दरभंगा घूमने का मन हो तो बाबा कुशेश्वर नाथ महादेव के दर्शन को अपनी सूची से बाहर मत रखिए। यहां की मान्यता है कि सच्चे मन से जो भी मांगा जाए, बाबा उसे जरूर सुनते हैं। नौकरी की चिंता हो, परीक्षा का पेपर हो या घर-परिवार की कोई उलझन, भक्त यहां से कभी खाली हाथ नहीं लौटते। कोसी, कमला और बलान जैसी नदियों के बीच बसा यह धाम सिर्फ श्रद्धा का ठिकाना नहीं, बल्कि प्रकृति की गोद में बीतने वाला एक सुकून भरा सफर भी है।
नाम के पीछे की कहानी
कहा जाता है कि इस शिवलिंग की स्थापना भगवान श्रीराम के पुत्र कुश ने की थी, और इसी वजह से इस जगह को 'कुशेश्वर स्थान' कहा जाने लगा। एक दूसरी मान्यता यह भी है कि यहां कभी कुश के घने जंगल हुआ करते थे। कुश और ईश्वर इन्हीं दो शब्दों के मेल से कुशेश्वर नाथ नाम बना, जो आज तक चला आ रहा है।
कैसे पहुंचें
दरभंगा बस स्टैंड से कुशेश्वर स्थान के लिए हर 20 मिनट पर बस मिल जाती है। दरभंगा रेलवे स्टेशन से थोड़ा आगे बढ़कर दोनार चौक से होते हुए सोनकी, धरोरा, बेनीपुर और बिरौल के रास्ते सीधे कुशेश्वर स्थान पहुंचा जा सकता है। रास्ता बेहद आसान है और किराया भी जेब पर भारी नहीं पड़ता।
दर्शन और पूजा की विधि
मंदिर पहुंचते ही सबसे पहले सामने बहती शिवगंगा में स्नान करने की परंपरा है। घाट पर ही 10 से 20 रुपये में गंगाजल और फूल की थाली मिल जाती है। इसी से बाबा का जलाभिषेक किया जाता है। इसके बाद बेलपत्र और धतूरा चढ़ाकर ॐ नमः शिवाय का जाप करने पर मन को एक अलग ही शांति का अनुभव होता है।
खाने और ठहरने की सुविधा
दर्शन के बाद मंदिर से कुछ ही कदम की दूरी पर कई होटल और भोजनालय मिल जाते हैं, जहां शाकाहारी भोजन आसानी से उपलब्ध है। अगर रात रुकने का इरादा हो तो धर्मशाला और बजट होटल भी मौजूद हैं। शाम के वक्त बाहर निकलकर ठंडी हवा और नदियों के नजारे का आनंद लिया जा सकता है।
सुरक्षा का पूरा इंतजाम
भक्तों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए मंदिर के ठीक सामने ही कुशेश्वर स्थान थाना बनाया गया है। यही वजह है कि महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे सभी बेफिक्र होकर दर्शन कर सकते हैं। माना जाता है कि दरभंगा की यात्रा तभी पूरी होती है जब बाबा कुशेश्वर नाथ का आशीर्वाद मिल जाए। एक बार यहां जाकर माथा टेकने भर से बाबा की कृपा से मनोकामनाएं अपने आप पूरी होने लगती हैं।













