भारत की कमर्शियल स्पेस इंडस्ट्री में इन दिनों एक नाम चर्चा के केंद्र में है, और वह है नीरज खंडेलवाल का। राजस्थान के चौमूं कस्बे के एक साधारण बर्तन व्यापारी परिवार में पले-बढ़े नीरज ने जिस तरह से ग्लोबल स्पेस टेक सेक्टर में अपनी जगह बनाई है, वह आज के युवाओं के लिए एक मिसाल बन चुका है। बेंगलुरु स्थित एस्ट्रोबेस स्पेस टेक्नोलॉजीज के सह-संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी के तौर पर उन्होंने देश की तकनीकी क्षमताओं को एक नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है। उनके नेतृत्व में कंपनी ने 800 किलो न्यूटन की क्षमता वाला अत्याधुनिक फुल-फ्लो स्टेज्ड कंबशन एलओएक्स-मीथेन रॉकेट इंजन तैयार किया है, जिसे एवरेस्ट नाम दिया गया है। इस अभूतपूर्व सफलता की गूंज देश के सर्वोच्च स्तर तक पहुंची है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनके इस प्रयास की खुलकर सराहना की है।
चौमूं की गलियों से आईआईटी तक का सफर
नीरज का शुरुआती जीवन और पालन-पोषण बेहद साधारण माहौल में हुआ। उनके पिता अशोक खंडेलवाल चौमूं में बर्तनों का बिजनेस संभालते थे और उनकी स्कूली शिक्षा भी स्थानीय प्राइवेट स्कूल में ही पूरी हुई। हालांकि उनका परिवार व्यापार से जुड़ा था, लेकिन उनके इरादे और लक्ष्य काफी बड़े थे। विज्ञान और तकनीकी शिक्षा के प्रति गहरी रुचि उन्हें राजस्थान के एजुकेशन हब कोटा ले गई। वहां उन्होंने कड़ी मेहनत करते हुए इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा की तैयारी की और पहले ही प्रयास में शानदार सफलता हासिल करते हुए जेईई परीक्षा में ऑल इंडिया में 143वीं रैंक प्राप्त की, जो उनकी असाधारण प्रतिभा को साबित करती है।
विदेश की मोटी सैलरी को लात मारकर स्वदेश वापसी
कोटा के बाद उन्होंने आईआईटी मुंबई का रुख किया और वहां से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में अपनी स्नातक की डिग्री पूरी की। इस दौरान उनकी प्रतिभा को देखते हुए यूरोप की एक नामी कंपनी ने उन्हें 50 से 60 लाख रुपए सालाना के आकर्षक पैकेज पर जॉब ऑफर की। यह एक ऐसा मौका था जिसे ठुकराना किसी भी फ्रेश ग्रेजुएट के लिए बेहद मुश्किल होता, लेकिन नीरज के सपने कुछ और ही थे। उन्होंने विदेश जाकर नौकरी करने के बजाय अपनी मातृभूमि में ही कुछ नया करने का संकल्प लिया। कुछ समय तक अपने किसी परिचित की कंपनी में काम करने के बाद उन्होंने खुद के उद्यम की दुनिया में कदम रखने का फैसला किया।
क्रिप्टो सेक्टर से लेकर अंतरिक्ष अनुसंधान तक का रोमांचक सफर
साल 2018 में उन्होंने अपने एक साथी के साथ मिलकर कॉइनडीसीएक्स की स्थापना की। उनकी यह कंपनी देखते ही देखते देश के सबसे तेजी से बढ़ने वाले उद्यमों में शामिल हो गई, जो आज करीब 800 लोगों को रोजगार मुहैया कराती है और जिसका कुल टर्नओवर लगभग 25 हजार करोड़ रुपए आंका जाता है। इतनी बड़ी आर्थिक सफलता हासिल करने के बावजूद उनका मन नहीं भरा क्योंकि वे देश के लिए कुछ बड़ा करना चाहते थे। इसके बाद उन्होंने अपने एक आईआईटी बैचमेट देवा के साथ मिलकर अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में उतरने का निर्णय लिया। देवा के पास इसरो में एक दशक तक काम करने का लंबा और समृद्ध अनुभव था।
एवरेस्ट इंजन की तकनीकी विशेषता और प्रधानमंत्री की सराहना
बेंगलुरु में स्थापित इस स्टार्टअप की टीम ने लगातार 18 महीनों तक दिन-रात रिसर्च, डिजाइन और तमाम तरह के जटिल परीक्षण किए, जिसके परिणामस्वरुप 800 किलो न्यूटन की क्षमता वाला एवरेस्ट इंजन बनकर तैयार हुआ। एलओएक्स-मीथेन प्रणोदक और एफएफएससी तकनीक पर आधारित यह रॉकेट इंजन इस बात का प्रमाण है कि अब देश के निजी संस्थान भी स्पेस सेक्टर में गेम-चेंजर साबित हो रहे हैं। इस अनोखी कामयाबी ने केवल तकनीकी जगत का ध्यान नहीं खींचा, बल्कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस स्टार्टअप की उपलब्धियों की जमकर प्रशंसा की है।
जमीनी जुड़ाव और भविष्य की बड़ी उड़ान
हजारों करोड़ के बिजनेस साम्राज्य और स्पेस सेक्टर में भारी सफलता हासिल करने के बावजूद नीरज आज भी अपनी मिट्टी से जुड़े हुए हैं। वे अपने व्यस्त शेड्यूल से समय निकालकर चौमूं लौटते हैं और परिवार के साथ त्योहार मनाते हैं। एक छोटे शहर के साधारण परिवार का लड़का किस तरह अपनी मेहनत, पक्के इरादों और विजन के दम पर देश के अंतरिक्ष अभियानों में मील का पत्थर साबित हो सकता है, इसकी बेहतरीन मिसाल यह कहानी पेश करती है।



















