सनातन परंपरा में शक्ति साधना के लिए नवरात्रि की समयावधि सबसे फलदायी और पुण्यकारी मानी गई है। ऐसी मान्यता है कि इन नौ पावन दिनों में मां भगवती स्वयं भूलोक पर पधारकर अपने आराधकों की भक्ति भाव से की गई उपासना को स्वीकार करती हैं और उन पर अपनी असीम अनुकंपा बरसाती हैं। जगत जननी की नियमपूर्वक पूजा करने से साधक की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं तथा जीवन के बड़े से बड़े कष्ट स्वतः समाप्त हो जाते हैं। वर्ष 2026 में शारदीय नवरात्रि का महापर्व 11 अक्टूबर से प्रारंभ होकर 20 अक्टूबर तक चलेगा। इस अवसर पर विधिवत देवी स्तुति, मंत्र साधना और आरती का पाठ करना अनंत पुण्य प्रदान करता है।
संकट हरने वाली श्री दुर्गा स्तुति का महत्व व भावार्थ
नवरात्रि के दिनों में दुर्गा स्तुति का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से साधक के अंतर्मन को शांति मिलती है और दैहिक, दैविक तथा भौतिक तापों से मुक्ति मिलती है। इस स्तुति में मां दुर्गा को संपूर्ण सृष्टि की आद्य शक्ति और महिषासुर का वध करने वाली परम शक्ति के रूप में वंदित किया गया है। वे ही उमा, रमा, गौरी और ब्रह्माणी के रूपों में तीनों लोकों को सुख और समृद्धि प्रदान करती हैं। महालक्ष्मी और महामाया के रूप में संपूर्ण ब्रह्मांड उन्हीं के स्वरूप में समाहित है। वे सत्व, रज और तम तीनों गुणों का संचालन करती हैं तथा भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों में संपूर्ण जगत में व्याप्त हैं।
स्तुति में स्पष्ट किया गया है कि भगवान विष्णु, शिव, ब्रह्मा और देवराज इंद्र सहित सभी देवता अपने कार्यों की सिद्धि और जगत के संचालन हेतु उन्हीं की शक्ति पर निर्भर हैं। नवरात्रि में पूजित होने वाले देवी के नौ रूपों शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि और महागौरी का स्मरण करते हुए संपूर्ण संसार उनकी शरण में नतमस्तक होता है। वे समस्त रिद्धि-सिद्धि की स्वामिनी हैं, अजन्मा, अनादि, त्रिनेत्रा और साक्षात विद्या स्वरूप हैं। अपने भक्तों पर सुख, यश और ऐश्वर्य की वर्षा करने वाली मां सिंहवाहिनी दुर्गति का नाश करती हैं, सांसारिक भय से तारती हैं और समस्त पापों का हरण कर जीवों को भवबंधन से मुक्त करती हैं।
साधना के प्रमुख दुर्गा मंत्र
पूजा अनुष्ठान के दौरान शुद्ध उच्चारण के साथ वैदिक व पौराणिक मंत्रों का जप करना अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है। इनमें प्रमुख रूप से दो श्लोक विशेष फलदायी हैं
- मंगलकारी श्लोक: सर्व मंगल मांगल्य शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते।। इस मंत्र के माध्यम से तीनों लोकों का कल्याण करने वाली, सभी मनोरथों को सिद्ध करने वाली और शरण देने वाली त्रिनेत्रा नारायणी को सादर नमन किया जाता है।
- शक्ति स्वरूपा मंत्र: या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। इसका भावार्थ है कि जो देवी समस्त प्राणियों में शक्ति रूप में विद्यमान हैं, उनको बारंबार प्रणाम है।
मां भगवती की आरती और उसकी महिमा
पूजा का समापन देवी की पावन आरती के साथ किया जाता है। प्रसिद्ध आरती 'जय अम्बे गौरी' में मां जगदंबा के अलौकिक स्वरूप और उनकी लीलाओं का विशद वर्णन मिलता है। उनके मस्तक पर सिंदूर और कस्तूरी का तिलक सुशोभित है, उनके दोनों नेत्र उज्ज्वल हैं और मुख चंद्र समान आभा बिखेरता है। स्वर्ण के समान कांतिमान शरीर पर रक्त वस्त्र और गले में लाल पुष्पों की माला शोभित होती है।
सिंह की सवारी करने वाली मां अपने हाथों में खड्ग और खप्पर धारण कर साधकों के दुख दूर करती हैं। उनके कानों में कुंडल और नासिका पर मोती चमकता है, तथा उनकी दिव्य ज्योति करोड़ों सूर्य और चंद्रमा के समान देदीप्यमान है। उन्होंने शुंभ, निशुंभ, महिषासुर, चंड, मुंड, रक्तबीज, मधु और कैटभ जैसे असुरों का संहार करके देवों को भयमुक्त किया। ब्रह्माणी, रुद्राणी और कमला स्वरूपिणी मां शिव की पटरानी हैं। चौंसठ योगिनियां मंगल गान करती हैं और भैरव नृत्य करते हैं। स्वामी शिवानंद कहते हैं कि जो भी व्यक्ति स्वर्ण थाल में कपूर की ज्योति प्रज्वलित कर भक्ति भाव से इस आरती का गायन करता है, उसे अखंड सुख और संपत्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है।



















