
बरसात के मौसम में जलजमाव से बचाव की विशेष तकनीक
मानसून के दौरान अत्यधिक बारिश बैंगन की फसल के लिए सबसे बड़ा खतरा बनती है। जड़ों के पास पानी रुकने से जड़ सड़न की बीमारी फैलती है और कीड़ों का प्रकोप बढ़ जाता है। इस समस्या से निपटने के लिए मुन्नी देवी पौधों की रोपाई थोड़ी ऊंची जगह या मेढ़ों पर करती हैं। इस तकनीक से बारिश का अतिरिक्त पानी नीचे की ओर बह जाता है और पौधों की जड़ों में पानी का जमाव नहीं होता। इस जल प्रबंधन रणनीति के कारण बरसात में भी उनकी फसल सुरक्षित रहती है और पैदावार पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता।



















