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होकातो सेमा की प्रेरणादायक कहानी: बारूदी सुरंग में पैर गंवाने के बाद कैसे बने दुनिया के नंबर-1 पैरा एथलीटसक्सेस स्टोरी
4 अग॰ 2026, 5:51 pm (7 घंटे पहले)· 0

होकातो सेमा की प्रेरणादायक कहानी: बारूदी सुरंग में पैर गंवाने के बाद कैसे बने दुनिया के नंबर-1 पैरा एथलीट

जम्मू-कश्मीर में बारूदी सुरंग के भीषण विस्फोट में एक पैर गंवाने वाले भारतीय सेना के सूबेदार होकातो सेमा ने तमाम बाधाओं को पार करते हुए पैरा एथलेटिक्स में इतिहास रच दिया और दुनिया के नंबर-1 शॉट पुट खिलाड़ी बन गए।

चौदह अक्टूबर 2002 का वह दिन जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा के पास एक भयंकर धमाके के साथ आया, जिसने पल भर में एक सैनिक के शरीर से उसका एक पैर अलग कर दिया। किसी भी सामान्य व्यक्ति के लिए यह घटना जीवन के पूर्ण विराम जैसी साबित हो सकती थी, लेकिन होकातो सेमा ने इस भयानक हादसे को अपने जीवन का एक नया और गौरवशाली अध्याय बना दिया। उस वक्त शायद ही किसी ने यह कल्पना की होगी कि वही फौजी एक दिन पैरालंपिक मंच पर देश के लिए मेडल जीतेगा और विश्व रैंकिंग में शीर्ष स्थान हासिल करते हुए इतिहास रच देगा। एक ऐसा इंसान जिसने कभी हाथ में राइफल थामकर देश की सरहद की रक्षा की थी, आज वह पुरुषों की F57 शॉटपुट स्पर्धा में वैश्विक स्तर पर पहले पायदान पर काबिज है। साल 2024 के पेरिस पैरालंपिक में उन्होंने शानदार प्रदर्शन करते हुए ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया था। इसके अलावा, वह भारतीय सेना में असाधारण सेवाओं के लिए अति विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित होने वाले पहले पैरालंपियन भी बने हैं। एक साक्षात्कार के दौरान उन्होंने सूबेदार के पद से लेकर विश्व के सर्वश्रेष्ठ पैरा शॉट पुट एथलीट बनने तक के अपने इस संघर्षपूर्ण और साहसिक सफर के तमाम पहलुओं को साझा किया।

फिल्म 'बॉर्डर' से मिली सेना में जाने की प्रेरणा

मूल रूप से नागालैंड के रहने वाले होकातो सेमा के दिल में बचपन से ही सेना की वर्दी पहनने की तीव्र इच्छा थी। प्रतिष्ठित फिल्म 'बॉर्डर' देखने के बाद उनके भीतर देश सेवा की ऐसी गहरी अलख जगी कि उन्होंने अपना पूरा जीवन राष्ट्र को समर्पित करने का पक्का मन बना लिया। इसके बाद जब कारगिल युद्ध छिड़ा, तो उनका यह दृढ़ संकल्प और अधिक मजबूत हो गया। साल 2000 में उन्होंने भारतीय सेना की असम रेजिमेंट की सदस्यता ग्रहण की और उनकी पहली तैनाती जम्मू-कश्मीर में हुई, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।

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बारूदी सुरंग का विस्फोट और कठिन संघर्ष

चौदह अक्टूबर 2002 को नियंत्रण रेखा पर एक ऑपरेशन के दौरान अचानक पैर के नीचे बारूदी सुरंग आ गई और जोरदार विस्फोट हो गया। यह धमाका इतना भयंकर था कि उनका एक पैर हमेशा के लिए उनके शरीर से जुदा हो गया। अत्यंत गंभीर हालत में उन्हें श्रीनगर के सैन्य अस्पताल पहुंचाया गया, जहां तुरंत उनकी आपातकालीन सर्जरी की गई। इसके बाद उन्हें आगे के उपचार के लिए पुणे स्थित आर्टिफिशियल लिम्ब सेंटर ले जाया गया। डॉक्टरों को कृत्रिम पैर लगाना पड़ा, लेकिन उनके सामने असली इम्तिहान अब शुरू हुआ था।

शुरुआती मुश्किलें और नए सिरे से चलना सीखना

शुरुआती दौर ऐसा था मानो उनका शरीर चलना पूरी तरह भूल चुका हो। हर एक कदम उठाने पर तीव्र पीड़ा होती थी, उनके घाव सूज जाते थे और कई बार उनका मनोबल भी पूरी तरह डगमगा जाता था। हालांकि अस्पताल के भीतर अन्य घायल सैनिकों को इस तरह की परिस्थितियों से जूझते हुए देखना उनके लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहा। लगभग डेढ़ महीने के कड़े संघर्ष के बाद उन्होंने आखिरकार अपने कृत्रिम पैरों पर दोबारा खड़ा होना सीख लिया। उनकी शारीरिक चोट इतनी गंभीर प्रकृति की थी कि अब वह हथियारों के साथ किसी भी सैन्य ऑपरेशन में सीधे तौर पर भाग नहीं ले सकते थे। यदि सेना चाहती तो उनकी सेवाएं वहीं समाप्त हो सकती थीं, लेकिन भारतीय सेना ने उन्हें प्रशासनिक कार्यों की एक नई जिम्मेदारी सौंपी और उन्होंने पश्चिम बंगाल तथा शिलॉन्ग में कई वर्षों तक पूरी निष्ठा से अपनी सेवाएं जारी रखीं। उनके बदन पर वर्दी पहले की भांति ही सुशोभित थी, लेकिन उनके भीतर छिपा एक खिलाड़ी आज भी जीवंत था।

चौदह साल बाद खेलों की दुनिया में कदम

साल 2016 में जब वह अपना कृत्रिम पैर बदलवाने के सिलसिले में पुणे के उसी आर्टिफिशियल लिम्ब सेंटर गए जहां उन्होंने कभी चलना सीखा था, तो उनकी जिंदगी ने एक नया मोड़ लिया। वहां प्रतीक्षारत अवस्था में उन्होंने अपने एक साथी के साथ यूं ही टेबल टेनिस खेलना शुरू कर दिया। उनकी बेहतरीन फिटनेस को देखकर अस्पताल के वरिष्ठ अधिकारियों ने उन्हें पैरा स्पोर्ट्स की दुनिया में अपनी किस्मत आजमाने की सलाह दी। उनकी मुलाकात सेना के पैरा एथलीट कार्यक्रम से जुड़े जिम्मेदार अधिकारियों से हुई, जिन्होंने उन्हें शॉटपुट को आजमाने का सुझाव दिया। बस यहीं से उनकी जिंदगी की दिशा पूरी तरह बदल गई।

पहली ही प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक की प्राप्ति

महز कुछ महीनों के अल्पकालिक प्रशिक्षण के बाद होकातो सेमा ने साल 2017 के राष्ट्रीय पैरा खेलों में शिरकत की। उनके सामने ऐसे एशियन गेम्स के मेडल विजेता खिलाड़ी खड़े थे जिनका अनुभव बहुत अधिक था, लेकिन उनके पास अनुभव की कमी उनके बुलंद हौसले को कम नहीं कर सकी। अपनी पहली ही प्रतियोगिता में उन्होंने स्वर्ण पदक हासिल कर सबको चौंका दिया। इसके बाद उन्होंने चीन में अपना पहला अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट खेला और वहां भी देश के लिए ब्रॉन्ज मेडल जीत लिया। इसके बाद तो उनके पदकों का सिलसिला कभी नहीं रुका। उन्होंने चीन, मोरक्को, जापान, फ्रांस समेत दुनिया के कई देशों में जाकर भारत का तिरंगा शान से फहराया। साल 2022 के पैरा एशियन गेम्स में ब्रॉन्ज, 2024 के पेरिस पैरालंपिक में ब्रॉन्ज और अब वैश्विक रैंकिंग में पहला स्थान उनके नाम दर्ज है। आज उनके खाते में पच्चीस से अधिक अंतरराष्ट्रीय पदक मौजूद हैं।

सेना और परिवार का अटूट समर्थन

होकातो सेमा अपनी इस अभूतपूर्व सफलता का पूरा श्रेय भारतीय सेना को देते हैं। उनका दृढ़ मानना है कि यदि सेना का सहयोग नहीं मिला होता तो वह कभी इस मुकाम तक नहीं पहुंच पाते। उन्होंने बताया कि सेना ने उन्हें विश्वस्तरीय प्रशिक्षण सुविधाएं, महंगे उपकरण और हर आवश्यक सहूलियत मुहैया कराई। इसके साथ ही उनके परिवार ने भी हर कदम पर उनका भरपूर साथ दिया, जिससे वह पूरी तरह अपने लक्ष्य पर एकाग्र हो सके। उनकी पत्नी और उनके तीनों बच्चे हमेशा उनके सबसे बड़े संबल बने रहे। पेरिस पैरालंपिक में ब्रॉन्ज मेडल जीतने के बाद अब उनका अगला बड़ा लक्ष्य पैरा एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक हासिल करना है। दुनिया के शीर्ष पैरा शॉट पुट एथलीट होने के बावजूद उनके भीतर का वह सिपाही आज भी पूरी तरह जिंदा है जो कभी देश की सीमाओं की रक्षा करता था। अंतर केवल इतना है कि पहले वह देश के दुश्मनों से मुकाबला करते थे, और आज वह अपनी खुद की शारीरिक सीमाओं से लड़ते हैं।

सवाल-जवाब

होकातो सेमा कौन हैं?
होकातो सेमा भारतीय सेना के सूबेदार और पुरुषों की F57 शॉटपुट स्पर्धा में दुनिया के नंबर-1 पैरा एथलीट हैं।
होकातो सेमा ने कौन सा पैरालंपिक मेडल जीता है?
उन्होंने साल 2024 के पेरिस पैरालंपिक में ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया था।
उनके साथ दुर्घटना कब और कैसे हुई थी?
14 अक्टूबर 2002 को जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर एक ऑपरेशन के दौरान बारूदी सुरंग में हुए विस्फोट में उन्होंने अपना एक पैर गंवा दिया था।
उन्होंने पैरा स्पोर्ट्स की शुरुआत कब की थी?
साल 2016 में पुणे के आर्टिफिशियल लिम्ब सेंटर में अपने कृत्रिम पैर के सिलसिले में जाने के दौरान उन्होंने पैरा स्पोर्ट्स में कदम रखा था।
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