शारदीय नवरात्र के पावन उत्सव की औपचारिक शुरुआत 11 अक्टूबर से हो चुकी है। इस धार्मिक अनुष्ठान के अंतर्गत अगले नौ दिनों तक श्रद्धालु अपने घरों और देवालयों में सुबह और शाम मां भगवती की उपासना पूरे विधि-विधान से करेंगे। सनातन परंपरा में किसी भी देव-उपासना को तब तक अपूर्ण समझा जाता है जब तक कि अनुष्ठान का समापन दीप प्रज्वलित कर विधिवत वंदना गायन के साथ न किया जाए। यही कारण है कि प्रात:काल और संध्या वंदन के समय मां दुर्गा के विशेष मंत्रों और पारंपरिक आरतियों के सस्वर पाठ का बहुत बड़ा महत्व माना गया है।
गणपति वंदना से आरंभ करने का पारंपरिक नियम
धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार, देवी की किसी भी स्तुति या मंगल गान को शुरू करने से पहले प्रथम पूज्य भगवान गणेश की आराधना करना अनिवार्य होता है। मान्यता है कि विघ्नहर्ता का स्मरण किए बिना की गई साधना में विघ्न आ सकते हैं। इसलिए भक्त सबसे पहले गणपति बप्पा की वंदना करते हैं और उसके उपरांत ही जगदंबा के विभिन्न स्वरूपों की मंगल आरती का गायन आरंभ किया जाता है। यह परंपरा सदियों से पूजा-पद्धति का एक अटूट हिस्सा बनी हुई है।
सकल संकट हरने वाली पारंपरिक स्तुतियां
नवरात्र पूजन के समापन पर मुख्य रूप से दो प्रमुख आरतियों के गायन की परिपाटी प्रचलित है। इनमें से एक स्तुति मां के संहारक और करुणामयी स्वरूप को समर्पित है, जिसमें जगदंबा को खप्पर धारिणी, सिंह की सवारी करने वाली और अष्ट भुजाओं से सुशोभित महाशक्ति के रूप में नमन किया जाता है। इस रचना में भक्त मां से प्रार्थना करते हैं कि जब भी उनके सेवकों पर कोई भारी विपत्ति आए, तब मां अपनी अपार शक्ति से असुर प्रवृत्तियों का दलन करें। साथ ही यह भाव भी प्रकट किया जाता है कि संसार में भले ही कुपुत्र हो जाए, किंतु माता कभी कुमाता नहीं हो सकती। भक्त सांसारिक धन, स्वर्ण या चांदी की याचना न करते हुए केवल चरणों में एक छोटा सा स्थान मांगते हैं।
दूसरी ओर, जय अम्बे गौरी की लोकप्रिय रचना में देवी के शांत, ऐश्वर्यशाली और ममतामयी रूप का विशद वर्णन मिलता है। इस वंदना में बताया गया है कि कैसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश नित्य मां का ध्यान करते हैं। उनके मस्तक पर सिंदूर और कस्तूरी का तिलक सुशोभित है, उनके दोनों नयन उज्ज्वल हैं और मुखमंडल चंद्रमा के समान शीतल कांति बिखेरता है। स्वर्ण के समान उनके देह पर लाल वस्त्र और गले में रक्त पुष्पों की माला शोभित होती है।
दुष्ट संहार और ब्रह्मांडीय शक्तियों का गौरव गान
पारंपरिक स्तुतियों में महिषासुर मर्दिनी के उन ऐतिहासिक प्रसंगों को भी सजीव किया गया है जहां देवी ने त्रिलोक की रक्षा की थी। महिषासुर के संहार के साथ-साथ शुंभ, निशुंभ, चंड, मुंड, धूम्रलोचन, रक्तबीज तथा मधु-कैटभ जैसे असुरों का अंत कर देवताओं को भयमुक्त करने की गाथाएं इन पंक्तियों में गाई जाती हैं। मां को ही ब्राह्मणी, रुद्राणी और कमला रानी के रूप में स्वीकार किया गया है, जो चौंसठ योगिनियों और भैरव के उल्लासमय नृत्य तथा मृदंग व डमरू की ध्वनि के बीच संपूर्ण सृष्टि का भरण-पोषण करती हैं। स्वर्ण थाल में कपूर और अगरबत्ती की लौ जलाकर जब यह स्तुति की जाती है, तो भक्त अपनी समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति और सुख-संपत्ति की प्राप्ति का विश्वास व्यक्त करते हैं।
नवरात्र में जपने योग्य चार प्रमुख दुर्गा मंत्र
आरती गायन के अलावा देवी की कृपा शीघ्र प्राप्त करने के लिए शास्त्रों में मंत्र जप को अत्यंत फलदायी बताया गया है। साधक अपनी दैनिक पूजा में इन प्रमुख मंत्रों का नियमित पाठ कर सकते हैं
- दुर्गा बीज मंत्र: मां के सूक्ष्म स्वरूप से जुड़ने के लिए ॐ दुं दुर्गायै नमः का जप किया जाता है। यह मंत्र समस्त नकारात्मक ऊर्जा का नाश करने में सहायक माना गया है।
- दुर्गा नवार्ण मंत्र: नौ शक्तियों का समन्वित स्वरूप माना जाने वाला नवार्ण मंत्र ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे है, जिसे नवरात्र साधना का सबसे प्रभावशाली आधार माना जाता है।
- दुर्गा गायत्री मंत्र: बुद्धि, विवेक और आध्यात्मिक तेज के विस्तार के लिए ॐ गिरिजायै च विद्महे शिवप्रियायै च धीमहि। तन्नो दुर्गा प्रचोदयात् का जप किया जाता है।
- दुर्गा अष्टाक्षर मंत्र: जीवन के समस्त संकटों के निवारण के लिए आठ अक्षरों वाला ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः मंत्र अत्यंत कल्याणकारी माना गया है।
प्रथम दिन शैलपुत्री की विशेष स्तुति का विधान
नवरात्र के पहले दिन माता शैलपुत्री की उपासना की जाती है, जो वृषभ पर आरूढ़ होकर भक्तों को दर्शन देती हैं। पारंपरिक स्तुति में उन्हें भगवान शिव की प्रिय भवानी और पर्वतराज की पुत्री के रूप में याद किया गया है। मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु श्रद्धा भाव से शुद्ध घी का दीपक जलाकर, सूखे मेवे और नारियल की गरी का भोग अर्पित करते हुए उनकी वंदना करते हैं, उन्हें रिद्धि-सिद्धि और धन-धान्य की प्राप्ति होती है। सोमवार के दिन विशेष रूप से शिव परिवार के साथ मां की आरती उतारने से साधक की संपूर्ण मनोकामनाएं सिद्ध होती हैं और जीवन के सारे कष्ट मिट जाते हैं।


















