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अंटार्कटिका में मिली रहस्यमयी हड्डी ने खोला करोड़ों साल पुराना डायनासोर राज़विज्ञान
2 जुल॰ 2026, 4:32 pm (72 दिन पहले)· 3

अंटार्कटिका में मिली रहस्यमयी हड्डी ने खोला करोड़ों साल पुराना डायनासोर राज़

1985 में अंटार्कटिका के जेम्स रॉस द्वीप पर मिला एक हड्डी का टुकड़ा 40 साल तक अलमारी में पड़ा रहा, अब पता चला कि यह करीब 23 फीट लंबे टाइटानोसॉर डायनासोर की पूंछ की हड्डी है।

कई बार हमारे हाथ में कोई पुरानी और मामूली सी दिखने वाली चीज आ जाती है, जिसे हम बिना सोचे-समझे रख देते हैं। ठीक ऐसा ही एक पत्थरनुमा टुकड़े के साथ हुआ, जिसे शुरुआत में एक सामान्य हड्डी का टुकड़ा समझकर अलमारी में डाल दिया गया था। इस टुकड़े की असली पहचान सामने आने में पूरे 40 साल लग गए, जब एक दूसरे वैज्ञानिक की नजर इस पर पड़ी और पूरी कहानी ही बदल गई।

जेम्स रॉस द्वीप पर 1985 में मिला था अजीब टुकड़ा

यह कहानी साल 1985 से शुरू होती है, जब ब्रिटिश एंटार्कटिक सर्वे के भूवैज्ञानिक माइक थॉमसन जेम्स रॉस द्वीप पर चट्टानों की स्टडी कर रहे थे। वे उस समय समुद्री सरीसृपों के जीवाश्म खोज रहे थे, तभी उनके हाथ एक अजीब सा टुकड़ा लगा। माइक थॉमसन ने इसे सिर्फ एक बड़े सरीसृप की हड्डी मानकर रिकॉर्ड में दर्ज कर दिया और आगे बढ़ गए। उस वक्त किसी को अंदाजा नहीं था कि यह टुकड़ा असल में एक टाइटानोसॉर, यानी लंबी गर्दन वाले शाकाहारी डायनासोर की पूंछ की हड्डी है।

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दशकों बाद पैलियंटोलॉजिस्ट की नजर ने बदली कहानी

यह टुकड़ा बरसों तक ब्रिटिश एंटार्कटिक सर्वे के संग्रह में यूं ही पड़ा रहा। इसके बाद पैलियंटोलॉजिस्ट मार्क इवांस की नजर इस हड्डी पर पड़ी। हड्डी को देखते ही उन्हें शक हुआ कि यह किसी डायनासोर की हो सकती है। इसके बाद गहन जांच शुरू हुई, हड्डी के आकार की दूसरे जीवाश्मों से तुलना की गई और विशेषज्ञों की एक पूरी टीम ने मिलकर इस पर काम किया। आखिरकार यह पुष्टि हो गई कि यह टुकड़ा वाकई एक डायनासोर की हड्डी है। यह खोज सोमवार को साइंस जर्नल Acta Palaeontologica Polonica में प्रकाशित हुई।

कभी बर्फ नहीं, घने जंगलों से भरा था अंटार्कटिका

आज अंटार्कटिका बर्फ का विशाल रेगिस्तान नजर आता है, लेकिन 7 से 8 करोड़ साल पहले यहां का नजारा बिल्कुल अलग था। उस दौर में यहां घने जंगल हुआ करते थे, नदियां बहती थीं और मौसम आज की तुलना में काफी गर्म था। यही वजह है कि यह खोज सिर्फ एक हड्डी भर नहीं, बल्कि अंटार्कटिका के प्राचीन जंगलों, बदलते मौसम और धरती के इतिहास की जीती-जागती गवाही मानी जा रही है। अब तक डायनासोरों के जंगलों में रहने की बातें ज्यादा होती रही हैं, लेकिन इस खोज ने साबित कर दिया कि ये विशाल जीव बर्फीले इलाकों में भी घूमा करते थे।

23 फीट लंबा था वो टाइटानोसॉर

लंदन के नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम के पॉल बैरेट ने बताया कि जिस टाइटानोसॉर की यह हड्डी है, वह करीब 23 फीट लंबा रहा होगा। वैज्ञानिकों का मानना है कि उसकी मौत के बाद उसका शव समुद्र तट से बहते हुए समुद्र तल तक पहुंच गया और वहां मौजूद मरीन चट्टान में दबकर जीवाश्म में बदल गया। यही वजह है कि यह हड्डी दशकों तक जमीन के भीतर सुरक्षित बनी रही और आखिरकार वैज्ञानिकों के हाथ लगी।

पुरानी तकनीक की सीमा, नई तकनीक की ताकत

साल 1985 में इतनी उन्नत तकनीक मौजूद नहीं थी कि हड्डी के भीतर झांककर उसकी असली पहचान की जा सके, इसी वजह से माइक थॉमसन इसे पहचान नहीं पाए थे। लेकिन आज वैज्ञानिकों के पास ऐसे उपकरण मौजूद हैं, जिनसे वे हड्डियों के भीतर तक की बनावट देख सकते हैं। इसी आधुनिक तकनीक की मदद से इस साधारण दिखने वाली हड्डी ने अपनी असली कहानी बता दी और अंटार्कटिका से जुड़ी एक बड़ी वैज्ञानिक खोज दुनिया के सामने आ गई। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि आने वाले समय में इस तरह की और खोजें होंगी, जो यह बताएंगी कि हमारी पृथ्वी अब तक कितनी बार अपना रूप बदल चुकी है।

सवाल-जवाब

यह हड्डी सबसे पहले कब मिली थी?
यह हड्डी साल 1985 में ब्रिटिश एंटार्कटिक सर्वे के भूवैज्ञानिक माइक थॉमसन को जेम्स रॉस द्वीप पर मिली थी।
यह हड्डी किस जानवर की है?
जांच में पता चला कि यह एक टाइटानोसॉर, यानी लंबी गर्दन वाले शाकाहारी डायनासोर की पूंछ की हड्डी है।
इस हड्डी की असली पहचान किसने की?
पैलियंटोलॉजिस्ट मार्क इवांस ने ब्रिटिश एंटार्कटिक सर्वे के संग्रह में इस हड्डी को देखा और शक होने पर गहन जांच शुरू करवाई।
यह खोज कहां प्रकाशित हुई?
यह खोज सोमवार को साइंस जर्नल Acta Palaeontologica Polonica में प्रकाशित हुई।
यह टाइटानोसॉर कितना लंबा था?
लंदन के नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम के पॉल बैरेट के मुताबिक, यह टाइटानोसॉर करीब 23 फीट लंबा था।
क्या अंटार्कटिका हमेशा से बर्फीला रहा है?
नहीं, 7 से 8 करोड़ साल पहले अंटार्कटिका में घने जंगल थे, नदियां बहती थीं और मौसम काफी गर्म था।
40 साल तक इस हड्डी की सही पहचान क्यों नहीं हो पाई?
1985 में इतनी उन्नत तकनीक मौजूद नहीं थी कि हड्डी के भीतर झांककर उसकी सही पहचान की जा सके, इसलिए इसे शुरू में सामान्य सरीसृप की हड्डी मान लिया गया था।
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