छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में कृषि के पारंपरिक तौर-तरीकों में एक नया और आर्थिक रूप से लाभकारी बदलाव देखने को मिल रहा है। मानसून के मौसम में जहां ज्यादातर किसान धान और पारंपरिक फसलों तक सीमित रहते थे, वहीं अब बस्तर के कई किसान सब्जियों के साथ-साथ गेंदे के फूलों की व्यावसायिक खेती की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। बारिश के दिनों में धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-पाठ और तीज-त्योहारों के कारण बाजार में फूलों की मांग काफी बढ़ जाती है, जिससे किसानों को अपनी उपज का बेहद अच्छा दाम मिल रहा है।
फूलों की खेती की तकनीक और वैज्ञानिक प्रबंधन
गेंदे की खेती अन्य पारंपरिक फसलों की तुलना में काफी आसान और कम देखभाल वाली मानी जाती है। बस्तर के स्थानीय किसान मिलेश पटेल ने अपनी 20 से 25 डिसमिल जमीन पर इस खेती का सफल प्रयोग किया है। उन्होंने खेत की अच्छी तरह जुताई कराकर मिट्टी को भुरभुरा बनाया और फिर व्यवस्थित तरीके से बेड तैयार किए। पौधों के बेहतर विकास के लिए दो बेड के बीच 3 मीटर की दूरी और पौधे से पौधे के बीच 15 सेंटीमीटर का फासला रखा गया है। मिलेश ने इस खेती के लिए कोलकाता से खास कलकत्ता गेंदे की किस्म के बीज मंगाकर पौधे तैयार किए हैं, जो बाजार में काफी लोकप्रिय और मांग में रहने वाला फूल है।
लागत, फसल चक्र और कीट नियंत्रण
गेंदे की यह फसल कुल तीन से चार महीने के चक्र की होती है। रोपाई के लगभग दो महीने बाद ही पौधों में फूल आने शुरू हो जाते हैं। मिट्टी की उर्वरता और पौधों के बेहतर पोषण के लिए खेत में गोबर की खाद के साथ पोटाश और डीएपी का उपयोग किया जाता है। यद्यपि गेंदे में बीमारियों का प्रकोप अन्य फसलों के मुकाबले बहुत कम रहता है, फिर भी पत्ती छेदक और तना छेदक जैसे कीटों की आशंका बनी रहती है जो तने को नुकसान पहुंचा सकते हैं। समय रहते सही देखरेख करने से फसल सुरक्षित रहती है और किसान को बेहतर उत्पादन हासिल होता है।
3 हजार की लागत से 25 हजार रुपये तक का मुनाफा
गेंदे की खेती का सबसे आकर्षक पहलू इसका कम लागत में अधिक रिटर्न देना है। मिलेश पटेल के अनुसार, 20 से 25 डिसमिल जमीन में गेंदे की खेती की तैयारी से लेकर पौधे लगाने तक में लगभग 3 हजार रुपये का कुल खर्च आया है। वर्तमान में यदि बाजार में गेंदे के फूल का भाव 150 रुपये प्रति किलो तक रहता है, तो इस छोटे से भूखंड से किसान 15 हजार रुपये से लेकर 25 हजार रुपये तक का शुद्ध मुनाफा आसानी से कमा सकते हैं। कम समय और कम लागत में मिलने वाला यह आर्थिक लाभ बस्तर के अन्य किसानों को भी फूलों की खेती की ओर प्रेरित कर रहा है।



















