दुनिया के तमाम रिश्तों के बीच मां और संतान का बंधन सबसे अलग और पवित्र माना जाता है। एक मां अपनी संतान की रक्षा के लिए हर संकट से टकरा जाती है, तो वहीं एक बेटा भी अपनी जननी की सांसों को बचाने के लिए पूरी कायनात से लड़ने का जज्बा रखता है। इन दिनों सोशल मीडिया पर एक ऐसी ही हृदयविदारक और आत्मीय कहानी हर किसी की आंखें नम कर रही है, जहां एक युवा का अपनी मां के प्रति समर्पण आधुनिक दौर में एक अनोखी मिसाल बन गया है।
प्रभु के दरबार में लगाई गई गुहार
जब जिंदगी के तमाम दरवाजे बंद नजर आने लगते हैं, तब केवल सच्ची आस्था और मां का असीम स्नेह ही इंसान को भीतर से मजबूत बनाता है। बिहार के रहने वाले 19 साल के मोनू मेटुरबाला के जीवन में भी एक ऐसा ही दौर आया था। जब उनकी मां एक गंभीर बीमारी की चपेट में आकर अस्पताल के बिस्तर पर जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रही थीं, तब इस युवा के पास आंसुओं और प्रार्थनाओं के अलावा कुछ नहीं बचा था। मां की तकलीफ को देखकर उस बेटे का कलेजा कांप उठा। उसने भगवान शिव के समक्ष अपनी प्रार्थना रखते हुए प्रण लिया कि यदि उनकी जननी स्वस्थ हो जाती है, तो वह बिना किसी वाहन के अपने पैरों पर चलकर देश के सभी 12 ज्योतिर्लिंगों और 4 धामों की यात्रा करेंगे।
संकल्प की शुरुआत और 15 मार्च का दिन
ऐसी मान्यता है कि यदि दिल से मांगी गई दुआ सच्ची हो, तो ईश्वर भी अपने भक्तों की पुकार सुन लेते हैं। कुछ ऐसा ही चमत्कार हुआ और मोनू की मां धीरे-धीरे पूरी तरह स्वस्थ होकर अपने पैरों पर खड़ी हो गईं। मां के चेहरे पर दोबारा मुस्कान लौटते ही बेटे ने अपनी उस कठिन प्रतिज्ञा को बिना एक पल गंवाए पूरा करने की ठान ली। उन्होंने 15 मार्च से अपने घर की दहलीज से इस ऐतिहासिक सफर की शुरुआत कर दी। इस यात्रा के दौरान उनके पास न तो कोई जेब खर्च था, न खाने-पीने का सामान और न ही किसी प्रकार की सुख-सुविधा। उनके पास केवल मां के स्वस्थ होने का असीम आनंद और उनके प्रति मन में भरी अटूट कृतज्ञता थी। इस अद्भुत सफर के बारे में रमेश स्पीक्स द्वारा एक्स पर लिखा गया कि बिहार का एक समर्पित युवा इस दौर में सच्ची भक्ति की नई परिभाषा लिख रहा है।
नंगे पांव और माथे पर तिलक के साथ आगे बढ़ता कदम
मोनू इन दिनों सड़कों पर बिना शर्ट के, गले में माला पहने, माथे पर तिलक लगाए और होठों पर भगवान का नाम जपते हुए लगातार दौड़ रहे हैं। वह हर रोज लगभग 40 से 50 किलोमीटर की दूरी दौड़कर तय करते हैं। अब तक वह कुल 8,000 किलोमीटर का यह कठिन सफर पूरा कर चुके हैं और देश के 5 प्रमुख ज्योतिर्लिंगों के द्वार पर पहुंचकर माथा भी टेक चुके हैं। रास्ते में जो भी व्यक्ति इस युवा को देखता है, उसकी आंखें भावुक हो जाती हैं। लोग न केवल उनके भोजन और पानी का प्रबंध कर रहे हैं, बल्कि उन पर फूल बरसाकर आज के दौर के श्रवण कुमार को नमन भी कर रहे हैं।
मां के प्रति प्रेम का कभी न चुकने वाला कर्ज
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में जहां लोग छोटी-छोटी दूरियों और आपसी मनमुटाव के चलते अपनों से कट जाते हैं, वहीं मोनू की यह लंबी दौड़ हमें यह सिखाती है कि मां के ऋण को कभी पूरी तरह चुकाया नहीं जा सकता है। हालांकि उनके प्रति हमारा प्रेम और सम्मान असीम जरूर हो सकता है। जब कभी इस युवा से उनकी इस कठिन यात्रा के विषय में चर्चा की जाती है, तो उनके चेहरे पर थकान का कोई भाव नजर नहीं आता। इसके उलट, उनकी आंखों में मां का वो मुस्कुराता हुआ चेहरा तैरने लगता है जो उन्हें हर पल आगे बढ़ने की शक्ति प्रदान करता है।





















