दूसरे विश्व युद्ध की विभीषिका थमने के बाद जब एशिया के अनेक देश औपनिवेशिक चंगुल से मुक्त होकर संप्रभुता हासिल कर रहे थे, तब एक नए और एकजुट महाद्वीप की पहचान गढ़ने की तीव्र छटपटाहट चारों ओर महसूस की जा रही थी। वैश्विक खेल परिदृश्य में ओलंपिक के बाद दूसरा सबसे विशाल बहु-खेल महाकुंभ माना जाने वाला एशियन गेम्स केवल पदकों की होड़ के लिए नहीं उपजा था, बल्कि इसका उद्देश्य महाद्वीप के नवोदित मुल्कों को आपसी बंधुत्व के मजबूत धागे में पिरोना था। सन 1951 में देश की राजधानी दिल्ली की धरती पर आयोजित हुए पहले एशियाई खेल केवल एक पारंपरिक खेल प्रतियोगिता भर नहीं थे, बल्कि वह आजाद भारत की अंतरराष्ट्रीय रंगमंच पर एक मुखर, समर्थ और आत्मविश्वासी राष्ट्र के रूप में पहली सशक्त उपस्थिति थी।
नए महाद्वीप की साझा आकांक्षा और भारतीय संकल्प
उपनिवेशवाद से मुक्ति की प्रक्रिया ने एशियाई देशों के सामने अपने साझा भविष्य को सुरक्षित और संगठित करने का अभूतपूर्व अवसर प्रस्तुत किया। इस ऐतिहासिक मोड़ पर खेल जगत के दूरदर्शी भारतीय प्रशासक जब एशियन गेम्स फेडरेशन के गठन और वर्ष 1951 के आयोजन की रूपरेखा बना रहे थे, तो उनके दिलो-दिमाग में केवल खेल के नियम नहीं थे। उनके सामने नवजात, स्वतंत्र और स्वाभिमानी भारत की एक विराट कल्पना सांस ले रही थी। भारत का स्पष्ट उद्देश्य था कि संपूर्ण विश्व नवनिर्मित राष्ट्र की संगठनात्मक क्षमता और उसके अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण को खुली आंखों से देखे।
ओलंपिक के समानांतर खड़े होने योग्य एक अंतरराष्ट्रीय आयोजन की रचना करना इस राष्ट्रीय आकांक्षा को साकार करने का सबसे उपयुक्त माध्यम सिद्ध हो सकता था। खेल को नवोदित एशियाई देशों के पारस्परिक सौहार्द, शांति और एकता का सबसे प्रामाणिक वाहक माना गया। वर्ष 1951 के आयोजन की आयोजन समिति के प्रमुख स्तंभ एंथनी डी मेलो ने बाद में 1959 में इस अविस्मरणीय दिन को स्मरण करते हुए स्पष्ट लिखा था कि भारतीय खेलों के इतिहास में इससे भव्य और गौरवशाली क्षण कभी दर्ज नहीं हुआ। उनके अनुसार 4 मार्च 1951 का दिवस केवल भारतीय खेल जगत ही नहीं, अपितु समूचे एशिया और अंतरराष्ट्रीय खेल मानचित्र के लिए युगांतरकारी था, क्योंकि इसी दिन प्रथम एशियाई खेलों का औपचारिक शुभारंभ हुआ था।
1947 का वह सम्मेलन जहां बोए गए थे एकता के बीज
इस ऐतिहासिक महाआयोजन का सूत्रपात 1951 में अचानक नहीं हुआ था, बल्कि इसकी मजबूत आधारशिला स्वतंत्रता से कुछ महीने पहले वर्ष 1947 में दिल्ली में आयोजित एशियन रिलेशंस कॉन्फ्रेंस के दौरान रखी गई थी। इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स द्वारा संयोजित इस महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में 21 देशों के प्रबुद्ध प्रतिनिधियों ने भागीदारी की थी। इस कूटनीतिक और सांस्कृतिक महामंथन के मंच पर खेल प्रशासक जी.डी. सोंधी ने सर्वप्रथम एशियन गेम्स फेडरेशन की स्थापना का औपचारिक प्रस्ताव रखा था।
जी.डी. सोंधी पूर्व में वेस्टर्न एशियाटिक गेम्स के सफल प्रबंधन से जुड़े रहे थे और उनका सपना था कि संपूर्ण एशिया के खिलाड़ी एक एकीकृत मंच पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करें। सम्मेलन में उनके इस विचार को सैद्धांतिक सहमति तो मिल गई, लेकिन विचार को वास्तविक जमीन पर क्रियान्वित करना चुनौतियों से भरा था। प्रशासनिक अड़चनों और संसाधनों की कमी के बावजूद सोंधी ने अपने प्रयास मंद नहीं पड़ने दिए और निरंतर एशियाई देशों के संपर्क में बने रहे।
लंदन के होटल से दिल्ली के अंतिम प्रारूप तक का सफर
वर्ष 1948 में लंदन ओलंपिक के अवसर पर जी.डी. सोंधी ने अपने अभियान को निर्णायक मोड़ दिया। उन्होंने 8 अगस्त को लंदन के माउंट रॉयल होटल में उपस्थित एशियाई देशों के खेल प्रतिनिधियों की एक विशेष बैठक आहूत की। इस महत्वपूर्ण सम्मेलन में कोरिया, चीन, फिलीपींस, बर्मा और सीलोन सहित कई एशियाई देशों के वरिष्ठ प्रतिनिधि सम्मिलित हुए। इसी ऐतिहासिक बैठक में सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि प्रथम एशियाई खेलों की मेजबानी का गौरव दिल्ली को सौंपा जाएगा।
प्रारंभिक कार्ययोजना के तहत इन खेलों का आयोजन वर्ष 1950 में नियत किया गया था। हालांकि वर्ष 1949 में प्रस्तावित आमंत्रण एथलेटिक्स प्रतियोगिता प्रशासनिक कारणों से आयोजित नहीं हो सकी, लेकिन इससे इस महत्वाकांक्षी खेल महाकुंभ की गति अवरुद्ध नहीं हुई। इसके तत्काल बाद 12 और 13 फरवरी 1949 को दिल्ली में एक और निर्णायक सभा संपन्न हुई। इस बैठक में आठ देशों के आधिकारिक प्रतिनिधि एकत्रित हुए, जहां गहन विचार-विमर्श के पश्चात एशियन गेम्स फेडरेशन के संविधान और प्रशासनिक गठन को अंतिम रूप प्रदान किया गया।
नेशनल स्टेडियम में 30 हजार दर्शकों का ऐतिहासिक जनसैलाब
फरवरी 1949 के इस संस्थागत निर्णय के करीब दो वर्ष पश्चात दिल्ली ने इतिहास के पन्नों में अमर होने वाला दृश्य रचा। नवसृजित नेशनल स्टेडियम के भव्य प्रांगण में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने विधिवत रूप से पहले एशियन गेम्स का उद्घाटन किया। उस ऐतिहासिक पल के साक्षी बनने के लिए स्टेडियम में करीब 30 हजार दर्शक उमड़े थे। एक स्वतंत्र देश ने समूचे महाद्वीप को अपनी मेजबानी का लोहा मनवाते हुए अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजन के वैश्विक केंद्र के रूप में अपनी अमिट छाप छोड़ी।
इस प्रथम संस्करण में चीन की औपचारिक खेल टीम ने प्रतिस्पर्धा में हिस्सा नहीं लिया था। इसके बावजूद इतिहास के एक अत्यंत रोचक घटनाक्रम के तहत चीन की पीपुल्स रिपब्लिक ने सद्भावना दूत के रूप में 10 विशेष पर्यवेक्षकों का एक दल दिल्ली भेजा था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय धरा पर कदम रखने वाले ये चीन के प्रथम आधिकारिक प्रतिनिधि थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इन चीनी प्रतिनिधियों का आत्मीय स्वागत करते हुए उन्हें अपने सरकारी आवास पर विशेष नाश्ते के लिए आमंत्रित किया था।
दिल्ली की विरासत से नागोया के अगले क्षितिज तक
वर्ष 1951 में दिल्ली के मैदानों से आरंभ हुई एशियाई खेलों की यह अविश्वसनीय विकास यात्रा आज संसार की दूसरी सबसे वृहद खेल प्रतियोगिता का स्वरूप ग्रहण कर चुकी है। प्रत्येक चार वर्ष के अंतराल पर आयोजित होने वाले इस विराट उत्सव में एशिया के विभिन्न देशों से आए सैकड़ों और हजारों खिलाड़ी अपने राष्ट्रीय गौरव और तिरंगे का मान बढ़ाने के लिए उतरते हैं। इस आधुनिक वैश्विक मंच की गहरी नींव 1951 के उस भारत में गड़ी है, जिसने खेल को मात्र पदक तालिका और प्रतिस्पर्धा तक सीमित न रखकर बदलते हुए एशिया को एक सूत्र में बांधने वाली सांस्कृतिक शक्ति के रूप में देखा था।
वर्तमान दौर में जब एशियन गेम्स की इस भव्य ऐतिहासिक गाथा का आगामी अध्याय नागोया में संयोजित किया जा रहा है, तो यह केवल एक नियमित प्रतियोगिता का आयोजन नहीं है। यह उस विराट महायात्रा का आधुनिक पड़ाव है जिसकी गौरवमयी मशाल 75 वर्ष से भी अधिक समय पूर्व दिल्ली के नवनिर्मित स्टेडियम में जलाई गई थी। संपूर्ण महाद्वीप को यह दृढ़ विश्वास है कि नागोया इस अनुपम ऐतिहासिक विरासत में एक और स्वर्णिम तथा प्रेरणादायी अध्याय जोड़ेगा।



















