डिजिटल दुनिया में गोपनीयता और सुरक्षा पर लगातार चौतरफा दबाव बढ़ता जा रहा है, क्योंकि दुनिया भर के लोकतांत्रिक देश ऐसे कानून बना रहे हैं जो एन्क्रिप्शन को कमजोर करते हैं और डेटा संग्रह को बढ़ाते हैं। कैनेडा में एक ऐसा ही नया विधायी प्रस्ताव सामने आया है जिसके बाद तकनीकी और प्राइवेसी के क्षेत्र से जुड़े दिग्गजों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। इस प्रस्तावित बदलाव के बाद कैनेडा की एंटी-सेंसरशिप कंपनी साइफन वीपीएन ने चेतावनी दी है कि यदि यह बिल पास होता है, तो वह देश छोड़कर चली जाएगी।
कनाडा के सी-22 बिल पर क्यों मचा है बवाल
साइफन वीपीएन अकेले ऐसी कंपनी नहीं है जो इस कदम का विरोध कर रही है। एन्क्रिप्शन मैसेजिंग ऐप सिग्नल ने भी साफ कर दिया है कि वह कैनेडियन बाजार से बाहर हो जाएगी, क्योंकि इस नए कानून के तहत उसे अपने ओपन सोर्स प्रोजेक्ट्स में ऐसे बदलाव करने होंगे जो स्वीकार्य नहीं हैं। इसके अलावा ऐपल और मेटा जैसी दिग्गज कंपनियों ने भी इस बिल की कड़ी आलोचना की है। डकडकगो और नॉर्डवीपीएन जैसी सेवाएं भी इस बात पर विचार कर रही हैं कि यदि कानून लागू होता है तो वे अपनी सेवाएं कैनेडा में बंद कर सकती हैं।
यह पूरा विवाद कैनेडा के सी-22 बिल से जुड़ा है जिसे पहली बार 2025 में प्रस्तावित किया गया था। टेक कंपनियों और सिविल सोसायटी के विरोध के बाद इसमें कुछ संशोधन भी किए गए, लेकिन इसका मूल प्रभाव वही है। यह बिल तकनीकी कंपनियों पर यह दबाव डालता है, भले ही वे कैनेडा से बाहर की क्यों न हों, कि वे ऐसी तकनीकी क्षमताएं विकसित करें जिससे कानून प्रवर्तन एजेंसियों को डेटा तक पहुंच मिल सके। कई अन्य सुरक्षा बिलों की तरह सी-22 भी यह दावा करता है कि कंपनियों को अपने सिस्टम में कोई प्रणालीगत कमजोरी लाने की आवश्यकता नहीं होगी।
हालांकि, इस कानून का विरोध करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन तक पहुंचने का कोई भी तरीका अनिवार्य रूप से एक बैकडोर ही साबित होता है। इस तरह के बैकडोर को कोई भी खोज सकता है और उसका दुरुपयोग कर सकता है। आज के समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल्स की मदद से रिवर्स इंजीनियरिंग और सिस्टम मैपिंग करना बेहद आसान हो गया है, जिससे यह खतरा और भी ज्यादा बढ़ जाता है। अमेरिकी हाउस ज्यूडीशियरी और फॉरेन अफेयर्स कमेटी के सदस्यों ने मई में कैनेडियन अधिकारियों को भेजे गए एक पत्र में इस बात पर चिंता जताई थी कि कंपनियों को कमजोरियां पैदा करने और एन्क्रिप्शन को बायपास करने के लिए कहा जा सकता है।
मेटाडेटा स्टोरेज और वैश्विक प्रभाव की चिंताएं
एन्क्रिप्शन में सेंध लगाने के अलावा, सी-22 बिल में ऐसे प्रावधान भी शामिल हैं जो कंपनियों को यूजर की गतिविधियों से जुड़ा मेटाडेटा अपने पास सुरक्षित रखने के लिए बाध्य कर सकते हैं। साइफन और डकडकगो जैसी कई प्राइवेसी-केंद्रित सेवाएं जानबूझकर ऐसा डेटा नहीं रखती हैं। यदि कानून बनता है तो इन कंपनियों को अपने बिजनेस मॉडल में बदलाव करना होगा और ऐसा डेटा इकट्ठा करना होगा जिसे वे न तो देखना चाहती हैं और न ही जिनकी उन्हें कोई जरूरत है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि इस तरह के उत्पाद बदलावों से उपयोगकर्ताओं का भरोसा कम होगा और व्यापक स्तर पर निगरानी का खतरा बढ़ जाएगा। डी-सेंटर की संस्थापक अफसानेह रीगोट का कहना है कि जब आप इस तरह के बुनियादी ढांचे में बदलाव की मांग करते हैं, जिससे मेटाडेटा डिफ़ॉल्ट रूप से स्टोर होने लगे, तो यह एक ऐसे टूल के भीतर निगरानी की क्षमता पैदा कर देता है जिसमें पहले ऐसी कोई सुविधा नहीं थी। ईरान और दुनिया भर के अन्य देशों में इसका सीधा असर देखने को मिलेगा क्योंकि ऐसे कानून अक्सर एक देश से दूसरे देश में कॉपी-पेस्ट किए जाते हैं।
ग्लोबल सर्विलांस और सुरक्षित ठिकानों की तलाश
यह समस्या सिर्फ कैनेडा तक सीमित नहीं है। हाल के वर्षों में यूनाइटेड किंगडम और ऑस्ट्रेलिया ने भी व्यापक निगरानी सुधार लागू किए हैं जो कंपनियों को अपने एन्क्रिप्शन को तोड़ने के लिए मजबूर कर सकते हैं। इसके अलावा यूरोपीय संघ, फ्रांस, भारत, आयरलैंड, स्पेन, स्वीडन, स्विट्जरलैंड और अन्य देशों में भी एन्क्रिप्शन को खतरे में डालने वाले प्रस्ताव सामने आ चुके हैं। हालांकि हर उपाय कानून नहीं बन पाया है, लेकिन सरकारों का रुख पूरी तरह साफ है।
यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो के सिटीजन लैब की सीनियर रिसर्च एसोसिएट केट रॉबर्टसन का कहना है कि कुछ एजेंसियों के अधिकारियों का रवैया तकनीक को हमेशा एक अपराध स्थल के रूप में देखने का रहा है। वे इसी संकीर्ण सोच में रहते हैं कि उन्हें हर हाल में डेटा तक पहुंच चाहिए। लेकिन इस तरह की संकीर्ण सोच यह भूल जाती है कि तकनीक को अस्पतालों, बैंकों, राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों और खुद पुलिस सेवाओं के लिए एक सुरक्षित ऑपरेटिंग प्लेटफॉर्म होना चाहिए ताकि वे नागरिकों की निजी जानकारी की रक्षा कर सकें।
जैसे-जैसे दुनिया भर के देश ऐसे कानूनों पर विचार कर रहे हैं, प्राइवेसी और एंटी-सेंसरशिप टूल्स पर काम करने वाले डेवलपर्स सुरक्षित न्यायक्षेत्रों की तलाश में जुटे हैं। लेकिन इससे दुनिया भर के यूजर्स तक सुरक्षित तरीके से पहुंचने की समस्या का समाधान नहीं होता है। इंटरनेट सोसाइटी के सिक्योरिटी पोर्टफोलियो लीड जोसेफ लोरेंजो-हॉल का कहना है कि मुख्यालय बदलना कोई ठोस योजना नहीं है जब कानून आपके यूजर्स का पीछा करता है। असली सुरक्षा कम से कम डेटा रखना है, लेकिन यदि सरकारें आपको डेटा इकट्ठा करने के लिए मजबूर कर सकती हैं तो यह तर्क काम नहीं आएगा।



















