नवरात्र उत्सव की शुरुआत प्रथम दिवस पर देवी शैलपुत्री की विधिवत आराधना के साथ संपन्न होती है। मां दुर्गा के नौ विशिष्ट स्वरूपों में शैलपुत्री का स्थान अत्यंत पावन और प्रमुख माना गया है, जिसके चलते नौ दिवसीय अनुष्ठान के पहले दिन भक्तगण पूरी आस्था से उनका ध्यान करते हैं। देवी का वाहन वृषभ यानी बैल होने के कारण उन्हें शास्त्रों में वृषारूढ़ा कहकर भी पुकारा जाता है। प्रतिमा और स्वरूप वर्णन में मां शैलपुत्री की दो भुजाएं दिखाई देती हैं। उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल विराजित रहता है, जबकि बाएं करकमल में खिला हुआ कमल पुष्प सुशोभित होता है। यह पावन रूप भक्तों को शांति और शक्ति का संदेश देता है। आध्यात्मिक परंपरा में उन्हें देवी हेमवती तथा देवी पार्वती के पावन नाम से भी संबोधित किया जाता है।
सती का स्वाभिमान और प्रजापति दक्ष का यज्ञ
मां शैलपुत्री के अवतरण की पृष्ठभूमि देवी सती के आत्मोत्सर्ग से जुड़ी हुई है। प्राचीन आख्यानों के मुताबिक, सती प्रजापति दक्ष की कन्या थीं और उन्होंने अपने पिता के विरोध के बावजूद भगवान शिव को पति रूप में वरण किया था। एक कालखंड में प्रजापति दक्ष ने एक अत्यंत विशाल यज्ञ का आयोजन कराया। इस महायज्ञ में भाग लेने के लिए ब्रह्मांड के समस्त देवी-देवताओं को विधिवत न्योता भेजा गया, किंतु दक्ष ने जानबूझकर भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया। जब सती को इस उत्सव की जानकारी मिली, तो भगवान शिव ने उन्हें समझाते हुए कहा कि जहां सभी देवताओं का समादर हो रहा हो लेकिन हमें न बुलाया गया हो, वहां बिना निमंत्रण जाना उचित और सम्मानजनक नहीं होता। इसके उपरांत भी देवी सती अपने मायके में आयोजित उस यज्ञ समारोह में सम्मिलित होने की इच्छा पर अटल रहीं।
अपमान की अग्नि और शक्तिपीठों का निर्माण
पिता के भवन पहुंचने पर देवी सती का स्वागत केवल उनकी माता ने प्रेमपूर्वक किया। इसके विपरीत उनकी बहनों ने उनका परिहास उड़ाया और व्यंग्य भरे वचनों से भगवान शिव का घोर अनादर किया। स्वयं प्रजापति दक्ष ने भी सबके समक्ष भगवान शिव के विरुद्ध अत्यंत कटु और अपमानजनक बातें कहीं। पति के प्रति इस तिरस्कार को देवी सती लेशमात्र भी सहन न कर सकीं। असहनीय क्षोभ और दुख में डूबकर उन्होंने योगाग्नि का आह्वान किया और उसी दिव्य ज्वाला में भस्म होकर अपनी देह त्याग दी। सती के देहावसान का समाचार मिलते ही भगवान शंकर अत्यंत व्यथित और क्रुद्ध हो उठे। उन्होंने दक्ष के उस यज्ञ का पूर्ण विध्वंस कर दिया और सती के पार्थिव शरीर को अपने कंधों पर उठाकर संपूर्ण ब्रह्मांड में विलाप करते हुए विचरण करने लगे।
हिमालय के घर अवतरण और शैलपुत्री नामकरण
संसार को शिव के प्रलयंकारी शोक से मुक्त करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र का संधान किया। चक्र के प्रभाव से सती के नश्वर शरीर के 51 अंग अलग-अलग स्थानों पर गिरे, जो आगे चलकर पृथ्वी पर पवित्र शक्तिपीठों के नाम से प्रसिद्ध हुए। इस देहत्याग के पश्चात, सती ने अपने अगले जन्म में गिरिराज शैलराज हिमालय के प्रांगण में पुत्री के रूप में पुनर्जन्म लिया। संस्कृत भाषा में शैल शब्द पर्वत अथवा शिला का बोध कराता है, जिसके कारण पर्वतराज की कन्या होने के नाते वे शैलपुत्री कहलाईं। इस पावन रूप में देवी ने पुनः तपस्या की और जगत को कल्याण का आशीष प्रदान किया।



















